(संसद की गरिमा और जातिगत मानसिकता के संकट के चलते उठते सवाल)
— डॉ० प्रियंका सौरभ
आज भारतीय संसद की कार्यवाही ने लोकतंत्र की उस बुनियादी शर्त पर गहरे प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं, जिसे हम समानता, गरिमा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहते हैं। संसद केवल कानून बनाने की जगह नहीं होती, बल्कि वह वह मंच होती है जहाँ लोकतंत्र की आत्मा बोलती है। लेकिन जब उसी मंच पर निर्वाचित प्रतिनिधि अपनी बात निर्बाध रूप से नहीं रख पा रहे हों, तो यह केवल संसदीय अव्यवस्था नहीं रह जाती, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना के क्षरण का संकेत बन जाती है।
यह स्थिति इसलिए भी अधिक चिंताजनक है क्योंकि संसद वह संस्था है, जिससे पूरे समाज को दिशा मिलती है। यदि यहाँ शोर, व्यवधान, व्यक्तिगत हमले और लक्षित अपमान सामान्य होते जा रहे हैं, तो यह संदेश केवल संसद तक सीमित नहीं रहता—यह पूरे समाज में असहिष्णुता और अराजकता को वैधता देता है।
यह विडंबना ही है कि जिस देश ने अपने संविधान के माध्यम से जाति, वर्ग और भेदभाव से मुक्ति का सपना देखा था, उसी देश की संसद में आज भी व्यक्ति की पहचान उसके पद से पहले उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि से तय होती दिखाई देती है। राष्ट्रपति का अभिभाषण हो या प्रधानमंत्री का धन्यवाद प्रस्ताव—यदि इन संवैधानिक प्रक्रियाओं को भी शोर, व्यवधान और लक्षित अपमान के बीच पूरा न किया जा सके, तो सवाल केवल राजनीतिक शिष्टाचार का नहीं रहता, बल्कि संस्थागत मर्यादा का बन जाता है।
संविधान ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे पदों को किसी जाति, वर्ग या समुदाय से ऊपर रखा है। ये पद संविधान की संप्रभुता के प्रतीक हैं। लेकिन जब इन पदों पर बैठे व्यक्तियों को भी उनकी सामाजिक पहचान के चश्मे से देखा जाता है, तो यह उस गहरी जातिगत मानसिकता को उजागर करता है, जो आज भी हमारे लोकतंत्र के भीतर जीवित है।
संसद में सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है—बल्कि लोकतंत्र में यह उसका कर्तव्य है। लेकिन सवालों का स्वर, भाषा और उद्देश्य भी लोकतांत्रिक मर्यादा के भीतर होना चाहिए। जब प्रश्न नीति, प्रशासन और जनहित की जगह व्यक्तिगत पहचान, सामाजिक वर्ग या जातिगत संकेतों की ओर मुड़ने लगें, तो यह विमर्श नहीं, बल्कि विभाजन की राजनीति बन जाती है।
यह प्रवृत्ति न केवल संसद की गरिमा को ठेस पहुँचाती है, बल्कि समाज को भी वही संदेश देती है कि सत्ता के शीर्ष पर पहुँचने के बाद भी व्यक्ति जातिगत खाँचों से मुक्त नहीं हो सकता। इसका असर केवल राजनीतिक नहीं होता, इसका सामाजिक प्रभाव भी गहरा होता है—यह उन करोड़ों लोगों को निराश करता है जो लोकतंत्र को सामाजिक न्याय का माध्यम मानते हैं।
एक सौ चालीस करोड़ की आबादी वाले देश में संसद केवल कानून बनाने की जगह नहीं है; वह लोकतंत्र का नैतिक केंद्र है। यही वह स्थान है जहाँ असहमति को सम्मान मिलना चाहिए, जहाँ बहस होनी चाहिए लेकिन अपमान नहीं, जहाँ टकराव हो लेकिन हिंसक भाषा नहीं। यदि उसी केंद्र में निर्वाचित प्रतिनिधियों की सुरक्षा, सम्मान और अभिव्यक्ति सुनिश्चित नहीं हो पा रही, तो यह तंत्र की गंभीर विफलता है।
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या संसद के भीतर अनुशासन केवल काग़ज़ों तक सीमित रह गया है? क्या सदन की कार्यवाही बाधित करना, योजनाबद्ध शोर मचाना और संवैधानिक प्रक्रियाओं को रोकना अब राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है? और यदि ऐसा है, तो क्या इसके लिए कोई स्पष्ट और कठोर जवाबदेही तय की जाएगी?
