कला कीर्ति भवन में नाटक विभाजन विभीषिका ने दिखाई बंटवारे की टीस, वाराणसी के कलाकारों ने बटोरी वाहवाही
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विभाजन सिर्फ देश का बंटवारा नहीं, मानवीय संवेदनाओं की हत्या थी। डा. प्रीतम सिंह
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कुरुक्षेत्र 17 अगस्त। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) तथा हरियाणा कला परिषद के संयुक्त तत्वावधान में पांच दिवसीय पंचजन्य नाट्य समारोह का कला कीर्ति भवन में अत्यंत भव्य और गरिमामयी शुभारंभ हुआ। 21 अगस्त तक चलने वाले इस नाट्य महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर समवकार नाट्य संस्था, वाराणसी के कलाकारों द्वारा गुंजन शुक्ला का लिखा और निर्देशित नाटक विभाजन विभीषिका का मंचन किया गया। उत्तरप्रदेश के कलाकारों ने सजीव और मर्मस्पर्शी अभिनय से इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी के दर्द को दर्शकों के सामने जीवंत कर दिया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रुप में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के डॉ. भीमराव अंबेडकर अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज के निदेशक सुदेश शर्मा ने की। हरियाणा कला परिषद के उपाध्यक्ष महेश जोशी ने अतिथियों को अंगवस्त्र भेंट कर स्वागत किया। कार्यक्रम का विधिवत शुभारम्भ हरियाणा राज्यगीत से किया गया। इसके बाद अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित से नाट्य संध्या का आगाज हुआ। मंच का संचालन विकास शर्मा द्वारा किया गया। कार्यक्रम में डॉ. प्रीतम सिंह ने दर्शकों को सम्बोंधित करते हुए कहा कि 1947 का विभाजन सिर्फ देश की ज़मीन का बंटवारा नहीं था, बल्कि यह हमारी साझी तहज़ीब, संस्कृति और इंसानी संवेदनाओं का बंटवारा था। इस त्रासदी का सबसे बड़ा दंश महिलाओं और बेकसूर बच्चों ने झेला था। इतिहास की इन गलतियों और दर्द को रंगमंच के माध्यम से आज की युवा पीढ़ी के सामने लाना बेहद ज़रूरी है, ताकि हम शांति और सौहार्द की कीमत को समझ सकें। वहीं कार्यक्रम अध्यक्ष सुदेश शर्मा ने कहा कि कला और रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि इनमें वो ताकत होती है जो समाज के गहरे से गहरे घावों को सहला सकती है और दिलों को जोड़ सकती है। पंचजन्य नाट्य समारोह का मुख्य उद्देश्य ही यही है कि हम देश की बेहतरीन नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से अपनी युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों, संघर्षों और गौरवशाली इतिहास से जोड़ सकें।
सरहदों की नफ़रत पर भारी पड़ी सुहानी के प्यार की दास्तान
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नाटक विभाजन विभीषिका ने दिखाया कि सन् 1947 सिर्फ इतिहास के पन्नों में दर्ज कोई एक साल भर नहीं था। यह मानवीय संवेदनाओं, रिश्तों और सदियों पुराने भाईचारे पर एक बहुत बड़ा आघात और गहरी दरार थी। नाटक के माध्यम से दिखाया गया कि किस तरह ज़मीन पर खींची गई एक अवांछित लकीर ने रातों-रात लाखों बेकसूर लोगों को शरणार्थी बना दिया। उन्हें अपने पुरखों के घर, सुनहरी यादें, सगे रिश्ते और अपनी खुद की पहचान हमेशा-हमेशा के लिए पीछे छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। बंटवारे के उस खौफनाक दौर में हुए नुकसान, विस्थापन, अमानवीय हिंसा और अंतहीन तड़प की कहानियों को जब कलाकारों ने दर्शक दीर्घा से होते हुए मंच पर उतारना शुरु किया, तो पूरी रंगशाला में सन्नाटा पसर गया और कई दर्शकों की आँखें नम हो गईं। इतिहास की इस भयानक आग और नफ़रत के बीच, नाटककार गुंजन शुक्ला ने मानवीय संवेदना और प्रेम की एक अनूठी रोशनी भी दिखाई। नाटक ने सुहानी की कहानी के माध्यम से दर्शकों को बताया कि घोर विभीषिका के बीच भी प्यार की कहानियाँ ज़िंदा थीं। नाटक का वह दृश्य बेहद भावुक करने वाला था जहाँ रेलवे प्लेटफ़ॉर्म को केवल एक जगह के रूप में नहीं, बल्कि असहनीय इंतज़ार, अंतिम विदाई और अपनों से जुदाई के एक जीवंत प्रतीक के रूप में दिखाया गया। यह उन इंसानों की कहानी थी जिनका अडिग विश्वास था कि प्रेम, इंसानों द्वारा खड़ी की गई किसी भी सरहद से कहीं ज्यादा बड़ा और पवित्र होता है। वाराणसी की समवकार संस्था के कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय, संवाद अदायगी और संगीत ने नाटक को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुँचाया। नाटक की समाप्ति पर पूरी भरतमुनि रंगशाला कई मिनटों तक करतल ध्वनि से गूंजती रही। दर्शकों ने खड़े होकर निर्देशक गुंजन शुक्ला और उनकी पूरी टीम के हुनर की सराहना की। नाटक में राजा कुमार, नवीन चंद्रा, आलोक गुप्ता, हर्ष जायसवाल, कृष्णा नंद तिवारी, सुहानी मोर्य, काव्य सिंह, पूनम सैनी, प्रवेश भार्गव, सपना, शैलेष, विशाल यादव, यशदीप सिंह, प्रशांत, अंकुर तथा सुमित ठाकुर ने अपनी भूमिकाएं निभाई। अंत में मुख्य अतिथि डा. प्रीतम सिंह ने कलाकारों को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया और इस सफल मंचन के लिए बधाई दी।
