अंबाला। दयालबाग स्थित पंचमुखी हनुमान मंदिर में प्रशासक की नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि इसके पीछे पिछले करीब डेढ़ दशक से विकसित हुई परिस्थितियों, आंतरिक खींचतान और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों की लंबी कहानी है। जिस मंदिर को स्थानीय लोगों ने चंदा जुटाकर खड़ा किया और करोड़ों रुपये खर्च कर विकसित किया, आज वही मंदिर दो गुटों के विवाद और जांच के केंद्र में है।

मंदिर की कार्यकारिणी का गठन पहली बार वर्ष 2008 में हुआ था। उस समय रोहताश लाल बतरा को प्रधान, डॉ. रविंद्र शर्मा को उपप्रधान, विजय शर्मा को सचिव, कश्मीरी लाल को कैशियर तथा डॉ. सियाराम, कुलदीप चंद और मनोज बतरा को सदस्य बनाया गया था।
वर्ष 2013 में सदस्य कुलदीप चंद के निधन के बाद संदीप को कैशियर की जिम्मेदारी सौंपी गई। आरोप यह भी हैं कि 2008 के बाद समिति का न तो नियमित नवीनीकरण कराया गया और न ही कोई नया सदस्य जोड़ा गया।

राधा रानी की चुन्नी और मंदिर की चद्दरों से शुरू हुआ विवाद

इसी बीच वर्ष 2013 में प्रधान रोहताश लाल बतरा ने पद से त्यागपत्र भी दे दिया था। हालांकि, त्यागपत्र के बावजूद मंदिर प्रबंधन की जिम्मेदारी उनके पास ही बनी रही। मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि पिछले आठ-नौ महीनों में सचिव और कैशियर का एक पक्ष तथा प्रधान और अन्य सदस्यों का दूसरा पक्ष बन गया, जिसके बाद विवाद खुलकर सामने आने लगे।

सूत्रों के अनुसार विवाद की शुरुआत राधा-रानी की चुन्नी और मंदिर की चद्दरों को लेकर हुई। आरोप है कि एक पक्ष ने इन वस्त्रों को अपने कब्जे में ले लिया। दूसरे पक्ष ने इसका विरोध किया तो मामला तकरार में बदल गया और वर्षों से साथ काम कर रहे पदाधिकारियों के बीच खुली खाई पैदा हो गई। इसके बाद मंदिर के वित्तीय प्रबंधन, चढ़ावे और संपत्ति से जुड़े मुद्दे भी विवाद का हिस्सा बनते चले गए।

सचिव पक्ष का आरोप है कि मंदिर के चढ़ावे और अन्य आय के प्रबंधन में वित्तीय अनियमितताएं बरती गईं। वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि लगाए गए आरोप निराधार हैं। विवाद इतना बढ़ा कि मामला रजिस्ट्रार फर्म्स एंड सोसाइटीज तक पहुंच गया और अंततः प्रशासक नियुक्त करने का फैसला लिया गया।

मंदिर के चढ़ावे में चोरी के आरोप

मंदिर के चढ़ावे को लेकर भी दोनों पक्षों में मतभेद रहे हैं। मंदिर से जुड़े लोगों का दावा है कि पहले मंदिर के गल्ले से हर माह करीब सात हजार रुपये निकलते थे। निगरानी बढ़ाने के बाद यह राशि 18 हजार रुपये तक पहुंच गई। बाद में प्रधान द्वारा सीसीटीवी कैमरे लगवाए गए तो गल्ले की मासिक आय 70 से 80 हजार रुपये तक पहुंचने लगी।

2 किलो 499 ग्राम चांदी का विवाद

विवाद केवल नकदी तक सीमित नहीं रहा। वर्ष 2023-24 में मंदिर में लगी करीब 2 किलो 499 ग्राम चांदी को लेकर भी आरोप-प्रत्यारोप हुए। एक पक्ष ने आरोप लगाया कि मंदिर में लगाई गई चांदी नकली है, जबकि दूसरे पक्ष ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया। हालांकि अब तक इस संबंध में कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आ सका है।

 

एक लाख रुपये से ज्यादा बिजली का बिल पेंडिंग

मंदिर निर्माण के दौरान बिजली मीटर चोरी हो गया था, जिसके बाद अस्थायी रूप से सीधी बिजली आपूर्ति का उपयोग किया गया। इस पर बिजली निगम ने करीब 1.20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था।

बाद में समझौते के तहत करीब 62 हजार रुपये जमा कराने थे, लेकिन विवादों के कारण भुगतान लंबित रहा। वर्तमान में मंदिर और धर्मशाला पर लगभग 43 हजार रुपये का बिजली बिल भी बकाया बताया जा रहा है।

321 गज में धर्मशाला और 185 गज में बना है भव्य मंदिर

दिलचस्प बात यह है कि जिस मंदिर को लेकर आज विवाद हो रहा है, उसका विस्तार पूरी तरह जनसहयोग से हुआ। शुरुआत में मंदिर मात्र 40 गज क्षेत्र में था।

बाद में धर्मशाला के लिए 200 गज, मंदिर के लिए 45 गज और वर्ष 2018-19 में मंदिर विस्तार के लिए 96 गज का प्लाट करीब 45 लाख रुपये में खरीदा गया। इसके अलावा धर्मशाला के लिए 121 गज का एक और प्लॉट लिया गया। वर्ष 2019 के बाद मंदिर के पुनर्निर्माण और विस्तार पर करीब 75 लाख रुपये खर्च किए गए।

25 किलो चांदी और 6 तोले लगा है सोना

मंदिर परिसर में विभिन्न देवी-देवताओं के चांदी के मुकुट स्थापित हैं। मंदिर में लगभग 25 किलो चांदी और करीब छह तोला सोना उपयोग किए जाने का दावा किया जाता है।

विशेष बात यह है कि इस पूरे विकास कार्य में किसी प्रकार की सरकारी आर्थिक सहायता नहीं ली गई और सभी खर्च श्रद्धालुओं एवं समाज के सहयोग से पूरे किए गए। अब जब प्रशासक नियुक्त हो चुका है तो श्रद्धालुओं की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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