आज विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और सार्वजनिक संस्थानों के लिए आचार-संहिताएँ बनाई जाती हैं—छात्रों और शिक्षकों से अपेक्षा की जाती है कि वे मर्यादा और अनुशासन में रहें। लेकिन क्या यह विडंबना नहीं है कि संसद, जो इन नियमों को बनाने वाली संस्था है, स्वयं अनुशासनहीनता का उदाहरण बनती जा रही है? क्या संसद के लिए भी किसी सख़्त आचार-संहिता की आवश्यकता नहीं है, जो केवल काग़ज़ पर नहीं, व्यवहार में लागू हो?
यह बहस किसी एक पद, व्यक्ति या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। यह उस मानसिकता का प्रश्न है, जो आज भी व्यक्ति को उसकी संवैधानिक भूमिका से पहले उसकी जाति में बाँधकर देखती है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री—दोनों पद संविधान से शक्ति पाते हैं, न कि किसी सामाजिक श्रेणी से। फिर भी, जब सदन के भीतर और बाहर उन्हें उसी पुरानी दृष्टि से देखा जाता है, तो यह लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा आघात है।
हम अक्सर गर्व से कहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लेकिन लोकतंत्र केवल संख्या से बड़ा नहीं होता, उसकी गुणवत्ता भी मायने रखती है। यदि लोकतंत्र के सबसे बड़े मंच पर ही समानता और सम्मान सुनिश्चित नहीं हो पा रहे, तो यह आत्ममंथन का समय है।
देश ने बीते दशकों में विकास, तकनीक और वैश्विक पहचान के अनेक पड़ाव पार किए हैं। हम अंतरिक्ष में पहुँच गए, डिजिटल अर्थव्यवस्था बना ली, वैश्विक मंचों पर अपनी आवाज़ बुलंद की। लेकिन सामाजिक समानता की कसौटी पर आज भी हम बार-बार फिसलते दिखाई देते हैं। जाति, पहचान और पूर्वाग्रह आज भी हमारे सार्वजनिक जीवन को नियंत्रित करते हैं।
यदि संसद स्वयं इस सोच से मुक्त नहीं हो पाती, तो समाज से परिवर्तन की अपेक्षा करना व्यर्थ है। संसद को केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं, बल्कि उदाहरण प्रस्तुत करने वाली संस्था बनना होगा। यहाँ जो आचरण होगा, वही समाज में आदर्श माना जाएगा।
इसलिए यह समय है कि संसद की गरिमा, समानता और कार्यवाही की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और कठोर नियमों पर गंभीर विचार किया जाए। ऐसे नियम जो सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों पर समान रूप से लागू हों। ऐसे नियम जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाएँ नहीं, लेकिन अराजकता को भी अनुमति न दें।
लोकतंत्र की मजबूती शोर से नहीं, संवाद से आती है; अवरोध से नहीं, असहमति के सम्मान से आती है। संसद को फिर से वही स्थान बनना होगा, जहाँ विचार टकराएँ, लेकिन व्यक्ति अपमानित न हो; जहाँ सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हों, लेकिन संविधान सर्वोपरि रहे।
यदि संसद ही मर्यादा तोड़ेगी, तो देश से मर्यादा की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? यही प्रश्न आज भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। तभी लोकतंत्र अपनी वास्तविक अर्थवत्ता में जीवित रह पाएगा।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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