कुरुक्षेत्र 29 जुलाई 2026 :
गुरुकुल कुरुक्षेत्र के पवित्र प्रांगण में मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में पधारे प्रसिद्ध वैदिक विद्वान एवं ओजस्वी वक्ता आचार्य वीरेन्द्र रत्नम् जी का भव्य स्वागत किया गया। गुरुकुल के निदेशक ब्रिगेडियर डाॅ. प्रवीण कुमार ने आचार्य जी का गुरुकुल आगमन पर हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए स्वागत किया। इस अवसर पर गुरुकुल के प्राचार्य सूबे प्रताप, संस्कृत विभागाध्यक्ष आचार्य दयाशंकर, व्यवस्थापक रामनिवास आर्य, मुख्य संरक्षक संजीव आर्य सहित अध्यापकवृन्द एवं संरक्षकगण मौजूद रहे। डॉ. शर्मा ने बताया कि आचार्य वीरेन्द्र रत्नम् जी स्वामी दयानंद सरस्वती जी के विचारों के संवाहक हैं। वे आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रांतीय उपाध्यक्ष हैं तथा शिक्षा एवं समाजसेवा के क्षेत्र में उन्हें “डी लिट और डाॅक्टरेट ” की मानद उपाधियों से अलंकृत किया जा चुका है। उन्होंने पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश आदि अनेक राज्यों में आर्य समाज के सिद्धांतों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया है।
विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता आचार्य वीरेन्द्र रत्नम् जी ने अपने ओजस्वी व्याख्यान में कहा कि मानव जीवन परमात्मा द्वारा प्रदत्त एक अत्यंत अनमोल रत्न है। ईश्वर ने मनुष्य को सोचने, हँसने और मधुर वाणी बोलने का जो सामर्थ्य दिया है, वह अन्य किसी भी प्राणी को प्राप्त नहीं है। अतः प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी बुद्धि, विवेक और वाणी का सदैव सदुपयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो छात्र अपने माता-पिता, आचार्यों एवं गुरुजनों का आदर-सम्मान करते हैं, सफलता स्वयं उनके कदम चूमती है।
संस्कृत के प्रसिद्ध श्लोक का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा- जिस मनुष्य के पास विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील, गुण और धर्म नहीं हैं, वह मनुष्य रूप में होते हुए भी इस धरती पर भारस्वरूप पशु के समान जीवन व्यतीत करता है। शिक्षा और संस्कार ही मानव जीवन को वास्तविक दिशा प्रदान करते हैं। उन्होंने देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का उदाहरण देते हुए बताया कि एक साधारण परिवार में जन्म लेने के बावजूद शास्त्री जी ने अपने महान कर्मों से इतिहास में अमर स्थान प्राप्त किया।
पाप और अपराध के अंतर को स्पष्ट करते हुए आचार्य जी ने कहा कि जब तक कोई बुरा विचार मन में रहता है, वह पाप है, किंतु जब वही विचार आचरण या कर्म का रूप ले लेता है, तो वह अपराध बन जाता है। इसलिए विद्यार्थियों को मन, वचन और कर्म तीनों से पवित्र रहकर छोटी से छोटी भूलों और बुराइयों से दूर रहना चाहिए।
व्याख्यान के अंत में आचार्य जी ने आह्वान किया कि केवल ऊँचे पद या स्थान पर बैठने से कोई महान नहीं बनता, बल्कि श्रेष्ठ कर्मों और सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्वहन से ही मनुष्य की महानता सिद्ध होती है। अनिश्चितता एवं कठिनाइयों के समय मानव को अपने विवेक का प्रयोग कर आगे बढ़ना चाहिए।
अन्त में प्राचार्य सूबेप्रताप ने गुरुकुल में पधारकर विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करने के लिए आचार्य वीरेन्द्र रत्नम् जी का आभार व्यक्त किया। छात्रों की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच इस बेहद प्रेरक कार्यक्रम का समापन हुआ।
