कुरुक्षेत्र, 17 जून। धर्मनगरी कुरुक्षेत्र की 48 कोस की धरा पवित्रता से परिपूर्ण है। ब्रह्मसरोवर में सूर्य ग्रहण और अमावस स्नान का विशेष महत्व है। वहीं काम्यकेश्वर तीर्थ में स्नान करने से हर की पौड़ी जितना स्नान मिलता है। वनवास के दौरान पांडवों की शरण स्थली रहा काम्यकेश्वर तीर्थ पर रविवारीय शुक्ला सप्तमी पर स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। ज्येष्ठ माह में 21 जून को रविवारीय शुक्ला सप्तमी मेले का आयोजन होगा।
धार्मिक मान्यता के अनुसार रविवारीय शुक्ल सप्तमी के दिन तीर्थ में स्नान करने से मोक्ष व पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। महर्षि पुलस्त्य जी और महर्षि लोमहर्षण जी ने वामन पुराण में का यकवन तीर्थ की उत्पति का वर्णन करते हुए बताया कि इस तीर्थ की उत्पति महाभारत काल से पूर्व की है। एक वार नैमिषारण्य के निवासी बहुत ज्यादा संख्या में कुरुक्षेत्र की भूमि के अंतर्गत सरस्वती नदी में स्नान करने हेतु काम्यवक वन में आए थे। वे सरस्वती में स्नान न कर सके। उन्होंने यज्ञोपवितिक नामक तीर्थ की कल्पना की और स्नान किया, फिर भी शेष लोग उस में प्रवेश ना पा सके तब से मां सरस्वती ने उनकी इच्छा पूर्ण करने के लिए साक्षात कुंज रूप में प्रकट होकर दर्शन दिए और पश्चिम-वाहनी होकर बहने लगी। इससे स्पष्ट होता है कि काम्यकेश्वर तीर्थ एवं मंदिर की उत्पति महाभारत काल से पूर्व की है।
वामन पुराणा के अध्याय 2 के 34 वें श्लोक के काम्यकवन तीर्थ प्रसंग में स्पष्ट लिखा है कि रविवार को सूर्य भगवान पूषा नाम से साक्षात रूप से विद्यमान रहते हैं। इसलिए वनवास के समय पांडवों ने इस धरा को तपस्या हेतु अपनी शरणस्थली बनाया। द्यूत-क्रीड़ा में कौरवों से हारकर अपने कुल पुरोहित महर्षि धौम्य के साथ 10 हजार ब्राह्मणों के साथ यहीं रहते थे। उनमें 1500 के लगभग ब्राह्मण श्रोत्रिय-निष्ठ थे जो प्रतिदिन वैदिक धर्मानुष्ठान एवं यज्ञ करते थे। उन्होंने स्नान एवं यज्ञोपवीतक नामक तीर्थ की कल्पना की परंतु ब्राह्मण उसमें स्नान ना कर सके फिर उन्होंने सरस्वती को आह्वान किया, तब सरस्वती यहां कुआं रूप में प्रकट होकर पश्चिमी-वाहनी होकर बहने लगी। सूर्य भगवान इस तीर्थ में पूषा के नाम से विद्यामान रहते हैं और इस तीर्थ में ही सूर्य का मिलन उनकी धर्मनगरी संज्ञा के साथ हुआ था, जो घोड़ी रूप धारण करके काम्ययक वन में भ्रमण कर रहीं थी।
