कुरुक्षेत्र, 28 मई। ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता-अद्वितीयम् अद्भुतम’’ बौद्धिक पंचम मासिक परिचर्चा का आयोजन विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान में किया गया। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान, कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड एवं गुलजारी लाल नन्दा केन्द्र, कुरुक्षेत्र के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘गीता में दिव्य उपकरण’’ विषय पर आयोजित परिचर्चा का शुभारंभ विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान की अध्यक्षा डाॅ. ममता सचदेवा एवं अन्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ। उनके साथ मंचासीन कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के सदस्य अशोक रोशा, विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सदस्य कृष्ण कुमार भंडारी, गुलजारीलाल नन्दा केन्द्र, कुरुक्षेत्र की निदेशक प्रो. शुचिस्मिता, रत्नचंद सरदाना भी साथ रहे। इस अवसर पर श्रीमद्भगवद्गीता के आमंत्रण गीत का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के प्रबंधक सुधीर कुमार ने मंचासीन अतिथियों एवं प्रबुद्धजनों का परिचय कराया। उन्होंने कहा कि विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए देशभर में कार्य करती है। हाल ही में रा.स्व.संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर पंच परिवर्तन का आग्रह उसमें विशेषकर स्व के बोध की बात की गई, जिसमें अपनी संस्कृति, सभ्यता, परम्पराएं, जीवन मूल्यों के बारे में जानकर स्वाभिमान जाग्रत होता है तो वास्तव में अच्छे परिणाम मिलते हैं। के.डी.बी. सदस्य अशोक रोशा ने कुरुक्षेत्र के प्राचीन शहर थानेसर के अस्तित्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यहां के सात वनों में से स्थाणु वन था जिसमें विश्व का सबसे पुराना शिवलिंग था जो ब्रह्मा जी द्वारा स्थापित था। स्थाणु तीर्थ के नाम से इस स्थान का नाम स्थाणेश्वर पड़ा। प्रो. शुचिस्मिता ने कहा कि इस परिचर्चा के माध्यम से हम गीता जी के नए आयामों को जानते हैं और आज के परिप्रेक्ष्य में जीवन के साथ उसको कैसे हम जोड़कर देख सकते हैं, इस ओर भी हमारा अनुभव बढ़ता है।
परिचर्चा प्रणेता कृष्ण कुमार भंडारी ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता में केवल सिद्धांत नहीं है अपितु गीता में भगवान ने दिव्य उपकरण भी दिए हैं, जिसके द्वारा हम जीवन को उन्नत बना सकते हैं। उन्होंने गीता के उपकरणों को दो भागों 5 डब्ल्यू, 2 एच के माध्यम से विस्तारित किया। उन्होंने प्राणायाम और ध्यान रूपी दिव्य उपकरण पर कहा कि इस विषय पर भी भगवान ने कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन को विषाद आने पर ज्ञान दिया। उन्होंने कहा कि आज युवा सिद्धांतों पर बात नहीं करना चाहता। अगर गीता में कुछ टूल्स मिल रहे हैं तो श्रीमद्भगवद्गीता में उसका आकर्षण अवश्य होता है। गीता युवाओं के लिए नहीं अपितु बालक, युवा, प्रौढ़ और वृद्ध सभी के लिए है।
इस अवसर पर डाॅ. ममता सचदेवा ने कहा कि गीता केवल भारतीय ग्रंथ नहीं अपितु मानव जीवन को दिशा देने वाला दिव्य मार्गदर्शक है। यह हमें विवेक, आत्मसंयम, श्रद्धा, धैर्य और निष्काम कर्म जैसे आंतरिक उपकरण प्रदान करता है। गीता के दिव्य उपकरण मनुष्य को भीतर से भी सशक्त बनाने का कार्य करते हैं। गीता हमें सिखाती है कि कर्म भी एक टूल है। आसक्ति या फल की चिंता को छोड़कर अपना कर्तव्य करना सबसे बड़ा उपकरण है। उन्होंने कहा कि अशांत मन को अभ्यास और वैराग्य से वश में कर सकते हैं। इस अवसर पर डाॅ. सी.डी.एस. कौशल, धर्मपाल शास्त्री, धनंजय शास्त्री, संत कुमार, ज्योतिमा नारंग, रमेश गुलाटी, डाॅ. अमित धीमान, देवराज जैन, सुदर्शन शर्मा, कृष्ण कुमार मिश्रा, डाॅ. जोधाराम, श्री सोमदत्त सहित अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।
