भारतीय सनातन वैदिक संस्कृति में सेवा, प्रेम और सत्संग को मानव जीवन के सर्वोच्च आदर्श और मोक्ष प्राप्ति के साधन माना गया है। ये तीनों स्तंभ मिलकर एक परिपूर्ण, आध्यात्मिक और नैतिक जीवन की नींव रखते हैं। यह विचार मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने डेरा संत प्रेम सिंह जी महाराज द्वारा भारतीय सनातन वैदिक संस्कृति में सेवा, प्रेम एवं सत्संग की प्रासंगिकता विषय पर आयोजित व्याख्यान में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किया। कार्यक्रम का शुभारंभ सबद गायन से हुआ।आश्रम परिसर पहुंचने पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र का सेवादारों द्वारा स्वागत एवं अभिनंदन हुआ।  आश्रम के प्रमुख कार्यक्रम के अध्यक्षता कर रहे संत सतपाल सिंह  महाराज ने मातृभूमि सेवा मिशन द्वारा मानवता की भलाई के लिए चलाई जा रही नि:स्वार्थ सेवा सेवा कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा
सेवा अहंकार को नष्ट करती है और मन में करुणा, प्रेम एवं त्याग के बीज बोती है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा भारतीय संस्कृति में सेवा और सत्संग दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। सत्संग से जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है, सेवा उसे कर्म में बदल देती है। ज्ञान और कर्म का यह समन्वय ही व्यक्ति को एक आदर्श और सुखी जीवन प्रदान करता है।आज के भागदौड़ भरे और तनावपूर्ण जीवन में, सत्संग मानसिक अवसाद को कम करके आंतरिक शांति प्रदान करता है। यह व्यक्ति को सही और गलत के बीच का विवेक प्रदान करता है। भारतीय दर्शन में सेवा को ईश्वर की सच्ची आराधना माना गया है। दूसरों के कल्याण और समाज के उत्थान के लिए किया गया निःस्वार्थ कर्म ही सेवा है।

डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा भारतीय संस्कृति में सेवा और सत्संग दो ऐसे शाश्वत स्तंभ हैं, जो व्यक्ति को भौतिक जीवन के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते है।  ये मूल्य आज के आधुनिक और तनावपूर्ण युग में भी मानव मन को शांति, नैतिक बल और सामाजिक समरसता प्रदान करने के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।सनातन संस्कृति, जिसका गहरा संबंध भारतीय सभ्यता से है, न केवल धार्मिक धारणाओं का संग्रह है, बल्कि यह एक सम्पूर्ण जीवन दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए  डेरा संत प्रेम सिंह जी महाराज के प्रमुख सतपाल महाराज जी ने कहा आज की भौतिकवादी दुनिया में, जहाँ लोग अत्यधिक आत्मकेंद्रित हो रहे हैं, सेवा की भावना  समाज को टूटने से बचाती है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने निष्काम कर्म  को योग कहा है। निस्वार्थ भाव से समाज, असहायों और प्रकृति की सेवा करना ही कर्मयोग है। वेदों में वसुधैव कुटुंबकम  की भावना दी गई है। इसके अनुसार, प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का अंश देखना और उनकी सेवा करना ही सच्ची मानवता है। पसनातन धर्म में प्रेम केवल एक भावना नहीं, बल्कि एक दिव्य अनुभूति और ब्रह्मांडीय सत्य है। कार्यक्रम में मातृभूमि शिक्षा मंदिर के बच्चों एवं अन्य बाल समूह द्वारा विविध विधाओं में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम का सकुशल संचालन विजय सैनी ने किया।  कार्यक्रम में विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि सहित अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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