– डॉ. प्रियंका सौरभ
हरियाणा की धरती को लंबे समय तक पारिवारिक प्रेम, भाईचारे और संयुक्त परिवारों की संस्कृति के लिए जाना जाता रहा है। गांवों की चौपालों में रिश्तों की गर्माहट दिखाई देती थी। परिवार केवल खून का रिश्ता नहीं था, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा और सम्मान का आधार माना जाता था। दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची और भाई-बहन मिलकर एक ऐसी सामाजिक संरचना बनाते थे, जहाँ व्यक्ति अकेला नहीं पड़ता था। परिवार की खुशियाँ सामूहिक होती थीं और दुख भी मिलकर सहन किए जाते थे। खेतों में मेहनत से लेकर घर के निर्णयों तक, सब कुछ साझेपन की भावना से चलता था। उस समय यह कल्पना भी कठिन थी कि कोई व्यक्ति संपत्ति के लिए अपने ही परिवार के सदस्य का दुश्मन बन सकता है।
लेकिन बदलते समय के साथ समाज की तस्वीर तेजी से बदली है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा, शहरीकरण, बढ़ती भौतिक इच्छाएँ और उपभोक्तावादी सोच ने रिश्तों की आत्मीयता को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया है। अब वही परिवार, जो कभी प्रेम और सहयोग की मिसाल होते थे, संपत्ति और पैसों के विवादों में टूटते दिखाई दे रहे हैं। जमीन का छोटा-सा टुकड़ा, विरासत का हिस्सा या पैसों का लेन-देन कई बार ऐसे संघर्षों को जन्म दे रहा है, जिनका अंत हिंसा और हत्या तक पहुँच रहा है।
आज हरियाणा ही नहीं, पूरे देश में ऐसे समाचार लगातार सामने आते हैं, जहाँ भाई ने भाई की हत्या कर दी, बेटे ने पिता पर हमला कर दिया या चाचा-भतीजे के रिश्ते खून से रंग गए। यह घटनाएँ केवल अपराध नहीं हैं, बल्कि समाज के भीतर बढ़ते नैतिक पतन का संकेत हैं। परिवारों के भीतर बढ़ती यह हिंसा बताती है कि धन और संपत्ति अब रिश्तों से अधिक महत्वपूर्ण मानी जाने लगी है।
हरियाणा जैसे राज्यों में जमीन केवल खेती का साधन नहीं रही। शहरीकरण और औद्योगिक विस्तार के कारण जमीनों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। जिन खेतों की कीमत कभी सामान्य थी, वे आज करोड़ों रुपये की संपत्ति बन चुके हैं। यही आर्थिक परिवर्तन कई परिवारों के भीतर तनाव का कारण बन रहा है। पहले जिस जमीन को परिवार मिलकर जोतता था, अब उसी जमीन के बंटवारे को लेकर भाई-भाई अदालतों में लड़ रहे हैं। कई मामलों में यह विवाद कानूनी सीमाओं को पार कर हिंसक रूप ले लेते हैं।
संयुक्त परिवारों के टूटने ने भी इस समस्या को गंभीर बनाया है। पहले परिवार में बड़े-बुजुर्ग मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। यदि किसी बात को लेकर विवाद होता, तो परिवार के सम्मानित सदस्य बैठकर समाधान निकाल लेते थे। उनकी बात को अंतिम माना जाता था। लेकिन अब एकल परिवारों का चलन बढ़ गया है। परिवार छोटे होते गए और संवाद भी कम होता गया। जब परिवार के सदस्य अलग-अलग रहने लगे, तब उनके बीच भावनात्मक दूरी भी बढ़ी। यही दूरी कई बार अविश्वास और स्वार्थ को जन्म देती है।
आधुनिक समाज में व्यक्ति की सफलता को उसकी आर्थिक स्थिति से मापा जाने लगा है। बड़ा घर, महंगी गाड़ी और अधिक संपत्ति आज सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुके हैं। सोशल मीडिया और बाजारवादी संस्कृति ने इस सोच को और मजबूत किया है। हर व्यक्ति अधिक से अधिक धन कमाने की दौड़ में शामिल दिखाई देता है। इस दौड़ में रिश्तों की संवेदनशीलता पीछे छूटती जा रही है। व्यक्ति अपने परिवार को सहयोगी के बजाय हिस्सेदार और प्रतिस्पर्धी की तरह देखने लगा है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो संपत्ति विवाद केवल आर्थिक संघर्ष नहीं होते। इनके पीछे असुरक्षा, अहंकार, तुलना और अधिकार की भावना भी काम करती है। कई बार व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है, उसे कम हिस्सा मिला है या परिवार में उसकी उपेक्षा हुई है। यही भावनाएँ धीरे-धीरे क्रोध और हिंसा में बदल जाती हैं। परिवार के भीतर वर्षों से दबा तनाव किसी छोटे विवाद के समय विस्फोटक रूप ले लेता है।
