कुरुक्षेत्र, 03 जुलाई। गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा कि संत कबीर भारतीय संस्कृति की सर्वधर्म समभाव और वसुधैव कुटुंबकम परंपरा के संवाहक के साथ इतिहास के अनमोल रत्न थे। उन्होंने किसी भी धर्म, सम्प्रदाय और जाति की परवाह किए बिना खरी खरी बात कही।

गीता मनीषी सत गुरु श्री कबीर साहेब जी के 629वें राज्य स्तरीय प्रकाश उत्सव पर आयोजित सामाजिक समरसता सम्मेलन में बतौर मुख्यातिथि बोल रहे थे। गीता ज्ञान संस्थानम के सभागार में आयोजित सम्मेलन में सामजिक समरसता का संदेश दिया और सभी धर्मों व जाति के लोगों ने संत कबीर के आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया। सम्मेलन की अध्यक्षता चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर विजय कायत ने की, जबकि विशिष्ट अतिथि के तौर पर कुरुक्षेत्र सांसद कार्यालय प्रभारी धर्मवीर सिंह और स्वामी संगम नाथ मौजूद रहे। जीओ गीता के सचिव मदन मोहन छाबड़ा ने मंच का संचालन किया और संत कबीर को नमन किया और श्री कबीर धानक समाज धर्मशाला के प्रधान जय नारायण खटक संयोजक के तौर पर मौजूद रहे। सम्मेलन की शुरुआत भजन कीर्तन और कबीर के दोहे के साथ हुई, महाराणा प्रताप स्कूल की छात्रा वैष्णवी और गीता निकेतन स्कूल से काव्या चौधरी ने कबीर के दोहे सुनाए।

गीता मनीषी ने कहा कि ज्ञान की प्राप्ति तीन तरह से होती है, जिसमें शास्त्र, गुरु और साधना शामिल है। संत कबीर ने साधना के जरिये ज्ञान की प्राप्ति की और गुरु ग्रन्थ साहिब में संत कबीर की वाणी को सम्मान दिया गया है। क्योंकि परम तत्व ही गुरु तत्व होता है, जोकि समाज में बदलाव की अलख जगाता है।

गीता मनीषी ने कहा कि जब हमारा समाज अंधविश्वास, पाखंड, छुआछूत और रूढ़िवादिता के गहरे अंधकार में डूबा हुआ था। ऐसे में संत कबीर महाराज का जन्म ज्योति स्वरूप हुआ जिन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी से पूरे समाज को नई राह दिखाई। वह भारत की रूह और बड़े समाज सुधारक हुए हैं जिन्होंने समाज को जोड़ने का रास्ता और इन्सानियत का मंत्र दिया है। उनका जीवन सत्य की खोज और असत्य के निर्भिक खंडन में व्यतीत हुआ और उन्होंने सभी धर्मों की कुरीतियों और रूढियों पर कड़ा प्रहार किया। उनके क्रांतिकारी विचार आज भी समाज के मार्गदर्शक है।

प्रोफेसर विजय कायत ने संत कबीर दास के जीवन के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि संत शिरोमणि कबीर दास का जीवन सत्य की खोज और असत्य के निर्भीक खंडन में बीता। वे बाहरी दिखावे से दूर, भीतर के प्रकाश के साधक थे। संत कबीर दास का व्यक्तित्व साधारण नहीं था। वे फक्कड़, बेबाक और सत्य के पक्षधर थे। उन्होंने जन्म से नहीं, अपने कर्म से वंदनीय स्थान प्राप्त किया।

जीओ गीता सचिव मदन मोहन छाबड़ा ने कहा कि संत कबीर दास जैसी महान विभूतियों की शिक्षाएं पूरे मानव समाज की धरोहर हैं। संत कबीर दास ने सर्वधर्म समभाव का संदेश देते हुए सबको समान माना।

 उनकी विरासत को संभालने व सहेजने की जिम्मेदारी हम सबकी है। इस अवसर पर प्रोफेसर आरके देशवाल, एडवोकेट महेंद्र सिंह तंवर, प्रोफेसर शुचिसुमिता, डॉ. संगीता, डॉ. सुनील भारती, डॉ. सुरेंद्र वर्मा, डॉ. देवेंद्र बीबीपुर, डॉ. ऋषिपाल, हरि सिंह, राजेश सैन, अमित शर्मा, श्री कबीर धानक समाज धर्मशाला सभा कुरुक्षेत्र से महासचिव नरेंद्र खटक, रघबीर सिंह खुंडिया, रजनीश खटक, बिमला देवी, मार्केट कमेटी थानेसर के सदस्य बिजेंद्र खनगवाल, धर्मेंद्र, दुखभंजन मंदिर कमेटी के प्रबंधक एचके पाल, जोशी समाज से सतबीर व सूरजभान, दलबीर गोबिंदगढ़, वाल्मीकि समाज से मुकेश वकील, एडवोकेट सतपाल सिंह, रविदास समाज से राजबीर सिंह प्रमुख रूप से मौजूद रहे।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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