कुरुक्षेत्र, 12 जून। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संगीत एवं नृत्य विभाग द्वारा सांस्कृतिक एवं कलात्मक परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से संस्कार भारती, कुरुक्षेत्र व भारत विकास परिषद की मैत्रेयी शाखा के सहयोग से 1 जून 2026 से 12 जून 2026 तक आयोजित तबला, गायन एवं नृत्य कार्यशाला का सफलतापूर्वक समापन हुआ। इस अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि मैत्रेयी शाखा की अध्यक्षा डॉ. ममता सचदेवा ने कहा कि संगीत और नृत्य भारतीय संस्कृति की ऐसी अमूल्य धरोहर हैं। संगीत एवं नृत्य ने प्राचीन काल से ही भारतीय की सांस्कृतिक पहचान को सशक्त बनाया है। भारतीय परंपरा में संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक मूल्यों के संवाहक के रूप में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भारतीय शास्त्रीय एवं लोक संगीत की विविध परंपराएं देश की सांस्कृतिक समृद्धि और एकता का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय नृत्य कलाएं भी हमारी सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग हैं। भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, कुचिपुड़ी, कथकली, मणिपुरी, मोहिनीअट्टम और सत्रिया जैसी शास्त्रीय नृत्य शैलियां भारतीय संस्कृति की गहराई, सौंदर्य और आध्यात्मिक भावों को अभिव्यक्त करती हैं।
डॉ. ममता सचदेवा ने कहा कि संगीत और नृत्य भारत की विविधता में एकता की भावना को सुदृढ़ करते हैं तथा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का कार्य करते हैं। यही कारण है कि आज भी विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों, महोत्सवों और शैक्षणिक संस्थानों में इन कलाओं को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। भारतीय संगीत और नृत्य की यह गौरवशाली परंपरा न केवल देश की सांस्कृतिक पहचान को विश्व पटल पर स्थापित करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और गौरव का स्रोत भी बनी हुई है। इस अवसर मुख्यातिथि डॉ. ममता सचदेवा ने प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र भी वितरित किए।
इस अवसर पर विभाग के अध्यक्ष डॉ. अशोक शर्मा ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएँ युवा पीढ़ी को भारतीय संगीत एवं सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने संस्कार भारती व मैत्रेयी शाखा के सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हुए भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन की प्रतिबद्धता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि 12 दिवसीय इस कार्यशाला में विभिन्न आयु वर्ग के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को भारतीय शास्त्रीय संगीत के गायन तथा ताल पक्ष एवं कत्थक नृत्य की विधाओं का व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया। तबला कार्यशाला में प्रतिभागियों को ताल, लय, विभिन्न बोलों तथा संगत की बारीकियों का प्रशिक्षण दिया गया। गायन कार्यशाला के अंतर्गत स्वर साधना, रागदारी संगीत, बंदिशों एवं प्रस्तुति कौशल पर विशेष ध्यान दिया गया। वहीं नृत्य कार्यशाला में शास्त्रीय नृत्य की मूलभूत तकनीकों, हस्त मुद्राओं, भाव-अभिनय तथा मंच प्रस्तुति की विधियों का प्रशिक्षण प्रदान किया गया। कार्यशाला के विषय विशेषज्ञ और प्रशिक्षक के रूप में शास्त्रीय गायन में पारितोष, सुरेश व नवजोत सिंह, तबला विषय में सुरेंद्र व अरविंद भट्ट, तथा कत्थक नृत्य में डॉ. पूजा चौधरी, संजना रानी और मृत्तिका ने सराहनीय भूमिका निभाई।
कार्यक्रम का संचालन विभाग सहायक प्राध्यापक डॉ. पुरषोत्तम द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रो. शुचिस्मिता शर्मा, प्रो. कृष्णा देवी, डॉ. अनिता भटनागर, प्रो. सुनीता दलाल, डॉ. अनीता दुआ, प्रो. सुनीता सिरोहा, डॉ. सलोनी धीमान, डॉ. आशीष सबरवाल, डॉ. मेघा सहित शोधार्थी, विद्यार्थी उपस्थित थे।
डॉ. ममता सचदेवा ने कहा कि संगीत और नृत्य भारत की विविधता में एकता की भावना को सुदृढ़ करते हैं तथा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का कार्य करते हैं। यही कारण है कि आज भी विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों, महोत्सवों और शैक्षणिक संस्थानों में इन कलाओं को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। भारतीय संगीत और नृत्य की यह गौरवशाली परंपरा न केवल देश की सांस्कृतिक पहचान को विश्व पटल पर स्थापित करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और गौरव का स्रोत भी बनी हुई है। इस अवसर मुख्यातिथि डॉ. ममता सचदेवा ने प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र भी वितरित किए।
इस अवसर पर विभाग के अध्यक्ष डॉ. अशोक शर्मा ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएँ युवा पीढ़ी को भारतीय संगीत एवं सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने संस्कार भारती व मैत्रेयी शाखा के सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हुए भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन की प्रतिबद्धता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि 12 दिवसीय इस कार्यशाला में विभिन्न आयु वर्ग के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को भारतीय शास्त्रीय संगीत के गायन तथा ताल पक्ष एवं कत्थक नृत्य की विधाओं का व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया। तबला कार्यशाला में प्रतिभागियों को ताल, लय, विभिन्न बोलों तथा संगत की बारीकियों का प्रशिक्षण दिया गया। गायन कार्यशाला के अंतर्गत स्वर साधना, रागदारी संगीत, बंदिशों एवं प्रस्तुति कौशल पर विशेष ध्यान दिया गया। वहीं नृत्य कार्यशाला में शास्त्रीय नृत्य की मूलभूत तकनीकों, हस्त मुद्राओं, भाव-अभिनय तथा मंच प्रस्तुति की विधियों का प्रशिक्षण प्रदान किया गया। कार्यशाला के विषय विशेषज्ञ और प्रशिक्षक के रूप में शास्त्रीय गायन में पारितोष, सुरेश व नवजोत सिंह, तबला विषय में सुरेंद्र व अरविंद भट्ट, तथा कत्थक नृत्य में डॉ. पूजा चौधरी, संजना रानी और मृत्तिका ने सराहनीय भूमिका निभाई।
कार्यक्रम का संचालन विभाग सहायक प्राध्यापक डॉ. पुरषोत्तम द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रो. शुचिस्मिता शर्मा, प्रो. कृष्णा देवी, डॉ. अनिता भटनागर, प्रो. सुनीता दलाल, डॉ. अनीता दुआ, प्रो. सुनीता सिरोहा, डॉ. सलोनी धीमान, डॉ. आशीष सबरवाल, डॉ. मेघा सहित शोधार्थी, विद्यार्थी उपस्थित थे।
