किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके प्राकृतिक संसाधनों या भौतिक संपदा में नहीं, बल्कि उसकी मानव पूंजी में निहित होती है। मानव पूंजी का निर्माण जन्म के बाद नहीं, बल्कि जीवन के प्रारंभिक वर्षों से ही आरम्भ हो जाता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि बच्चे के मस्तिष्क का लगभग 85 प्रतिशत विकास छह वर्ष की आयु तक हो जाता है। यही वह अवस्था है जब पोषण, स्वास्थ्य, भाषा, सामाजिक संपर्क और सीखने के अनुभव उसके संपूर्ण जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। इसलिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ECCE) को आज मानव विकास और आर्थिक प्रगति का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
भारत में लंबे समय तक आँगनवाड़ी व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य बच्चों को कुपोषण, बीमारी और मृत्यु के जोखिम से बचाना था। एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) कार्यक्रम के अंतर्गत स्थापित आँगनवाड़ी केंद्रों ने लाखों बच्चों और माताओं को पोषण, टीकाकरण तथा स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान कर बाल मृत्यु दर और कुपोषण को कम करने में उल्लेखनीय योगदान दिया। किंतु बदलते समय और नई वैज्ञानिक समझ ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल बच्चों को जीवित रखना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी बच्चे को पोषण तो मिल जाए, लेकिन सीखने, सोचने, संवाद करने और अपनी रचनात्मकता विकसित करने का अवसर न मिले, तो उसका संज्ञानात्मक विकास अधूरा रह जाता है। यही कारण है कि आज “सर्वाइवल” से “थ्राइविंग” अर्थात केवल जीवित रहने से समग्र विकास की ओर बढ़ने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इस सोच को नई दिशा प्रदान की है। नीति ने तीन से आठ वर्ष की आयु को शिक्षा का आधारभूत चरण माना है और यह स्वीकार किया है कि प्रारंभिक वर्षों में प्राप्त अनुभव आगे की शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण को गहराई से प्रभावित करते हैं। इसी दृष्टिकोण के तहत आँगनवाड़ी प्रणाली को केवल पोषण वितरण केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि प्रारंभिक शिक्षण और बाल विकास के केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF-FS 2022) ने खेल-आधारित, गतिविधि-आधारित और अनुभवात्मक शिक्षण पर बल देकर बच्चों के भाषा विकास, तार्किक क्षमता, रचनात्मकता और सामाजिक कौशल को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
हाल के वर्षों में सरकार ने सक्षम आँगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 जैसी पहलों के माध्यम से आँगनवाड़ी केंद्रों को आधुनिक स्वरूप देने का प्रयास किया है। इन केंद्रों में बेहतर भवन, स्मार्ट शिक्षण सामग्री, डिजिटल रिकॉर्ड प्रबंधन और बच्चों के विकास की सतत निगरानी पर बल दिया जा रहा है। “पोषण ट्रैकर” जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से बच्चों की स्वास्थ्य और पोषण संबंधी जानकारी का रिकॉर्ड रखा जा रहा है, जिससे सेवा वितरण अधिक पारदर्शी और प्रभावी बन रहा है। साथ ही आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को बाल मनोविज्ञान, खेल-आधारित शिक्षण और प्रारंभिक शिक्षा के आधुनिक तरीकों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि वे बच्चों के संज्ञानात्मक विकास में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकें।
यह परिवर्तन केवल सामाजिक कल्याण का विषय नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी आर्थिक परिणाम भी हैं। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि प्रारंभिक बाल्यावस्था में किया गया निवेश सबसे अधिक प्रतिफल देने वाला सार्वजनिक निवेश होता है। जो बच्चे प्रारंभिक वर्षों में बेहतर पोषण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करते हैं, उनकी सीखने की क्षमता अधिक विकसित होती है, वे विद्यालय में बेहतर प्रदर्शन करते हैं और भविष्य में अधिक उत्पादक नागरिक बनते हैं। इस प्रकार आँगनवाड़ी प्रणाली में सुधार सीधे तौर पर मानव पूंजी निर्माण को मजबूत करता है, जो किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास का मूल आधार है।
