कुरुक्षेत्र, 13 जुलाई : देश के विभिन्न राज्यों सहित विश्व स्तर पर भगवान श्री कृष्ण के श्री मुख से उत्पन्न गीता का प्रचार प्रसार कर रहे अंतर्राष्ट्रीय गीता मिशन ओडिशा के अध्यक्ष संत डा. स्वामी चिदानंद ने कहा कि अगर आप बिना किसी अपेक्षा के किसी की मदद करते हैं तो वहीं से भक्ति शुरू होती है गीता का यही सच्चा योग है।
उन्होंने कहा कि श्रीमद भगवत गीता का यही मूल सार है। जब आप किसी फल, प्रशंसा या बदले की अपेक्षा (निष्काम भाव) के बिना कर्म करते हैं, तो आपका अहंकार पिघलने लगता है। यही अनासक्त कर्म और निस्वार्थ सेवा ही वास्तविक भक्ति और सच्चा कर्मयोग है।
संत डा. स्वामी चिदानंद ने कहा कि अनासक्त कर्म और निस्वार्थ सेवा ही वास्तविक भक्ति और सच्चा कर्मयोग है। श्रीमद भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी निष्काम कर्म को मुक्ति का मार्ग बताया है। जब मनुष्य स्वार्थ और फलासक्ति से मुक्त होकर अपने कर्तव्य का पालन करता है, तो उसके सभी कर्म ईश्वर को समर्पित हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर नहीं। कर्मयोगी परिणाम की चिंता किए बिना अपना कार्य पूरी निष्ठा से करते हैं। जब कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से (बिना किसी अहंकार या प्रतिफल की अपेक्षा के) दूसरों की सेवा करता है, तब उसका मन शुद्ध होता है। सच्चा कर्मयोगी सफलता और असफलता तथा लाभ और हानि में समान (समबुद्धि) रहता है। जब कर्म को एक पूजा या यज्ञ समझकर किया जाता है, तब कर्मयोग और भक्तियोग एक हो जाते हैं। इस अवसर पर डा. संजीव त्यागी, मनोरमा त्यागी, हरिओम प्रकाश व राजेश्वर प्रसाद भी मौजूद रहे।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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