Category: International

चेंजिंग रूम में हिडन कैमरे (तकनीक के दुरुपयोग पर कठोर रोक की ज़रूरत) 

– डॉ. प्रियंका सौरभ हर सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने नागरिकों की गरिमा, निजता और सुरक्षा को कितना महत्व देता है। विशेषकर महिलाओं…

न्याय के मंदिर की गरिमा और नागरिक मर्यादा

– डॉ. सत्यवान सौरभ भारतीय लोकतंत्र की संपूर्ण संरचना चार प्रमुख स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया—पर आधारित है। इनमें न्यायपालिका वह संस्था है, जिसके समक्ष प्रत्येक नागरिक अंतिम उम्मीद…

जब कमाई रिश्तों से बड़ी हो जाए

– डॉ. प्रियंका सौरभ भारतीय समाज में परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि विश्वास, त्याग, साझेदारी और पारस्परिक उत्तरदायित्व की एक जीवंत संस्था रहा है। इस संस्था की…

पानी की लड़ाई में क्यों घुला जातिवाद?

पानी की मांग जायज़ है, लेकिन किसी अधिकारी का मूल्यांकन उसकी जाति से नहीं, उसके कार्यों से होना चाहिए – डॉ. प्रियंका सौरभ हरियाणा के हांसी क्षेत्र के चैनत गाँव…

कोचिंग संस्कृति के चौराहे पर शिक्षा

(शिक्षा नहीं, ब्रांड बिक रहे हैं।) – डॉ. प्रियंका सौरभ भारत में शिक्षा को सदियों से ज्ञान, संस्कार और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना गया है। शिक्षक को समाज में…

संपत्ति की भूख और बिखरते रिश्ते (परिवार, लालच और बदलते समाज की त्रासदी)

– डॉ. प्रियंका सौरभ हरियाणा की धरती को लंबे समय तक पारिवारिक प्रेम, भाईचारे और संयुक्त परिवारों की संस्कृति के लिए जाना जाता रहा है। गांवों की चौपालों में रिश्तों…

तकनीकी क्रांति और लोकतांत्रिक चुनौती के बीच जनगणना

– डॉ. सत्यवान सौरभ भारत वर्ष 2027 में अपनी पहली पूर्णतः डिजिटल जनगणना कराने जा रहा है। यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत की शासन व्यवस्था, विकास नीति…

कूड़ा, पॉलिथीन और पशु – “कूड़े के ढेर पर खड़े शहर और पॉलिथीन निगलते पशु”

– डॉ. सत्यवान सौरभ शहर इन दिनों कूड़े से अटे पड़े हैं। सड़कों के किनारे सड़ते ढेर, गलियों में फैली दुर्गंध, नालियों में फँसी गंदगी और उनके बीच भोजन तलाशते…

नीट संकट और परीक्षा-व्यवस्था की विश्वसनीयता

पारदर्शिता के नाम पर बार-बार टूटता भरोसा, और सुधार की अनिवार्य चुनौती नीट-2026 को लेकर उत्पन्न अनिश्चितता और रद्दीकरण संबंधी आशंकाओं ने लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी…

गटर में उतरती इंसानियत, सफाईकर्मियों की मौतें बताती हैं कि जातिवाद आज भी जिंदा है

 डॉ. प्रियंका सौरभ भारत के शहर आज दो तस्वीरों में बँटे हुए दिखाई देते हैं। एक तस्वीर चमचमाती सड़कों, स्मार्ट सिटी योजनाओं, बड़े-बड़े मॉल और स्वच्छता अभियानों की है, जबकि…