कुरुक्षेत्र। श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान ने कहा कि आचार्य सुश्रुत की परंपरा से जुड़ना अपने आप में गौरव और जिम्मेदारी का विषय है। यदि आयुर्वेद के विद्यार्थी भविष्य में प्रभावी शिक्षक, चिकित्सक या वक्ता बनना चाहते हैं तो उन्हें मूल संहिताओं का गहन अध्ययन करना होगा। केवल तैयार नोट्स या पुस्तकों पर निर्भर रहने से ज्ञान की मौलिकता प्रभावित होती है और समय के साथ अनेक त्रुटियां भी आगे बढ़ती जाती हैं। कुलपति प्रो. धीमान शल्य तंत्र, शालाक्य तंत्र तथा प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग द्वारा आयोजित आचार्य सुश्रुत जयंती कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि आचार्य सुश्रुत को ऋषि स्वरूप में चित्रित किया जाना केवल कलाकारों की कल्पना नहीं, बल्कि उनके तप, अनुसंधान, ज्ञान-साधना और चिकित्सा विज्ञान में अद्वितीय योगदान का प्रतीक है। उन्होंने केवल शल्य चिकित्सा का अभ्यास ही नहीं किया, बल्कि अपने शोध एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चिकित्सा विज्ञान को नई दिशा प्रदान की।

कुलपति ने कहा कि सुश्रुत संहिता के विकास को सही ऐतिहासिक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। इसका वर्तमान स्वरूप एक ही समय में तैयार नहीं हुआ, बल्कि बाद में आचार्य नागार्जुन सहित अनेक विद्वानों ने समय की आवश्यकता के अनुसार इसमें संपादन, संशोधन एवं विस्तार किया। विशेष रूप से उत्तरतंत्र का समावेश आयुर्वेद की निरंतर विकसित होती वैज्ञानिक परंपरा का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि आचार्य सुश्रुत के योगदान का जितना गहराई से अध्ययन किया जाएगा, उतने ही नए वैज्ञानिक तथ्य सामने आएंगे।

इस अवसर पर कुलसचिव डॉ. कृष्णकांत गुप्ता ने कहा कि “नींव दिखाई नहीं देती, लेकिन पूरा भवन उसी पर खड़ा होता है। बीज दिखाई नहीं देता, लेकिन उसी से विशाल वृक्ष बनता है और हवा दिखाई नहीं देती, लेकिन वही जीवन का आधार है।” इसी प्रकार आचार्य सुश्रुत के सिद्धांत आज भी चिकित्सा विज्ञान की मजबूत नींव हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक शल्य चिकित्सा की आधारशिला आचार्य सुश्रुत ने सदियों पहले रख दी थी और उनके सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

उन्होंने कहा कि चिकित्सा विज्ञान में फिजीशियन और सर्जन दोनों की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण है। किसी एक को दूसरे से बड़ा नहीं माना जा सकता, क्योंकि शल्य चिकित्सा के दौरान फिजीशियन की आवश्यकता होती है और गंभीर रोगियों के उपचार में आवश्यकता पड़ने पर सर्जन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चिकित्सा की सफलता दोनों के समन्वय और टीम भावना पर निर्भर करती है। कार्यक्रम में डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. रणधीर सिंह, आयुर्वेद अध्ययन एवं अनुसंधान संस्थान के प्राचार्य प्रो. आशीष मेहता, प्रो. सीमा रानी, प्रो. जितेश कुमार पंडा, प्रो. मनोज तंवर, डॉ. अनामिका, डॉ. सुधीर मलिक, डॉ. ज्योति सैनी सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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