कुरुक्षेत्र, 22 मई। विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के महामंत्री देशराज शर्मा ने कहा कि.संस्कृति बोध परियोजना भारत की आत्मा को समझने, उसे विस्तारित करने और उसे जन-जन तक पहुंचाने की एक साधना स्थली है। विद्या भारती के कार्य में आने वाली पीढ़ियों, राष्ट्र के समग्र विकास और समाज के परिवर्तन हेतु इन तीन बिन्दुओं को ध्यान में रखकर विद्या भारती के राष्ट्रीय संकल्प का विचार करते हैं तो उसका माध्यम शिक्षा बनती है। विद्या भारती का मानना है कि हम शिक्षा क्षेत्र में जिस काम के लिए आए हैं वह कार्य है भारत की आध्यात्मिकता, संस्कृति एवं परम्पराओं को ध्यान में रखना और इन तीनों के आधार पर शिक्षा का ढांचा खड़ा करना। देशराज शर्मा विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान में प्रांत संयोजकों की तीन दिवसीय अखिल भारतीय कार्यगोष्ठी के शुभारंभ अवसर पर देशभर से आए प्रतिभागियों को संबोधित कर रहे थे। कार्यगोष्ठी का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। इस अवसर पर उनके साथ मंचासीन संस्कृति शिक्षा संस्थान के अध्यक्ष डाॅ. ममता सचदेवा एवं संस्थान के संरक्षक डाॅ. ललित बिहारी गोस्वामी रहे। संस्थान के प्रबंधक सुधीर कुमार ने मंच संचालन करते हुए कुरुक्षेत्र की पावन धरा पर आए सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया एवं मंचासीन अतिथियों का परिचय कराया। संस्कृति बोध परियोजना के संयोजक दुर्ग सिंह राजपुरोहित ने वृत्त निवेदन करते हुए बैठक में आए क्षेत्र एवं प्रांत संयोजकों की जानकारी ली।
देशराज शर्मा ने प्रतिभागियों का उत्साहवर्द्धन करते हुए कहा कि आप कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं अपितु वह कार्यकर्ता हैं जो सारे शिक्षातंत्र का आधार बनते हैं। इसलिए संस्कृति बोध परियोजना विषय का संचालन हमारे कंधों पर है, इसे ध्यान में रखकर विचार करेंगे तो इस बैठक को बहुत परिणामकारी नहीं अपितु महत्वाकांक्षी योजना बनाकर अपने अपने स्थानों पर जाकर उसका क्रियान्वयन करेंगे। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति विश्व कल्याण के लिए है। भारत की संस्कृति और परम्पराओं के आधार पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति का निर्माण हुआ है। भारत की जड़ का अध्ययन हमारी संस्कृति है। वसुधैव कुटुम्बकम् का भाव हमारी संस्कृति की भावना है। उन्होंने कहा कि वर्तमान भारत का समय अपनी मजबूत जड़ों के आधार पर विश्व को उत्तर देने का समय है। यह उत्तर देने वाले कार्यकर्ता हम सब हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति की अनुपालना में संस्कृति बोध परियोजना एक महत्वपूर्ण अंग है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा हमारी संस्कृति बोधमाला पुस्तकों में आ जाता है। उन्होंने कहा कि विद्या भारती समाज में नहीं अपितु समाज द्वारा काम करना चाहती है। अपने तंत्र से बाहर निकलकर संस्कृति बोध परियोजना ऐसा विषय है जिसे बाहर के लोग भी स्वीकार करना चाहते हैं।
बैठक की अध्यक्षता करते हुए संस्थान की अध्यक्षा डाॅ. ममता सचदेवा ने कहा कि संस्कृति बोध परियोजना की वार्षिक कार्यगोष्ठी का आयोजन अपने आप में ईश्वरीय प्रेरणा है। यह कार्यगोष्ठी पूरे वर्ष की दिशा, दृष्टि और कार्य योजना निर्धारित करने वाला चिंतन सत्र है। उन्होंने कहा कि विद्या भारती का लक्ष्य सदैव से पुस्तकीय शिक्षा तक सीमित न रहकर ज्ञान के साथ संस्कार, बुद्धि के साथ विवेक, विकास के साथ चरित्र और शिक्षा के साथ संस्कार का रहा। उन्होंने कहा कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी संस्कृति में होती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी सर्वांगीण विकास की बात कही गई है। विद्या भारती के विद्यालयों में तो यह पहले से ही चल रही है। हमारी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति, अपने आदर्शों और अपने राष्ट्रीय मूल्यों से जुड़ी रहेगी तो भारत का भविष्य निश्चित ही उज्जवल होगा। उन्होंने कार्यगोष्ठी की सफलता पर कहा कि इस कार्यगोष्ठी से चिंतन-मनन करके जो भी विचार निकलेंगे वे पूरे देश में संस्कृति जागरण का आधार बनेंगे। तीन दिवसीय कार्य गोष्ठी के 10 सत्रों में संस्कृति बोध के विषय को समाज तक पहुंचाना और उसे प्रभावी बनाने जैसे अनेक विषयों पर विस्तृत चर्चा होगी। इस अवसर पर संस्थान के सदस्य कृष्ण कुमार भंडारी, विद्याभारती उत्तर क्षेत्र से अनिल कुलश्रेष्ठ, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से यशपाल सिंह, पूर्वी उत्तर प्रदेश से राजकुमार सिंह, उत्तर पूर्व क्षेत्र से आशुतोष कुमार मिश्र, पूर्व क्षेत्र से कैलाश चन्द्र मिश्र, दक्षिण क्षेत्र से वेंकटा सुब्रह्मण्यम, दक्षिण मध्य क्षेत्र से नागेन्द्र डोडमणी, राजस्थान क्षेत्र से सतीश शर्मा, मध्य क्षेत्र से अंबिका दत्त कुंडल सहित प्रांत संयोजक एवं सह-संयोजक उपस्थित रहे।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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