नीलोखेड़ी/ करनाल, 28 जुलाई। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की नवगठित हिंदी सलाहकार समिति की पहली बैठक नई दिल्ली स्थित डॉ. अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरूगन की अध्यक्षता में संपन्न हुई। बैठक में देश के विभिन्न राज्यों से नामित सदस्यों ने भाग लिया और राजभाषा हिंदी के प्रभावी क्रियान्वयन तथा भारतीय भाषाओं के संवर्धन से जुड़े विभिन्न विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।
बैठक में हरियाणा का प्रतिनिधित्व कर रहे हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य तथा हरियाणा ग्रामीण विकास संस्थान के निदेशक डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने यहां बताया कि उन्होंने बैठक में हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार, राजभाषा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन तथा भारतीय भाषाओं के समन्वित विकास से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए।
डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि हिंदी केवल राजभाषा ही नहीं, बल्कि भारत की विविध भाषायी और सांस्कृतिक परंपराओं को जोड़ने वाला एक सशक्त सेतु है। उन्होंने कहा कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय यदि राजभाषा हिंदी के प्रभावी क्रियान्वयन का आदर्श स्थापित करता है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव पूरे प्रशासनिक तंत्र पर पड़ेगा।
उन्होंने सुझाव दिया कि हिंदी सलाहकार समिति की नियमावली के अनुरूप प्रत्येक वर्ष कम-से-कम दो बैठकें नियमित रूप से आयोजित की जाएँ तथा आवश्यकता होने पर पूर्व के अंतराल की भरपाई के लिए अतिरिक्त बैठकें भी बुलाई जाएँ।
हरियाणा ग्रामीण विकास संस्थान के निदेशक डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने हिंदी के संवर्धन में राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि गुजरात की भूमि से जुड़े महर्षि दयानंद सरस्वती और महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रीय एकता का माध्यम बनाने में ऐतिहासिक योगदान दिया। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा हिंदी को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर नई प्रतिष्ठा दिलाने के लिए किए जा रहे प्रयास अभिनंदनीय हैं। उन्होंने मंत्रालय तथा उसके अधीनस्थ सभी कार्यालयों में कार्यालयीन कार्य, ई-मेल पत्राचार और डिजिटल संचार को अधिकतम स्तर पर हिंदी में किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही राजभाषा कार्यान्वयन की प्रगति का मूल्यांकन डिजिटल डैशबोर्ड जैसी पारदर्शी एवं वैज्ञानिक प्रणाली के माध्यम से करने का सुझाव भी दिया।
डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने बैठक में यह भी प्रस्ताव रखा कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच शब्द-समन्वय को बढ़ावा देने के लिए विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय समिति गठित की जाए, ताकि विभिन्न भारतीय भाषाओं के जन स्वीकृत शब्दों को हिंदी में समाहित कर भाषायी सौहार्द और राष्ट्रीय एकात्मता को और सुदृढ़ किया जा सके। उन्होंने मंत्रालय एवं उसके अधीनस्थ विभागों की सभी वेबसाइटों और डिजिटल पोर्टलों का प्रारंभिक पृष्ठ डिफ़ॉल्ट रूप से हिंदी में प्रदर्शित किए जाने तथा कार्यालयीन आदेशों, अधिसूचनाओं एवं पत्राचार को केवल अंग्रेज़ी के अनुवाद के रूप में तैयार करने के बजाय मूल रूप से हिंदी में ही प्रारूपित करने का भी सुझाव दिया। इसके लिए पर्याप्त प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध कराने और नियमित क्षमता-विकास कार्यक्रम संचालित करने की आवश्यकता पर भी उन्होंने बल दिया।
डॉ. चौहान ने कहा कि हमारा विरोध किसी भाषा के रूप में अंग्रेज़ी से नहीं है, बल्कि उस औपनिवेशिक मानसिकता से है जो आज भी प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर प्रभाव डालती है। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं के सम्मान और राजभाषा हिंदी के सशक्त क्रियान्वयन के माध्यम से आत्मविश्वासी एवं विकसित भारत के निर्माण की दिशा को और मजबूती मिलेगी।
