कुरुक्षेत्र, 13 मई। आज के समय में जब समाज मानसिक तनाव, नैतिक पतन और वैश्विक असंतुलन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब भगवान गौतम बुद्ध की शिक्षाएं अत्यंत प्रासंगिक हो जाती हैं। करुणा, अहिंसा, सत्य और आत्म अनुशासन जैसे उनके सिद्धांत आज भी समाज को सही दिशा देने की क्षमता रखते हैं। यह विचार कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने बुधवार को सीनेट हॉल में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर अध्ययन केंद्र द्वारा भगवान गौतम बुद्ध के 2588वें जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में “युगानुकूल परिस्थितियाँ और भगवान गौतम बुद्ध” विषय पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए। इससे पहले कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलित कर व भगवान बुद्ध व डॉ. भीमराव अम्बेडकर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। वंदे मातरम गीत के बाद कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की तथा कहा कि इस प्रकार के आयोजन समाज में वैचारिक जागरूकता और मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि भगवान बुद्ध ने हमें केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि एक ऐसा जीवन-दर्शन दिया जो आज के आधुनिक संदर्भ में भी पूरी तरह लागू होता है। उनका मध्यम मार्ग हमें सिखाता है कि न तो अत्यधिक भोग में जाना चाहिए और न ही अत्यधिक त्याग में, बल्कि संतुलित जीवन ही वास्तविक शांति का मार्ग है।
कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि आज के समय में आत्मनिर्भरता की बात अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि हम ऊर्जा क्षेत्र को देखें तो आज भी हम कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के लिए बड़े पैमाने पर अन्य देशों पर निर्भर हैं। यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमें अपने संसाधनों, विशेषकर नवीकरणीय ऊर्जा जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और स्वदेशी तकनीक की ओर अधिक ध्यान देना होगा। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक विषय नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की सुरक्षा और स्थिरता से भी जुड़ा हुआ विषय है।
प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महान नेताओं ने भी महात्मा बुद्ध के विचारों से प्रेरणा ली और सामाजिक समानता, न्याय और करुणा के सिद्धांतों को आगे बढ़ाया। आज भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि युवा मानसिक तनाव, प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया के दबाव और जीवन की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में बुद्ध का करुणा, शांति और संतुलन का संदेश युवाओं के लिए एक मार्गदर्शन बन सकता है।
मुख्य अतिथि भन्ते धम्माशील, बुद्धा भंती ने अपने संबोधन में कहा कि जो धर्म हिंसा, खून-खराबा और नफरत फैलाता है, वह सच्चा धर्म नहीं हो सकता। सच्चा धर्म वही है जो शांति, करुणा और मानवता का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि वे विशेष रूप से भगवान बुद्ध के विचारों को नमन करते हैं जिन्होंने जीवन को सुधारने के लिए पाँच शीलों का पालन करने का मार्ग दिखाया।
भन्ते धम्माशील, बुद्धा भंती ने कहा कि बुद्ध ने किसी एक धर्म या समुदाय को नहीं बाँटा, बल्कि उन्होंने मानवता के लिए विचार दिए। उनका मानना था कि जब तक मनुष्य के विचार नहीं बदलेंगे, तब तक उसका जीवन नहीं बदल सकता। धर्म केवल नाम या परंपरा नहीं है, बल्कि आचरण और व्यवहार है। उन्होंने कहा कि पाँच शीलों का पालन अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और मद्य त्याग एक बेहतर समाज और शांतिपूर्ण जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि मनुष्य इन सिद्धांतों को अपनाए, तो समाज में शांति और सद्भाव स्थापित हो सकता है।”
मुख्य वक्ता प्रो. रंजन त्रिपाठी ने कहा कि भगवान बुद्ध को जानना अर्थात स्वयं को जानना है। बुद्ध केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि चेतना, करुणा और सत्य का शाश्वत स्वरूप हैं। उन्होंने मानव को सिखाया कि बाहरी वैभव से अधिक महत्वपूर्ण आत्मज्ञान है। जब मनुष्य स्वयं से प्रश्न करता है, तभी उसके भीतर ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है। बुद्ध का जीवन हमें बताता है कि सत्य की खोज त्याग, चिंतन और आत्म साक्षात्कार से प्राप्त होती है। इसलिए बुद्ध केवल इतिहास नहीं, बल्कि मानव चेतना के चिरंतन मार्गदर्शक हैं।” भारतीय परंपरा में बुद्ध का स्थान इसलिए महान है क्योंकि उन्होंने समाज को जागृत करने, करुणा से जोड़ने और मनुष्य को स्वयं से परिचित कराने का कार्य किया। वे शाश्वत हैं, चिरंतन हैं, क्योंकि उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व था। मंच का संचालन उपासना ने किया। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित कुलसचिव ले. (प्रो.) वीरेंद्र पाल ने अंत में धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध के सिद्धांत केवल आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि सामाजिक समरसता और मानवता की स्थापना के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संगोष्ठी में शोधार्थी दक्ष व राहुलदीप ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।
