रेवाड़ी में भगवान जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के पावन अवसर पर शहर बारा हजारी स्थित वृंदावन चौक प्राचीन जगन्नाथ मंदिर सहित विभिन्न स्थानों से भव्य रथयात्रा निकाली गई जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को रथ पर विराजमान कर नगर परिक्रमा कराई गई। ढोल-नगाड़ों और धार्मिक भजनों के साथ श्रद्धालु रथ खींचते हुए चल रहे हैं। यात्रा के मार्गों पर भक्तों के लिए विशेष भंडारे और प्रसाद वितरण का आयोजन किया गया है। रेवाड़ी में दशकों से यह रथयात्रा महोत्सव स्थानीय स्तर पर एक प्रमुख धार्मिक उत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है। पंडित टेकचंद गौड़ के सानिध्य में रवि भट्टेवाला, पवन एम्पोरियम तथा रमेश वशिष्ठ आदि अतिथियों ने हरी झंडी दिखाकर शोभायात्रा को रवाना किया।
रेवाड़ी सनातन धर्म से धर्माचार्य पंडित दिलीप शास्त्री बताते हैं कि रेवाड़ी शहर में इस बार 16 जुलाई को आज भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जा रही है। यह सुखद संयोग 148 वर्ष बाद बना है जब 16 जुलाई को यह यात्रा निकाली गई है। रेवाड़ी शहर में पहली बार भगवान जगन्नाथ रथयात्रा 16 जुलाई 1878 को निकाली गई थी। रेवाड़ी शहर का पहला प्रवेश द्वार भी भगवान जगन्नाथ के नाम से ही जगन द्वार था जो जगन गेट के नाम से जाना गया। पिछले 148 सालों से निर्बाध चल रही इस यात्रा के साथ अनेक प्रसंग जुड़े हुए हैं। 1947 की मारकाट हो, आपातकाल हो, 1984 के दंगें हों या कोराना काल हो यह यात्रा लगातार चलती रही है स्वयं अंग्रेज भी इस यात्रा के मुरीद रहे हैं। बारा हजारी के वृंदावन चौक पर स्थित प्राचीन जगन्नाथ मंदिर अपने साथ इतिहास की अनेक परतें समेटे हुए है। बताया जाता है कि पहली रथ यात्रा के लिए सात जुलाई 1878 को अनुमति और लायसेंस मिला। 16 जुलाई 1878 को मोती चौक स्थित द ब्रेन कॉपरेटिव सोसायटी पर बैठकर अंग्रेज अधिकारी मिस्टर ब्रेन ने इस यात्रा का अवलोकन किया था। भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद है कि तब से लेकर यह यात्रा बिना किसी अवरोध के चल रही है। पंडित दिलीप शास्त्री ने बताया कि नगर के प्रवेश द्वारों में सबसे पहला गेट जगन गेट था जिसे जगन द्वार कहा जाता था। नगर भ्रमण को निकले भगवान जगन्नाथ का रथ वापिसी में इसी रास्ते से शहर में प्रवेश करता था। उस समय रेवाड़ी भी बूढी रेवाड़ी कहलाती थी। आजादी से पूर्व एक बार तो यात्रा की अनुमति लाहोर से जारी की गई थी। पिछले 150 सालों में अनेक आयोजन समाप्त हुए हैं किंतु भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वर्तमान राव तुलाराम पार्क में रेवाड़ी रामलीला कमेटी द्वारा संचालित प्राचीन रामलीला भी 1962 में बंद कर दी गई, किंतु जगन्नाथ यात्रा के प्रति लोगों का सद्भाव बना रहा। 1947 का कत्लेआम हो, 1975 का आपातकाल हो, 1984 के दंगें हों या 2020 का कोरोना काल हो यह यात्रा निरंतर जारी है। श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया है। 14 से 16 जुलाई तक मंदिर में भक्ति धारा बह रही है शोभायात्रा यात्रा में आज भजन-कीर्तन और नगर भ्रमण के दौरान मथुरा, अलवर, दिल्ली, पलवल, खैरथल आदि स्थानों से शहनाई, ढ़ोल, ताशा, नगाड़ा और गतका पार्टी की जुगलबंदी देखने को मिली।
