कुरुक्षेत्र, 25 जुलाई। कृषि क्षेत्र में बढ़ते ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच प्राकृतिक खेती को लेकर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन संस्थान का एक महत्त्वपूर्ण शोध सामने आया है। विश्वविद्यालय की शोधार्थी नेहा कालोनिया’’ ने डॉ. दीप्ति ग्रोवर, सहायक प्रोफेसर के निर्देशन में प्राकृतिक, जैविक एवं परंपरागत खेती के पर्यावरणीय प्रभावों का तुलनात्मक अध्ययन किया है। यह शोध प्रोडक्टिविटी एमिशन ट्रेड-ऑफ्स अक्रॉस कन्वेंशनल, ऑर्गेनिक एंड नेचुरल फार्मिंग इन राइस व्हीट सिस्टम्स ऑफ नॉर्थवेस्ट इंडिया’’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है।
इस अध्ययन के अंतर्गत उत्तर-पश्चिम भारत के प्रमुख धान-गेहूँ उत्पादक क्षेत्रों ’’कैथल, कुरुक्षेत्र एवं करनाल’’ के 27 स्थानों पर वर्ष 2023-24 के दौरान परंपरागत, जैविक एवं प्राकृतिक खेती प्रणालियों का तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया। अध्ययन में खेतों का सर्वेक्षण, मृदा के भौतिक एवं रासायनिक गुणों का विश्लेषण, फसल उत्पादकता के आँकड़ों का परीक्षण तथा ’’कूल फार्म टूल’’ के माध्यम से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का आकलन किया गया। शोध के निष्कर्षों के अनुसार ’’परंपरागत खेती में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन सर्वाधिक’’ पाया गया, जबकि ’’प्राकृतिक खेती पर्यावरणीय दृष्टि से सर्वाधिक अनुकूल’’ सिद्ध हुई। धान की खेती में परंपरागत पद्धति की तुलना में प्राकृतिक खेती से ’’लगभग 31.6 प्रतिशत’’ तथा गेहूँ की खेती में ’’7.18 प्रतिशत’’ तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी दर्ज की गई। जैविक खेती में भी उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी देखी गई।
अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया कि ’’उत्पादकता और पर्यावरणीय स्थिरता के मध्य संतुलन आवश्यक है।’’ परंपरागत खेती की तुलना में धान की उत्पादकता जैविक खेती में ’’18 प्रतिशत’’ तथा प्राकृतिक खेती में ’’लगभग 8.99 प्रतिशत’’ कम पाई गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, यद्यपि परंपरागत खेती वर्तमान में अधिक उत्पादन प्रदान करती है, किंतु प्राकृतिक खेती ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाने तथा पर्यावरणीय दबाव घटाने की दृष्टि से अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकती है। इसलिए इसे दीर्घकालिक कृषि स्थिरता, जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के शमन तथा पर्यावरणीय संरक्षण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण विकल्प माना जा सकता है। डॉ. दीप्ति ग्रोवर’’ ने कहा कि भविष्य की कृषि केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि उसे ’’पर्यावरणीय स्थिरता एवं जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों’’ के साथ आगे बढ़ाना होगा। उन्होंने कहा कि इस अध्ययन के निष्कर्ष जलवायु-स्मार्ट कृषि नीतियों के निर्माण तथा ऐसी कृषि प्रणालियों को प्रोत्साहित करने में उपयोगी सिद्ध होंगे, जो खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी सुनिश्चित करें।
उन्होंने बताया कि यह शोध नेहा कालोनिया’’ द्वारा उनके निर्देशन में संपन्न किया गया है, जिसमें ’’अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई)’’ के वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार मिश्रा का भी महत्त्वपूर्ण सहयोग रहा। यह अध्ययन प्राकृतिक खेती को जलवायु-अनुकूल, पर्यावरण हितैषी एवं टिकाऊ कृषि प्रणाली के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक उल्लेखनीय प्रयास है।
इस अध्ययन के अंतर्गत उत्तर-पश्चिम भारत के प्रमुख धान-गेहूँ उत्पादक क्षेत्रों ’’कैथल, कुरुक्षेत्र एवं करनाल’’ के 27 स्थानों पर वर्ष 2023-24 के दौरान परंपरागत, जैविक एवं प्राकृतिक खेती प्रणालियों का तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया। अध्ययन में खेतों का सर्वेक्षण, मृदा के भौतिक एवं रासायनिक गुणों का विश्लेषण, फसल उत्पादकता के आँकड़ों का परीक्षण तथा ’’कूल फार्म टूल’’ के माध्यम से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का आकलन किया गया। शोध के निष्कर्षों के अनुसार ’’परंपरागत खेती में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन सर्वाधिक’’ पाया गया, जबकि ’’प्राकृतिक खेती पर्यावरणीय दृष्टि से सर्वाधिक अनुकूल’’ सिद्ध हुई। धान की खेती में परंपरागत पद्धति की तुलना में प्राकृतिक खेती से ’’लगभग 31.6 प्रतिशत’’ तथा गेहूँ की खेती में ’’7.18 प्रतिशत’’ तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी दर्ज की गई। जैविक खेती में भी उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी देखी गई।
अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया कि ’’उत्पादकता और पर्यावरणीय स्थिरता के मध्य संतुलन आवश्यक है।’’ परंपरागत खेती की तुलना में धान की उत्पादकता जैविक खेती में ’’18 प्रतिशत’’ तथा प्राकृतिक खेती में ’’लगभग 8.99 प्रतिशत’’ कम पाई गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, यद्यपि परंपरागत खेती वर्तमान में अधिक उत्पादन प्रदान करती है, किंतु प्राकृतिक खेती ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाने तथा पर्यावरणीय दबाव घटाने की दृष्टि से अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकती है। इसलिए इसे दीर्घकालिक कृषि स्थिरता, जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के शमन तथा पर्यावरणीय संरक्षण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण विकल्प माना जा सकता है। डॉ. दीप्ति ग्रोवर’’ ने कहा कि भविष्य की कृषि केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि उसे ’’पर्यावरणीय स्थिरता एवं जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों’’ के साथ आगे बढ़ाना होगा। उन्होंने कहा कि इस अध्ययन के निष्कर्ष जलवायु-स्मार्ट कृषि नीतियों के निर्माण तथा ऐसी कृषि प्रणालियों को प्रोत्साहित करने में उपयोगी सिद्ध होंगे, जो खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी सुनिश्चित करें।
उन्होंने बताया कि यह शोध नेहा कालोनिया’’ द्वारा उनके निर्देशन में संपन्न किया गया है, जिसमें ’’अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई)’’ के वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार मिश्रा का भी महत्त्वपूर्ण सहयोग रहा। यह अध्ययन प्राकृतिक खेती को जलवायु-अनुकूल, पर्यावरण हितैषी एवं टिकाऊ कृषि प्रणाली के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक उल्लेखनीय प्रयास है।
