कुरुक्षेत्र, 12 जून : गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी के सान्निध्य में पुरुषोत्तम मास के अवसर पर रेलवे रोड स्थित अग्रवाल धर्मशाला में दिव्य गीता सत्संग आयोजित किया गया। दुखभंजन कालोनी निवासी डाक्टर श्यामलाल शर्मा, चंद्रिका शर्मा, राजेश सिंगला तथा प्राची सिंगला के परिवार द्वारा आयोजित इस सत्संग में भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज का अग्रवाल धर्मशाला में पहुंचने पर श्रीवैश्य अग्रवाल पंचायत के प्रधान विशाल सिंगला तथा उनके साथियों ने स्वामी जी का स्वागत किया और स्मृृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने पुष्प गुच्छ तथा फूल मालाओं द्वारा गीता मनीषी का अभिनंदन किया।
व्यास पीठ से आशीवर्चन करते हुए गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने कहा कि भगवान के नाम का सुमिरन करने से मानसिक शांति मिलती है। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र की धरा को वह गौरव प्राप्त है जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्त अर्जुन के प्रेम के वशीभूत होकर 18 दिन तक रथ के घोड़े हांके  थे और स्वयं सारथी बनकर अर्जुन को ऊचे स्थान पर बैठाया था।  गीता मनीषी ने कहा कि भगवान के नाम का सुमिरन करते हुए प्रत्येक कार्य करना चाहिए। अर्जुन के पास भगवान श्रीकृष्ण थे वह संतुष्ट और शांत था। जबकि दुर्योधन के पास सबकुछ था लेकिन वह परेशान रहता था। अर्जुन को भगवान में विश्वास था। इसी प्रकार सुदामा भगवान की शरण में था तो वह दरिद्र होते हुए भी संतुष्ट था लेकिन कंस राजा होते हुए भी परेशान था। जब सुदामा अपने सखा द्वारकाधीश से मिलने गया तो भगवान ने उसे ऊंचे सिहांसन पर बिठाया और स्वयं  नीचे बैठे। यह सुदामा के विश्वास और नाम सुमिरन का ही प्रताप था।  गीता मनीषी ने कहा कि भगवान में अटूट श्रद्धा रखनी चाहिए। भक्ति की श्रद्धा नाम का प्रभाव है। जीवन में संतुष्ट रहने के लिए नाम सुमिरन जरूरी है। उन्होंने कहा कि शबरी को विश्वास था कि भगवान राम उसके द्वार पर आएंगे और इसी विश्वास के कारण भगवान शबरी के यहां पहुंचे। आज भी भगवान का भोग लगाते समय शबरी के बेर और सुदामा के तंदूल से भगवान का भोग लगाया जाता है।
उन्होंने कहा कि दुर्योधन जैसी सोच नहीं रखनी चहिए। पुरुषोत्तम मास का महत्व बताते हुए गीता मनीषी ने कहा कि इस मास में नाम सुमिरन और गीता पाठ का विशेष महत्व है। भगवान में श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए। भगवान अपने भक्त को कभी भी संकट में नहीं आने देते। उन्होंने कहा कि मां का दर्जा भगवान के बराबर है।जब भगवान की स्तुति की जाती है तब त्वमैव माता पहले बोला जाता है। भगवान अपने भक्त को कभी निराश नहीं करते। गीता मनीषी के मुखारविंद से गाए गए भजनों से सारा वातावरण भक्तिमय हो गया। सत्संग में श्रीमद्भगवद गीता के 15वें अध्याय का पाठ भी किया गया। गीता सत्संग के पश्चात आयोजक परिवारों की ओर से विशाल भंडारा आयोजित किया गया

By Dr. Rajesh Wadhwa

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