संज्ञानात्मक विकास पर आधारित ECCE व्यवस्था भविष्य में कार्यबल की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाएगी। बेहतर सोचने, समस्या समाधान करने और नवाचार करने की क्षमता वाले नागरिक देश की उत्पादकता में वृद्धि करते हैं। आज की वैश्विक ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में केवल शारीरिक श्रम पर्याप्त नहीं है, बल्कि बौद्धिक क्षमता और कौशल ही आर्थिक प्रतिस्पर्धा का आधार बनते जा रहे हैं। ऐसे में प्रारंभिक बाल्यावस्था में निवेश भारत को अधिक सक्षम और प्रतिस्पर्धी कार्यबल प्रदान कर सकता है।
इसके अतिरिक्त, गुणवत्तापूर्ण आँगनवाड़ी सेवाएँ महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी को भी बढ़ावा दे सकती हैं। जब परिवारों को बच्चों की सुरक्षित देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा की व्यवस्था उपलब्ध होती है, तो महिलाएँ रोजगार, स्वरोजगार और उद्यमिता में अधिक सक्रिय रूप से भाग ले सकती हैं। भारत में महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर को बढ़ाना आर्थिक विकास की महत्वपूर्ण आवश्यकता है, और आँगनवाड़ी प्रणाली इसमें सहायक भूमिका निभा सकती है।
आँगनवाड़ी सुधार सामाजिक असमानताओं को कम करने का भी प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। गरीब और वंचित वर्गों के बच्चों को अक्सर वह प्रारंभिक अवसर नहीं मिल पाता जो अपेक्षाकृत समृद्ध परिवारों के बच्चों को सहज रूप से उपलब्ध होता है। यदि आँगनवाड़ी केंद्र गुणवत्तापूर्ण ECCE सेवाएँ प्रदान करते हैं, तो यह अवसरों की समानता सुनिश्चित करने में मदद करेगा। इससे शिक्षा, रोजगार और आय के क्षेत्र में मौजूद असमानताओं को कम करने का मार्ग प्रशस्त होगा।
हालाँकि इस परिवर्तन की राह पूरी तरह सरल नहीं है। देश के अनेक आँगनवाड़ी केंद्र अभी भी अवसंरचनात्मक कमियों से जूझ रहे हैं। कई स्थानों पर भवन, स्वच्छ पेयजल, शौचालय और शिक्षण सामग्री का अभाव है। आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं पर अनेक प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ होने के कारण वे बच्चों के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पातीं। प्रशिक्षण, वित्तीय संसाधनों और तकनीकी सहायता की कमी भी प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बन सकती है। इसलिए केवल नीतिगत घोषणाएँ पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि इनके लिए पर्याप्त बजटीय समर्थन, नियमित प्रशिक्षण और मजबूत निगरानी तंत्र की भी आवश्यकता होगी।
भारत वर्तमान में जनसांख्यिकीय लाभांश के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी तभी आर्थिक शक्ति में परिवर्तित हो सकती है जब उसकी नींव मजबूत हो। यह नींव विद्यालय या विश्वविद्यालय में नहीं, बल्कि आँगनवाड़ी केंद्रों और प्रारंभिक बाल्यावस्था के अनुभवों में तैयार होती है। इसलिए आँगनवाड़ी प्रणाली का पोषण-केंद्रित मॉडल से समग्र संज्ञानात्मक विकास आधारित मॉडल की ओर संक्रमण केवल शिक्षा या बाल कल्याण का विषय नहीं है, बल्कि यह भारत के आर्थिक भविष्य, सामाजिक न्याय और सतत विकास से जुड़ा राष्ट्रीय एजेंडा है।
यदि भारत अपने प्रत्येक बच्चे को जीवन के प्रारंभिक वर्षों में पोषण, सुरक्षा, स्नेह और गुणवत्तापूर्ण सीखने का वातावरण प्रदान करने में सफल होता है, तो यह निवेश आने वाले दशकों में अधिक उत्पादक नागरिकों, मजबूत अर्थव्यवस्था, कम असमानता और अधिक समावेशी विकास के रूप में प्रतिफल देगा। इस दृष्टि से आँगनवाड़ी प्रणाली में हो रहा वर्तमान परिवर्तन भारत के भविष्य को आकार देने वाला एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध हो सकता है।
