अंबाला। रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) में तबादला और पोस्टिंग व्यवस्था को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। रेलवे बोर्ड द्वारा हाल ही में लागू की गई नई व्यवस्था के तहत देशभर के 17 जोनों के आईजी और 67 कमांडेंट/सीनियर कमांडेंट के तबादला संबंधी अधिकारों में भारी कटौती कर दी गई है।

इसके बाद आरपीएफ के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। पहले मंडल स्तर पर कमांडेंट अपने कार्यकाल पूरा कर चुके कॉन्स्टेबल से लेकर सब-इंस्पेक्टर तक के तबादले कर सकते थे, जबकि जोनल आईजी के पास इंस्पेक्टर रैंक तक के अधिकारियों के स्थानांतरण का अधिकार था।
अब यह प्रक्रिया लगभग पूरी तरह केंद्रीकृत कर दी गई है और आरोप है कि “कंप्यूटर आधारित सिस्टम” यह तय कर रहा है कि किस कर्मचारी या अधिकारी को कहां भेजा जाएगा। सूत्रों के अनुसार नई व्यवस्था लागू होते ही महज दो दिनों में कॉन्स्टेबल से लेकर इंस्पेक्टर रैंक तक के सैकड़ों तबादले कर दिए गए। इससे कई अधिकारियों और कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ गई है।

पहले कमांडेंट अपने मंडल में कार्यकाल पूरा कर चुके कॉन्स्टेबल से लेकर सब-इंस्पेक्टर तक के तबादले कर सकते थे, जबकि जोनल आईजी के पास इंस्पेक्टर रैंक तक के अधिकारियों के स्थानांतरण का अधिकार था।

लेकिन नई नीति के बाद यह अधिकार लगभग समाप्त हो गए हैं। अब तबादलों का फैसला केंद्रीकृत कंप्यूटर प्रणाली के जरिए किया जा रहा है, जिससे यह तक स्पष्ट नहीं है कि किस कर्मचारी या अधिकारी का तबादला किस आधार पर और कहां होगा।

प्रमोशन मिला, लेकिन ‘घर’ छूटा

विवाद का दूसरा बड़ा कारण इंस्पेक्टर से (सहायक सुरक्षा आयुक्त (एएससी) पद पर पदोन्नति के बाद की जा रही पोस्टिंग है। विभागीय सूत्रों का आरोप है कि रेलवे बोर्ड की अपनी ट्रांसफर नीति और रीजनल पोस्टिंग सर्कुलर को दरकिनार कर अधिकारियों को उनके पेरेंट रीजन से बाहर भेजा जा रहा है।

रेलवे बोर्ड के सर्कुलर में स्पष्ट उल्लेख है कि प्रमोट होकर एसी/एएससी बनने वाले अधिकारियों को प्राथमिकता के आधार पर उसी क्षेत्र में तैनात किया जाना चाहिए जहां वे पहले से कार्यरत रहे हैं। इसके पीछे स्थानीय भाषा, प्रशासनिक समझ और क्षेत्रीय कार्यप्रणाली की जानकारी को प्रमुख आधार बताया गया था।

पांच रीजन की नीति, फिर बाहर क्यों पोस्टिंग?

आरपीएफ को उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और उत्तर-पूर्व फ्रंटियर सहित पांच क्षेत्रों में बांटा गया था ताकि पदोन्नति के बाद अधिकारियों की पोस्टिंग उसी रीजन में हो सके।

लेकिन हालिया आदेशों में कई अधिकारियों को दूसरे क्षेत्रों में भेजे जाने से सवाल खड़े हो गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि दूरस्थ जोनों में भेजे जाने से न केवल पारिवारिक समस्याएं बढ़ रही हैं, बल्कि भाषा और स्थानीय परिस्थितियों की जानकारी न होने से कार्यकुशलता भी प्रभावित हो सकती है।

रेलवे बोर्ड अपनी ही नीति भूल गया?

आरपीएफ के भीतर सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब रेलवे बोर्ड ने स्वयं रीजनल पोस्टिंग नीति बनाई थी, तो उसका पालन क्यों नहीं किया जा रहा? विभागीय गलियारों में चर्चा है कि नई केंद्रीकृत व्यवस्था ने स्थानीय प्रशासनिक अधिकारों को लगभग खत्म कर दिया है।

संवेदनशील पद छोड़ने पर भी तबादला तय

सर्कुलर में यह भी प्रावधान है कि यदि कोई अधिकारी संवेदनशील पद पर रहते हुए प्रमोशन लेने से इनकार करता है, तो उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध भी गैर-संवेदनशील पद पर स्थानांतरित किया जा सकता है।

आरपीएफ में बढ़ती बेचैनी

नई तबादला नीति को लेकर कॉन्स्टेबल से लेकर सहायक कमांडेंट स्तर तक असंतोष की चर्चा है। कई अधिकारी मानते हैं कि पहले की व्यवस्था अधिक व्यावहारिक थी, जबकि मौजूदा सिस्टम में मानवीय और क्षेत्रीय जरूरतों की अनदेखी हो रही है। अब प्रभावित अधिकारी रेलवे बोर्ड से मूल सर्कुलर के अनुसार पोस्टिंग और तबादला नीति की समीक्षा की मांग उठा रहे हैं।

By Dr. Rajesh Wadhwa

778-779, Partap Colony, Railway Road, Near Rudra Cinema, Opp Chaat King India Row, Kurukshetra 136118 Mob. 9896352867, 9467040367

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