गीता प्रवाह संगोष्ठी में गीता के पहले अध्याय अर्जुन के मोहग्रस्त होने पर किया गया मंथन

कुरुक्षेत्र, 19 अप्रैल। जीओ गीता के सचिव मदन मोहन छाबड़ा ने कहा कि महाभारत युद्ध में अर्जुन विवेक, त्याग और कर्तव्यपरायणता पर अडिग रहे। युद्धभूमि में जब अर्जुन ने अपने ही गुरुजनों, संबंधियों और मित्रों को सामने खड़ा देखा, तो वे गहरे मोह और दुविधा में पड़ गए और उन्होंने अपने गांडीव (धनुष) को रख दिया और भगवान श्रीकृष्ण को युद्ध करने से इंकार कर दिया। इसी विषाद की स्थिति में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म, धर्म और आत्मज्ञान का उपदेश दिया, जो संपूर्ण गीता का आधार बना।

मदन मोहन छाबड़ा जीओ गीता संस्थान में आयोजित मासिक गीता प्रवाह संगोष्ठी में बतौर मुख्यातिथि बोल रहे थे। जबकि संगोष्ठी की अध्यक्षता कुवि से सेवानिवृति प्रोफेसर आरके देशवाल ने की। उन्होंने कहा कि अर्जुन केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि संवेदनशील और धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व भी थे। गीता का प्रथम अध्याय ‘अर्जुन विषाद योग’ मनुष्य के जीवन में आने वाले मानसिक संघर्ष और निर्णयहीनता की स्थिति को उजागर करता है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी विवेक और कर्तव्य के मार्ग को अपनाना कितना आवश्यक है।

उन्होंने बताया कि गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज की प्रेरणा से शुरू की गई गीता प्रवाह संगोष्ठी से प्रबुद्ध वर्ग जुड़ रहा है, जोकि गीता के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

संगोष्ठी में गीता के पहले अध्याय अर्जुन विषाद योग पर मंथन हुआ। सेवानिवृत प्राचार्य सचिंद्र कुमार ने अपना व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने अर्जुन विषाद योग से लेकर सगे-संबंधियों के प्रति त्याग को विस्तार से बताया।

इस अवसर पर विवेक कोहली, कुवि प्रोफेसर डॉ. भगत सिंह, कुवि प्रोफेसर डॉ. तेजेंद्र शर्मा, सुनीता दलाल, ऋषिपाल, प्रोफेसर सुचिशुमिता, एनआईटी प्रोफेसर एसएम गुप्ता, प्रोफेसर सुरेश, कैप्टन परमजीत सिंह, कुवि हिंदी विभाग से लोकेश, सुनीता गुप्ता, क्षत्रिय महासभा के राष्ट्र्रीय अध्यक्ष महेंद्र तंवर, गुर्जर महासभा के पूर्व प्रधान ओमप्रकाश राठी सहित अन्य प्रबुद्धजन मौजूद रहे।

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