भारतीय समाज में पुरुष प्रधान मानसिकता भी इन विवादों को बढ़ाने में भूमिका निभाती है। संपत्ति को लेकर बेटों के बीच प्रतिस्पर्धा अधिक देखने को मिलती है। कई बार माता-पिता भी अनजाने में बच्चों के बीच भेदभाव कर देते हैं। किसी एक बेटे को अधिक महत्व देना या संपत्ति के बंटवारे में असमानता बरतना भविष्य के संघर्षों की नींव बन जाता है। यह तनाव वर्षों तक भीतर जमा रहता है और बाद में बड़े विवाद का कारण बनता है।
आज अदालतों में संपत्ति विवादों के लाखों मामले लंबित हैं। परिवार वर्षों तक कानूनी लड़ाइयों में उलझे रहते हैं। मुकदमों में समय, पैसा और मानसिक शांति सब नष्ट हो जाते हैं। अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते रिश्तों में इतनी कड़वाहट भर जाती है कि मेल-मिलाप की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है। कई बार तो अगली पीढ़ियाँ भी इस दुश्मनी को विरासत की तरह ढोने लगती हैं।
विडंबना यह है कि जिस संपत्ति के लिए लोग अपने रिश्तों को नष्ट कर देते हैं, वही संपत्ति अंततः उन्हें मानसिक शांति नहीं दे पाती। धन सुविधाएँ दे सकता है, लेकिन वह आत्मीयता और विश्वास नहीं दे सकता। जिन भाइयों ने बचपन साथ खेलते हुए बिताया, वे एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। जिन माता-पिता ने बच्चों को पालने-पोसने में पूरा जीवन लगा दिया, वही वृद्धावस्था में अपने ही बच्चों के बीच असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। यह स्थिति केवल पारिवारिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक त्रासदी है।
ग्रामीण समाज में यह समस्या और अधिक जटिल इसलिए हो गई है क्योंकि वहाँ जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक भी है। अधिक जमीन वाले परिवार को अधिक प्रभावशाली माना जाता है। यही कारण है कि लोग जमीन के छोटे हिस्से के लिए भी वर्षों तक संघर्ष करते रहते हैं। कई बार पंचायतें भी इन विवादों को सुलझाने में असफल रहती हैं। परिणामस्वरूप विवाद हिंसा और हत्या तक पहुँच जाते हैं।
शहरी क्षेत्रों में स्थिति अलग रूप में दिखाई देती है। महानगरों में माता-पिता की संपत्ति, मकान और व्यवसाय को लेकर भाई-बहनों के बीच कानूनी लड़ाइयाँ आम हो गई हैं। वृद्ध माता-पिता कई बार अकेलेपन और असुरक्षा का शिकार हो जाते हैं। कुछ मामलों में बच्चे संपत्ति अपने नाम करवाने के लिए माता-पिता पर दबाव डालते हैं। यह स्थिति भारतीय परिवार व्यवस्था के मूल्यों पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
धन और संपत्ति स्वयं में बुरी चीजें नहीं हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं से ऊपर धन को रख देता है। लालच धीरे-धीरे व्यक्ति की संवेदनशीलता को समाप्त कर देता है। वह रिश्तों को भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक नजरिए से देखने लगता है। जब मनुष्य के भीतर मानवीय मूल्य कमजोर पड़ जाते हैं, तब हिंसा और अपराध के लिए रास्ते खुलने लगते हैं।
समस्या का समाधान केवल कानून से संभव नहीं है। इसके लिए सामाजिक और नैतिक स्तर पर गंभीर प्रयास आवश्यक हैं। सबसे पहले परिवारों में संवाद की संस्कृति को मजबूत करना होगा। जब परिवार के सदस्य खुलकर अपनी बात कहेंगे और एक-दूसरे की भावनाओं को समझेंगे, तब विवादों की संभावना कम होगी। कई बार छोटी-छोटी गलतफहमियाँ संवाद के अभाव में बड़े संघर्षों में बदल जाती हैं।
