– डॉ. प्रियंका सौरभ
भारतीय समाज में परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि विश्वास, त्याग, साझेदारी और पारस्परिक उत्तरदायित्व की एक जीवंत संस्था रहा है। इस संस्था की सबसे बड़ी शक्ति यह रही कि इसमें अधिकार और कर्तव्य दोनों साथ-साथ चलते थे। समय बदला, शिक्षा का विस्तार हुआ, महिलाओं की भागीदारी घर की चौखट से निकलकर शिक्षा, प्रशासन, चिकित्सा, न्याय, सेना, विज्ञान और उद्योग तक पहुँची। आर्थिक आत्मनिर्भरता ने महिलाओं को नया आत्मविश्वास दिया, निर्णय लेने की क्षमता दी और उन्हें सामाजिक सम्मान भी दिलाया। यह परिवर्तन न केवल आवश्यक था, बल्कि एक न्यायपूर्ण समाज की दिशा में महत्वपूर्ण कदम भी था।
लेकिन हर सामाजिक परिवर्तन अपने साथ नई चुनौतियाँ भी लेकर आता है। आज जब परिवारों में पति-पत्नी दोनों कमाने लगे हैं, तब आर्थिक साझेदारी के साथ जिम्मेदारियों की साझेदारी का प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। दुर्भाग्य से अनेक परिवारों में यह संतुलन बिगड़ता दिखाई देता है। कहीं अधिकारों पर अधिक जोर है तो कहीं कर्तव्यों की उपेक्षा। परिणामस्वरूप रिश्तों में वह सहजता और अपनापन कम होता जा रहा है जो कभी संयुक्त परिवारों की पहचान हुआ करता था।
लंबे समय तक भारतीय समाज में पुरुष को परिवार का आर्थिक आधार माना गया। उसकी कमाई पर पत्नी, बच्चों और माता-पिता का नैतिक अधिकार समझा जाता था। वह अपनी आय को व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि पूरे परिवार की पूंजी मानकर चलता था। दूसरी ओर, महिलाओं का योगदान घरेलू श्रम, बच्चों के पालन-पोषण और परिवार के संचालन में अधिक दिखाई देता था। आधुनिक समय में परिस्थितियाँ बदली हैं। महिलाएँ भी पुरुषों के समान मेहनत करके आर्थिक योगदान दे रही हैं। ऐसे में स्वाभाविक अपेक्षा यह थी कि आर्थिक जिम्मेदारियाँ भी समान रूप से साझा होंगी। किंतु व्यवहार में कई बार तस्वीर इतनी सरल नहीं होती।
आज अनेक परिवारों में यह अनुभव सुनने को मिलता है कि पति की आय को अभी भी घर की मुख्य आय माना जाता है, जबकि पत्नी की आय को व्यक्तिगत बचत, व्यक्तिगत निवेश या व्यक्तिगत स्वतंत्रता का माध्यम समझा जाता है। यह स्थिति हर परिवार में नहीं है, पर जहाँ है, वहाँ असंतोष का कारण बनती है। यदि घर का हर बड़ा खर्च पति वहन करे, लेकिन पत्नी की आय को पारिवारिक उत्तरदायित्व से अलग रखा जाए, तो बराबरी का सिद्धांत अधूरा रह जाता है। इसी प्रकार यदि पति यह अपेक्षा करे कि पत्नी नौकरी भी करे, घर भी संभाले और आर्थिक निर्णयों में उसकी स्वतंत्रता भी न हो, तो यह भी अन्यायपूर्ण है। समस्या किसी एक पक्ष की नहीं, बल्कि दोहरे मापदंडों की है।
बराबरी का अर्थ केवल समान अधिकार नहीं होता। उसका अर्थ समान उत्तरदायित्व भी होता है। यदि दोनों कमाते हैं तो परिवार की आवश्यकताओं, भविष्य की योजनाओं, बच्चों की शिक्षा, बुजुर्गों की देखभाल और आकस्मिक परिस्थितियों की जिम्मेदारी भी दोनों की होनी चाहिए। आर्थिक साझेदारी का अर्थ केवल आय जोड़ना नहीं, बल्कि विश्वास जोड़ना भी है।
समस्या का दूसरा पहलू मनोवैज्ञानिक है। धन केवल सुविधाएँ नहीं देता, वह आत्मविश्वास भी देता है। लेकिन यही आत्मविश्वास यदि अहंकार में बदल जाए तो रिश्तों में दूरी आने लगती है। कभी-कभी देखा जाता है कि जिसकी आय अधिक होती है, वही निर्णयों पर अपना अधिकार अधिक मानने लगता है। यह प्रवृत्ति पुरुषों में भी दिखाई देती रही है और आज कुछ महिलाओं में भी देखने को मिलती है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि आर्थिक अहंकार केवल किसी एक लिंग की समस्या है। धन का अहंकार व्यक्ति को बदलता है, उसका लिंग नहीं।
आज सोशल मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में स्त्री-पुरुष संबंधों को अक्सर संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। एक पक्ष अपने अधिकारों की बात करता है तो दूसरा अपने साथ हुए अन्याय की। इस खींचतान में परिवार, संवाद और साझेदारी पीछे छूट जाते हैं। किसी भी विचारधारा का उद्देश्य यदि संतुलन स्थापित करना है तो उसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन यदि किसी भी विचार की व्याख्या अधिकारों तक सीमित होकर कर्तव्यों को गौण कर दे, तो समाज में असंतुलन पैदा होना स्वाभाविक है।
यह भी सच है कि आज लाखों महिलाएँ अपनी पूरी आय परिवार पर खर्च करती हैं। वे नौकरी के साथ-साथ घर, बच्चों और बुजुर्गों की जिम्मेदारियाँ भी निभाती हैं। अनेक परिवार ऐसे भी हैं जहाँ पति-पत्नी बिना किसी हिसाब-किताब के अपनी कमाई को साझा करते हैं और निर्णय भी मिलकर लेते हैं। इसलिए किसी एक वर्ग को दोषी ठहराना न तो उचित है और न ही तथ्यपरक। सामाजिक विश्लेषण का उद्देश्य आरोप लगाना नहीं, बल्कि प्रवृत्तियों को समझना और समाधान तलाशना होना चाहिए।