इस अवसर पर कुलसचिव प्रो. वीरेन्द्र पाल, केन्द्र निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह, मेजर रमेश रूद्र, भंते विमोलकर, भंते भीखू जी महाराज, बतुला वीरांगना, बतुला महेन्द्र, छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. ए.आर. चौधरी, प्रो. आर.के देसवाल, प्रो. महावीर नरवाल, प्रो. सुरेश कुमार, प्रो. मिथलेश, प्रो. जोगिन्द्र सिंह, प्रो. फकीर चंद, केडीबी मानद सचिव उपेन्द्र सिंघल, प्रो. निर्मला चौधरी, प्रो. अमित लूदरी, प्रो. डीएस राणा, प्रो. परमेश कुमार, कुटा प्रधान डॉ. जितेन्द्र खटकड़, परामर्श समिति के सदस्य डॉ. रमेश सिरोही, डॉ. प्रवेश कुमार, कुंटिया प्रधान राजवंत कौर, ऋषि पाल मथाना, अशोक रोशा, डॉ. संगीता धीर, सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि भगवान बुद्ध ने हमें केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि एक ऐसा जीवन-दर्शन दिया जो आज के आधुनिक संदर्भ में भी पूरी तरह लागू होता है। उनका मध्यम मार्ग हमें सिखाता है कि न तो अत्यधिक भोग में जाना चाहिए और न ही अत्यधिक त्याग में, बल्कि संतुलित जीवन ही वास्तविक शांति का मार्ग है।
कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि आज के समय में आत्मनिर्भरता की बात अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि हम ऊर्जा क्षेत्र को देखें तो आज भी हम कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के लिए बड़े पैमाने पर अन्य देशों पर निर्भर हैं। यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमें अपने संसाधनों, विशेषकर नवीकरणीय ऊर्जा जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और स्वदेशी तकनीक की ओर अधिक ध्यान देना होगा। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक विषय नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की सुरक्षा और स्थिरता से भी जुड़ा हुआ विषय है।
प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महान नेताओं ने भी महात्मा बुद्ध के विचारों से प्रेरणा ली और सामाजिक समानता, न्याय और करुणा के सिद्धांतों को आगे बढ़ाया। आज भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि युवा मानसिक तनाव, प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया के दबाव और जीवन की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में बुद्ध का करुणा, शांति और संतुलन का संदेश युवाओं के लिए एक मार्गदर्शन बन सकता है।
मुख्य अतिथि भन्ते धम्माशील, बुद्धा भंती ने अपने संबोधन में कहा कि जो धर्म हिंसा, खून-खराबा और नफरत फैलाता है, वह सच्चा धर्म नहीं हो सकता। सच्चा धर्म वही है जो शांति, करुणा और मानवता का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि वे विशेष रूप से भगवान बुद्ध के विचारों को नमन करते हैं जिन्होंने जीवन को सुधारने के लिए पाँच शीलों का पालन करने का मार्ग दिखाया।
भन्ते धम्माशील, बुद्धा भंती ने कहा कि बुद्ध ने किसी एक धर्म या समुदाय को नहीं बाँटा, बल्कि उन्होंने मानवता के लिए विचार दिए। उनका मानना था कि जब तक मनुष्य के विचार नहीं बदलेंगे, तब तक उसका जीवन नहीं बदल सकता। धर्म केवल नाम या परंपरा नहीं है, बल्कि आचरण और व्यवहार है। उन्होंने कहा कि पाँच शीलों का पालन अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और मद्य त्याग एक बेहतर समाज और शांतिपूर्ण जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि मनुष्य इन सिद्धांतों को अपनाए, तो समाज में शांति और सद्भाव स्थापित हो सकता है।”
मुख्य वक्ता प्रो. रंजन त्रिपाठी ने कहा कि भगवान बुद्ध को जानना अर्थात स्वयं को जानना है। बुद्ध केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि चेतना, करुणा और सत्य का शाश्वत स्वरूप हैं। उन्होंने मानव को सिखाया कि बाहरी वैभव से अधिक महत्वपूर्ण आत्मज्ञान है। जब मनुष्य स्वयं से प्रश्न करता है, तभी उसके भीतर ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है। बुद्ध का जीवन हमें बताता है कि सत्य की खोज त्याग, चिंतन और आत्म साक्षात्कार से प्राप्त होती है। इसलिए बुद्ध केवल इतिहास नहीं, बल्कि मानव चेतना के चिरंतन मार्गदर्शक हैं।” भारतीय परंपरा में बुद्ध का स्थान इसलिए महान है क्योंकि उन्होंने समाज को जागृत करने, करुणा से जोड़ने और मनुष्य को स्वयं से परिचित कराने का कार्य किया। वे शाश्वत हैं, चिरंतन हैं, क्योंकि उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व था। मंच का संचालन उपासना ने किया। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित कुलसचिव ले. (प्रो.) वीरेंद्र पाल ने अंत में धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध के सिद्धांत केवल आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि सामाजिक समरसता और मानवता की स्थापना के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संगोष्ठी में शोधार्थी दक्ष व राहुलदीप ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।
इस अवसर पर कुलसचिव प्रो. वीरेन्द्र पाल, केन्द्र निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह, मेजर रमेश रूद्र, भंते विमोलकर, भंते भीखू जी महाराज, बतुला वीरांगना, बतुला महेन्द्र, छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. ए.आर. चौधरी, प्रो. आर.के देसवाल, प्रो. महावीर नरवाल, प्रो. सुरेश कुमार, प्रो. मिथलेश, प्रो. जोगिन्द्र सिंह, प्रो. फकीर चंद, केडीबी मानद सचिव उपेन्द्र सिंघल, प्रो. निर्मला चौधरी, प्रो. अमित लूदरी, प्रो. डीएस राणा, प्रो. परमेश कुमार, कुटा प्रधान डॉ. जितेन्द्र खटकड़, परामर्श समिति के सदस्य डॉ. रमेश सिरोही, डॉ. प्रवेश कुमार, कुंटिया प्रधान राजवंत कौर, ऋषि पाल मथाना, अशोक रोशा, डॉ. संगीता धीर, सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
