कुरुक्षेत्र, 26 जून। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान एवं कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता-अद्वितीयम् अद्भुतम’’ मासिक परिचर्चा का आयोजन संस्थान परिसर में किया गया। ‘‘सर्वांगीण विकास और गीता’’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में मंचासीन श्रीमद्भगवद्गीता अध्ययन केन्द्र कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रभारी डाॅ. आर.के. देसवाल, कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के सदस्य अशोक रोशा, संस्थान की अध्यक्षा डाॅ. ममता सचदेवा एवं संस्कृति बोध परियोजना के क्षेत्र संयोजक अनिल कुलश्रेष्ठ रहे। श्री सोमदत्त ने अतिथि परिचय कराया जबकि मंच संचालन अनिल कुलश्रेष्ठ ने किया। के.डी.बी. सदस्य अशोक रोशा ने थानेसर जिसे आमतौर पर कुरुक्षेत्र का विस्तार माना जाता है, राजा प्रभाकरवर्धन और उनके उत्तराधिकारी महाराजा हर्षवर्द्धन के शासनकाल के दौरान वर्धन वंश की राजधानी के विषय में जानकारी दी। महान पुरातनता के इस शहर में असंख्य कुंड, मंदिर, गुरुद्वारे, युद्ध के मैदान और पुराने समय की याद ताजा करने वाले स्थान हैं। उन्होंने कुरुक्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले कुबेर तीर्थ, सन्निहित सरोवर सहित अनेक तीर्थ स्थानों का विस्तृत उल्लेख किया।
परिचर्चा में मुख्य वक्ता डाॅ. आर.के. देसवाल ने कहा कि गीता एक पवित्र गीत है क्योंकि अर्जुन के प्रति कृष्ण जी के मन में जो भावनाएं थीं, वे उन्होंने श्लोकों के रूप में गाकर बताईं। उन्होंने कहा कि विश्व में तीन गीताएं प्रसिद्ध हैं श्रीमद्भगवद्गीता, अष्टावक्रगीता और बौद्धगीता। मनुष्य की चेतना तीन प्रकार की मानी गई है, वह ज्ञानात्मक है, भावात्मक है और क्रियात्मक है। गीता को उपनिषदों का सार माना जाता है। ज्ञान, भाव और कर्म में बैलेंस लेकर चलें और उसे अपने जीवन व्यवहार में लाएं। उन्होंने गीता के लक्ष्य एवं उद्देश्यों को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से बताया। उन्होंने जीवन जीवन जीने के तीन तरीकों स्वार्थमूलक, प्रार्थमूलक एवं परमार्थमूलक का उल्लेख करते हुए कहा कि गीता ऐसी जीवन पद्धति है जिसमें व्यक्तिगत, सामाजिक जिम्मेदारियां निभाते हुए जीवन के परमपद को प्राप्त किया जा सकता है। इस अवसर पर अनिल कुलश्रेष्ठ ने परिचर्चा की भूमिका रखते हुए गुरु-शिष्य परम्परा का उल्लेख किया। डाॅ. सी.डी.एस. कौशल ने कहा कि सभी समस्याओं का समाधान गीता में है। आभार ज्ञापन करते हुए डाॅ. ममता सचदेवा ने कहा कि विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान का मूल उद्देश्य केवल ज्ञान का प्रसार ही नहीं अपितु भारतीय जीवन दृष्टि, संस्कार और संस्कृत चेतना को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाना है। श्रीमद्भगवद्गीता इस सबका आधार स्तम्भ है। गीता केवल धार्मिक ग्रन्थ ही नहीं वरन् व्यक्तित्व निर्माण का संपूर्ण जीवन दर्शन है। गीता प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्य का बोध कराती है और जीवन में संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देती है। इस अवसर पर गुलजारीलाल नन्दा केन्द्र, कुरुक्षेत्र की निदेशक प्रो. शुचिस्मिता, डाॅ. सी.डी.एस. कौशल, डाॅ. जयभगवान सिंगला सहित अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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