कुरुक्षेत्र। श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान ने भारतीय जीवन मूल्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को “मां, मातृभूमि और मातृभाषा” के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों से हिंदी भाषा के प्रयोग को बढ़ावा देने तथा अपने हस्ताक्षर भी हिंदी में करने का आग्रह किया। कहा कि मातृभाषा व्यक्ति के आत्मविश्वास और सांस्कृतिक पहचान का आधार होती है तथा उसका सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। वे आयुष विश्वविद्यालय में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा भारतीय शिक्षा दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्यातिथि संबोधित कर रहे थे। कुलपति ने विद्यार्थियों से भारतीय संस्कृति, भाषा और ज्ञान परंपरा को आत्मसात करते हुए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इतिहास में अनेक महापुरुषों ने अपने धर्म, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए त्याग और बलिदान दिए, जिनसे आज की पीढ़ी को प्रेरणा लेनी चाहिए। भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था समाज और संस्कृति से जुड़ी हुई थी। गुरुकुल, गुरुद्वारों, आश्रमों तथा मंदिरों के माध्यम से संचालित शिक्षा केवल पुस्तक-आधारित नहीं थी, बल्कि व्यवहारिक ज्ञान, नैतिक मूल्यों, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और व्यक्तित्व निर्माण पर आधारित थी। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में लागू की गई शिक्षा व्यवस्था ने इस परंपरा को प्रभावित किया, जबकि नई शिक्षा नीति भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही है।

भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा से बनेगा विकसित भारत: डॉ.गुप्ता
विशिष्ट अतिथि एवं कुलसचिव डॉ. कृष्णकांत गुप्ता ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में सार्थक संवाद और निष्पक्ष विमर्श आवश्यक है, क्योंकि समाधान संवाद से ही निकलते हैं। यदि भारत को विकसित और सशक्त राष्ट्र बनाना है तो शिक्षा व्यवस्था को भारतीय दृष्टि के अनुरूप बनाना होगा। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के निर्माण के लिए शिक्षा व्यवस्था को भारतीय संस्कृति, परंपराओं और जीवन मूल्यों से जोड़ना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें भारतीय ज्ञान परंपरा और तथ्यपरक शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है। उन्होंने कहा कि केवल पाठ्यक्रम में बदलाव पर्याप्त नहीं, बल्कि शिक्षकों का प्रशिक्षण और सकारात्मक दृष्टिकोण भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत शीघ्र ही शिक्षा, संस्कृति और ज्ञान के क्षेत्र में विश्वगुरु के रूप में अपनी पहचान पुनः स्थापित करेगा।

भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने का कार्य कर रहा है शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के क्षेत्रीय विषय संयोजक एवं मुख्य वक्ता प्रो. हितेंद्र त्यागी ने कहा कि वर्ष 2007 में गठित शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास का उद्देश्य शिक्षकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा एवं शिक्षा मूल्यों से जोड़ना है।  शिक्षक का समर्पण और विद्यार्थियों के प्रति स्नेह ही शिक्षा की वास्तविक शक्ति है। शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व का समग्र विकास करना है। विद्यालय स्तर से ही विद्यार्थियों में भारतीय संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और नैतिक मूल्यों का विकास आवश्यक है। उन्होंने बताया कि न्यास चरित्र निर्माण, मूल्य शिक्षा, पर्यावरण शिक्षा और प्रबंधन शिक्षा सहित दस प्रमुख विषयों पर देशभर में कार्य कर रहा है। नई शिक्षा नीति-2020 में भी मूल्य आधारित शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है। उन्होंने विश्वास जताया कि वर्ष 2047 तक भारत अपनी संस्कृति, परंपराओं और जीवन मूल्यों के आधार पर विश्व का मार्गदर्शन करने वाला राष्ट्र बनेगा। इस अवसर पर शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास हरियाणा प्रांत के प्रांत संरक्षक डॉ. गजराज आर्य, प्रांत अध्यक्ष डॉ. सतहंस,  प्रांत संयोजक डॉ. देवी भूषण, प्रांत सह संयोजक मनोज, कार्यक्रम संयोजक डॉ. यशश चंद्र द्विवेदी, आयुर्वेद अध्ययन एवं अनुसंधान संस्थान की कार्यकारी प्राचार्य प्रो. सीमा रानी सहित अन्य उपस्थित रहे।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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