कहा: मोहम्मद अली पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश इससे रहे हैं पीड़ित,सही इलाज से मुमकिन है सामान्य जीवन
कुरुक्षेत्र, 10 अप्रैल।    अमेरिका के 41वें राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्लयू बुश, कैथोलिक चर्च के पोप जॉन पाल-2, विश्व के महान मुक्केबाज मोहम्मद अली, संगीतकार ओजी ओस्बोर्न, अभिनेता माइकल जे. फॉक्स एवं एलेन एल्डा, अभिनेत्री वेलरी पेरीनी,जाने-माने स्कॉटिश हास्य अभिनेता बिली कोनौली ऐसी प्रसिद्ध विभूतिया हैं, जो पार्किंसन्स रोग से पीड़ित रही हैं। हर साल 11 अप्रैल को दुनिया भर में ‘वर्ल्ड पार्किंसंस डे’ मनाया जाता है। इसका उद्देश्य एक ऐसी बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाना है, जो खामोशी से इंसान के नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) को अपना शिकार बनाती है।पार्किंसंस एक ‘प्रोग्रेसिव न्यूरो-डिजनरेटिव डिसऑर्डर’ है;जिसका अर्थ है कि यह समय के साथ बढ़ता जाता है और इसके कारण शरीर की गतिविधियों पर दिमाग का नियंत्रण कम होता जाता है। यह जानकारी पूर्व सिविल सर्जन एवं लोकनायक जयप्रकाश जिला नागरिक अस्पताल के परामर्शक फिजिशियन डॉ.शैलेंद्र ममगाईं शैली ने आज वर्ल्ड ‘पार्किंसन्स डे ‘की पूर्व संध्या पर दी।
आज एक विशेष मुलाकात में उन्होंने बताया कि पार्किंसंस का सबसे बड़ा वैज्ञानिक कारण दिमाग में ‘डोपामिन’ नामक रसायन की कमी है,जो हमारे शरीर के ‘संदेश वाहक’ की तरह काम करता है और दिमाग के संदेशों को मांसपेशियों तक पहुंचाता है‌। जब दिमाग की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं और डोपामिन का स्तर गिर जाता है, तो शरीर के अंगों में तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है।पार्किंसंस के प्रकारों की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि यह दो मुख्य प्रकार का होता है। एक,जेनेटिक (यंग ऑनसेट),जो कुल मामलों का लगभग 10% होता है। यह 40 वर्ष की आयु से पहले हो सकता है और इसके पीछे आनुवंशिक कारण या खास जीन की भूमिका होती है। दूसरा,इडियोपैथिक,जो सबसे सामान्य प्रकार का होता है और  बुजुर्गों में पाया जाता है। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, प्रति एक लाख की आबादी में 15 से 43 लोग इससे प्रभावित होते हैं।
पार्किंसंस’ के लक्षणों को नजरअंदाज न करने की सलाह देते हुए डॉ.ममगाईं ने बताया कि केवल हाथों का कांपना ही पार्किंसंस नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव काफी व्यापक हैं।इस बीमारी का नाम अंग्रेज न्यूरोलॉजिस्ट सर जेम्स पार्किंसन के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने सबसे पहले इसके लक्षणों को पहचाना था।आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पार्किंसंस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।भारत में इसके बढ़ने के दो मुख्य कारण हैं: पहला, चिकित्सा विज्ञान की प्रगति से अब इसकी पहचान जल्दी हो जाती है और दूसरा, देश में बुजुर्गों की बढ़ती जनसंख्या। चूंकि यह मुख्य रूप से बढ़ती उम्र की बीमारी है, इसलिए बुजुर्ग आबादी में इसके लक्षण अधिक देखे जा रहे हैं।शारीरिक लक्षणों में कंपकंपी,आराम करते समय हाथ या पैर में कंपन होना; ब्रैडीकिनेशिया (सुस्त चाल):
-रोजमर्रा के काम करने की गति का धीमा हो जाना,संतुलन खोना- चलते समय शरीर का संतुलन न बनना और गिरने का डर रहना।
पार्किंसंस’ के मानसिक व अन्य लक्षणों के बारे में डॉ.शैली ने बताया कि दिमाग पर असर होने के कारण मरीज को भूलने की बीमारी (डिमेंशिया), नींद की कमी, डिप्रेशन, शरीर में दर्द और सूंघने की शक्ति कम होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
इस रोग का हालांकि अभी तक कोई स्थायी समाधान और जड़ से खत्म करने वाला इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन सही समय पर पहचान और दवाओं से मरीज एक सामान्य जीवन जी सकता है। उ
इसके उपचार के लिए फिजिशियन अथवा न्यूरोलॉजिस्ट ऐसी दवाएं देते हैं, जो शरीर में डोपामिन की कमी को पूरा करती हैं। इसके अलावा
डीप ब्रेन स्टिमुलेशन प्रणाली का प्रयोग किया जाता है।जब
दवाएं असर करना बंद कर देती हैं, तो दिमाग में एक छोटा डिवाइस लगाया जाता है। यह पेसमेकर की तरह काम करता है और दिमाग के उन हिस्सों को उत्तेजित करता है जो मूवमेंट को कंट्रोल करते है। इसके अलावा लीवो-डोपा इन्फ्यूजन थेरेपी का प्रयोग किया जाता है। इसमें दवा को सीधे छोटी आंत तक पहुंचाया जाता है, ताकि उसका असर अधिक प्रभावी और निरंतर हो।

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