समस्या तब गंभीर हो जाती है जब पति-पत्नी के बीच आर्थिक पारदर्शिता समाप्त हो जाती है। आय, बचत, निवेश और खर्च यदि अलग-अलग दुनिया बन जाएँ, तो रिश्तों में संदेह जन्म लेने लगता है। आर्थिक गोपनीयता कभी-कभी भावनात्मक दूरी में बदल जाती है। विवाह साझेदारी का संबंध है, व्यापारिक अनुबंध नहीं। इसमें विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होता है।
आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन संतोष घटा है। आय बढ़ी है, लेकिन संवाद कम हुआ है। स्वतंत्रता बढ़ी है, लेकिन साझेदारी कमजोर हुई है। पहले परिवार सीमित संसाधनों में भी साथ रहते थे क्योंकि निर्णय सामूहिक होते थे। आज संसाधन अधिक हैं, लेकिन कई बार ‘मेरा’ और ‘तेरा’ की मानसिकता रिश्तों को बाँट देती है।
यहाँ एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्या घरेलू श्रम का मूल्य आर्थिक आय से कम है? यदि पत्नी घर संभालती है और पति बाहर कमाता है, तो क्या केवल कमाने वाला ही परिवार चला रहा है? बिल्कुल नहीं। उसी प्रकार यदि पत्नी भी नौकरी करती है, तो क्या घर की सारी जिम्मेदारी उसी पर छोड़ देना उचित है? इसका उत्तर भी नहीं है। परिवार तभी संतुलित रहेगा जब आर्थिक और घरेलू दोनों प्रकार के श्रम का समान सम्मान होगा।
बच्चों पर भी इस बदलते वातावरण का प्रभाव पड़ रहा है। वे अपने माता-पिता को यदि आर्थिक प्रतिस्पर्धा में उलझा हुआ देखते हैं, तो उनके मन में भी रिश्तों की परिभाषा बदलने लगती है। वे सहयोग से अधिक अधिकारों की भाषा सीखते हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए यह चिंता का विषय है। परिवार केवल वर्तमान नहीं बनाता, भविष्य भी गढ़ता है।
समाधान क्या है? समाधान किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने में नहीं, बल्कि पारिवारिक संवाद को मजबूत बनाने में है। विवाह के बाद पति-पत्नी को आर्थिक अपेक्षाओं, बचत, निवेश, पारिवारिक खर्च और व्यक्तिगत आवश्यकताओं पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए। यह तय होना चाहिए कि दोनों अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार परिवार में योगदान देंगे। किसी की आय कम या अधिक होना सम्मान का पैमाना नहीं बनना चाहिए।
आर्थिक स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ स्वच्छंदता नहीं, बल्कि उत्तरदायित्वपूर्ण स्वतंत्रता है। स्वतंत्र व्यक्ति वही है जो अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी स्वीकार करता है। यदि कमाई केवल व्यक्तिगत सुविधा का साधन बन जाए और परिवार की सामूहिक आवश्यकताएँ पीछे छूट जाएँ, तो आर्थिक समृद्धि भी रिश्तों को नहीं बचा सकती।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम समानता की नई परिभाषा गढ़ें। ऐसी समानता जिसमें पुरुष अपनी पारंपरिक श्रेष्ठता छोड़कर साझेदारी स्वीकार करे और महिला अपनी आर्थिक स्वतंत्रता के साथ पारिवारिक उत्तरदायित्व को भी समान सम्मान दे। दोनों एक-दूसरे को प्रतिस्पर्धी नहीं, सहयोगी समझें। विवाह किसी की जीत या हार का मंच नहीं, बल्कि जीवन की साझी यात्रा है।
अंततः याद रखना होगा कि धन जीवन को सुविधाजनक बना सकता है, लेकिन सुखी नहीं बना सकता। बैंक बैलेंस सुरक्षा दे सकता है, लेकिन अपनापन नहीं। महँगे घर बनाए जा सकते हैं, पर परिवार नहीं खरीदे जा सकते। रिश्तों की सबसे बड़ी मुद्रा आज भी विश्वास, संवेदनशीलता, त्याग और परस्पर सम्मान ही है।
जब कमाई रिश्तों से बड़ी होने लगती है, तब परिवार धीरे-धीरे आर्थिक इकाई में बदल जाता है। वहाँ प्रेम की जगह हिसाब ले लेता है, साझेदारी की जगह स्वामित्व और संवाद की जगह तर्क। इसलिए समय रहते यह समझना आवश्यक है कि कमाई जीवन का साधन है, उद्देश्य नहीं। यदि धन रिश्तों को मजबूत करे तो वह वरदान है, लेकिन यदि वही रिश्तों के बीच दीवार बन जाए तो उससे बड़ी विडंबना कोई नहीं।
एक स्वस्थ समाज वही होगा जहाँ स्त्री और पुरुष दोनों आर्थिक रूप से सक्षम हों, दोनों स्वतंत्र हों, दोनों सम्मानित हों और दोनों अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समान निष्ठा से निभाएँ। यही सच्ची समानता है, यही सच्ची साझेदारी है और यही भारतीय परिवार व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति भी।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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