बड़े-बुजुर्गों की भूमिका आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें केवल संपत्ति के संरक्षक नहीं, बल्कि पारिवारिक मूल्यों के मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए। बच्चों को बचपन से यह सिखाना होगा कि रिश्ते किसी भी जमीन या धन से अधिक मूल्यवान हैं। यदि परिवार में प्रेम और विश्वास बना रहेगा, तो संपत्ति का बंटवारा भी सहजता से हो सकेगा।
शिक्षा व्यवस्था में भी नैतिक शिक्षा और पारिवारिक मूल्यों को अधिक महत्व देने की आवश्यकता है। आज की शिक्षा व्यक्ति को सफल तो बना रही है, लेकिन संवेदनशील नहीं बना पा रही। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि जीवन की वास्तविक सफलता केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि मानवीयता और संबंधों को बचाए रखना भी है।
समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। केवल आर्थिक सफलता को सम्मान देने की प्रवृत्ति खतरनाक है। जब समाज व्यक्ति के चरित्र, व्यवहार और संवेदनशीलता के बजाय उसकी संपत्ति को महत्व देता है, तब धन की अंधी दौड़ और तेज हो जाती है। समाज को ऐसे आदर्शों की आवश्यकता है, जो त्याग, सहयोग और पारिवारिक एकता को प्रेरित करें।
मीडिया और मनोरंजन जगत की भी बड़ी जिम्मेदारी है। यदि फिल्मों, धारावाहिकों और डिजिटल मंचों पर लगातार धन और वैभव को ही सफलता का प्रतीक दिखाया जाएगा, तो नई पीढ़ी उसी सोच को अपनाएगी। समाज को ऐसे सांस्कृतिक उदाहरणों की आवश्यकता है, जो परिवार, संवेदनशीलता और रिश्तों की गरिमा को मजबूत करें।
सरकार और प्रशासन को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए। पंचायत स्तर पर पारिवारिक परामर्श केंद्र, मध्यस्थता समितियाँ और सामुदायिक समाधान की व्यवस्थाएँ विकसित की जा सकती हैं। यदि विवादों को शुरुआती स्तर पर ही बातचीत से सुलझा लिया जाए, तो कई परिवार टूटने और हिंसा से बच सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति स्वयं अपने भीतर झाँके। जीवन क्षणभंगुर है। धन और जमीन यहीं रह जाते हैं, लेकिन रिश्तों की स्मृतियाँ पीढ़ियों तक जीवित रहती हैं। कोई भी संपत्ति उस प्रेम की बराबरी नहीं कर सकती, जो परिवार से मिलता है। यदि व्यक्ति अपने स्वार्थ और अहंकार पर नियंत्रण रखना सीख ले, तो अनेक संघर्षों को रोका जा सकता है।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसका परिवार रहा है। यदि यही परिवार बिखरने लगेंगे, तो समाज की नैतिक नींव भी कमजोर हो जाएगी। आधुनिकता और आर्थिक विकास आवश्यक हैं, लेकिन वे तभी सार्थक हैं जब उनके साथ मानवीय मूल्य भी सुरक्षित रहें। विकास का अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक संतुलन भी है।
अंततः यह समझना होगा कि संपत्ति जीवन की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन वह जीवन का अंतिम सत्य नहीं है। अंतिम सत्य है प्रेम, विश्वास और वह अपनापन, जो कठिन समय में मनुष्य को सहारा देता है। यदि संपत्ति की भूख रिश्तों को निगलने लगे, तो यह केवल परिवार की नहीं, पूरे समाज की हार होगी। सभ्यता की पहचान बड़ी इमारतों और विशाल संपत्तियों से नहीं होती; वह इस बात से होती है कि लोग अपने संबंधों को कितना सम्मान देते हैं। इसलिए समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि हम संपत्ति से अधिक संबंधों को महत्व देना सीखें, क्योंकि अंततः इंसान को जीने का सहारा जमीन नहीं, अपने लोग देते हैं।
