अम्बाला 

 

अम्बाला सदर (कैंट) नगर परिषद प्रशासन की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। पिछले चार महीनों से अम्बाला के मंडल आयुक्त (डिविजनल कमिश्नर) और उपायुक्त (डी.सी.) कार्यालय द्वारा बार-बार लिखित निर्देश जारी किए जाने के बावजूद नगर परिषद (न.प.) के कार्यकारी अधिकारी (ई.ओ.) द्वारा समस्त न.प. क्षेत्र के 32 वार्डों  में न.प. प्रशासन द्वारा लगाये गये  साइन-बोर्डों से “पार्षद/कौंसलर” शब्द हटाने संबंधी मामले में अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।

यह मामला तब और गंभीर हो गया जब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट और म्युनिसिपल कानून के जानकार  हेमंत कुमार  द्वारा इसे सीधे तौर पर हरियाणा नगरपालिका अधिनियम, 1973 की खुली अवहेलना बताते हुए कई संवैधानिक और प्रशासनिक अधिकारियों को सार्वजनिक ज्ञापन भेजा।

सरकारी कानून में पार्षद” शब्द ही नहींफिर साइन-बोर्डों पर क्यों?

हेमंत  ने अपने ज्ञापन में स्पष्ट कहा कि हरियाणा नगरपालिका अधिनियम, 1973 की धारा 2(14-ए) सहित पूरे कानून में कहीं भी “पार्षद/कौंसलर” शब्द का उल्लेख ही नहीं है। कानून में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के लिए केवल “सदस्य/मेंबर” शब्द का ही प्रयोग किया गया है।

इसके बावजूद अम्बाला सदर नगर परिषद प्रशासन ने शहर के चौक-चौराहों, गलियों और मोहल्लों में लगाए गए साइन-बोर्डों पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के नाम के आगे “पार्षद/कौंसलर” लिख रखा है, जिसे हेमंत ने कानून के सीधे उल्लंघन के रूप में उठाया।

मंडल कमिश्नर से लेकर डी.सी. तक लगातार पत्राचारफिर भी कार्रवाई शून्य

सूत्रों के अनुसार मंडल आयुक्त कार्यालय ने इस मामले में 6 जनवरी, 8 जनवरी, 11 फरवरी, 27 फरवरी, 10 मार्च, 30 मार्च और हाल ही में 13 मई को नगर परिषद ई.ओ. को पत्र भेजे।

वहीं उपायुक्त कार्यालय द्वारा भी 14 जनवरी, 4 फरवरी, 12 फरवरी, 19 मार्च, 30 मार्च और 14 मई को नगर परिषद ई.ओ. बार-बार पत्र जारी कर नियमानुसार कार्रवाई करने और इस बारे में प्रार्थी हेमंत कुमार को सूचित करने बारे लिखा गया.

लेकिन हैरानी की बात यह है कि चार महीने बीत जाने के बाद भी न तो साइन- बोर्ड बदले गए और न ही शिकायतकर्ता को किसी कार्रवाई की सूचना दी गई। इससे प्रशासनिक आदेशों की प्रभावशीलता और नगर परिषद अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।

इलेक्शन सर्टिफिकेट से लेकर सरकारी गजट तक हर जगह सदस्य

हेमंत कुमार ने अपने ज्ञापन में कई आधिकारिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि:

  • हरियाणा नगरपालिका निर्वाचन नियमावली, 1978 के अंतर्गत जारी होने वाले निर्वाचन प्रमाण-पत्र में निर्वाचित प्रतिनिधियों को मेंबर अर्थात सदस्य लिखा जाता है।
  • हरियाणा राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा सरकारी गजट में प्रकाशित अधिसूचनाओं में भी सदस्य/मेंबर शब्द का ही उपयोग होता है।
  • 20 मार्च 2025 को जारी सरकारी गजट नोटिफिकेशन में अम्बाला सदर नगर परिषद के सभी 32 वार्डों से निर्वाचित प्रतिनिधियों को मेंबर/सदस्य  दर्शाया गया।
  • 25 मार्च 2025 को पंचकूला में आयोजित राज्य स्तरीय शपथ ग्रहण समारोह में भी सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को सदस्य, नगर परिषद के रूप में ही शपथ दिलाई गई।

नया नगर निकाय कानून भी नहीं देता पार्षद” शब्द को मान्यता

हेमंत ने यह भी खुलासा किया कि हरियाणा विधानसभा द्वारा दिसंबर 2025 में पारित हरियाणा नगर निकाय विधेयक, 2025 — जो कुछ माह पूर्व हरियाणा के राज्यपाल प्रो. आशीम कुमार घोष द्वारा  भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की स्वीकृति के लिए भेजा गया जो प्राप्त होने के बाद   वह  अधिनियम (कानून) बन जायेगा — उसमें भी शहरी निकायों के वार्डों से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के लिए सदस्य शब्द का ही प्रयोग किया गया है, पार्षद शब्द का नहीं।

बड़ा सवाल — क्या सरकारी आदेशों को ठेंगा दिखा रहा नगर परिषद प्रशासन?

इसी बीच  यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर ऐसा कौन-सा कारण है कि मंडल आयुक्त और डी.सी. जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के लगातार आदेशों के बावजूद नगर परिषद प्रशासन कार्रवाई करने को तैयार नहीं है?

कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी सरकारी संस्था द्वारा कानून में मौजूद ही नहीं शब्द का आधिकारिक प्रयोग किया जा रहा है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सीधा प्रहार है।

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