कुरुक्षेत्र, 11 अप्रैल। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में आयोजित “कुरुक्षेत्र थ्रू एजेस” विषयक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर इतिहासकार प्रो. अमरजीत सिंह ने बाबा बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में मुगल शासन के विरुद्ध हुए संघर्ष का विस्तृत ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह के आदेश पर 1708 में बंदा सिंह बहादुर ने अत्याचारी मुगल सत्ता के विरुद्ध अभियान शुरू किया और लोगों को मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया।
प्रो. अमरजीत सिंह ने कहा कि बंदा सिंह बहादुर ने अक्टूबर 1708 में नांदेड़ साहिब से एक छोटी सिख टुकड़ी के साथ प्रस्थान किया और 1709 में हरियाणा क्षेत्र में प्रवेश किया। समाना के निकट सहरोड़ा गांव में उन्होंने अपना पहला सैन्य ठिकाना स्थापित किया। इसके बाद उन्होंने स्थानीय लोगों के सहयोग से सिखों को एक सशक्त सैन्य शक्ति के रूप में संगठित किया और नवंबर 1709 से जून 1710 के बीच समाना, कपूरी, सढौरा, बनूर, छप्पर, शाहाबाद, कुतुबपुर और मुस्तफाबाद जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर अधिकार स्थापित किया।
उन्होंने बताया कि इस संघर्ष में कुरुक्षेत्र और थानेसर क्षेत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। खरखौदा से लेकर मुखलिसपुर तक फैले इस अभियान का केंद्र थानेसर बना, जहां से आगे की रणनीति तैयार की गई। फारसी इतिहासकार खाफी खान और मोहम्मद कंबर खान के विवरणों का उल्लेख करते हुए प्रो. सिंह ने बताया कि इस संघर्ष में बड़ी संख्या में स्थानीय हिन्दू, विशेषकर बंजारा और चर्मकार जैसे निम्न वर्गों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। यह वर्ग लंबे समय से मुगल अत्याचारों से मुक्ति चाहता था।
18वीं शताब्दी के इतिहासकार विलियम इरविन के अनुसार, समाना, कैथल और ठसका की विजय के बाद बंदा सिंह बहादुर की सेना थानेसर पहुँची, जहां से शाहबाद, मुस्तफाबाद, कुंजपुरा, सढौरा और मुखलिसपुर पर अधिकार स्थापित किया गया। मई 1710 में सरहिंद विजय के बाद उन्होंने प्रथम सिख राज्य की स्थापना की और मुखलिसपुर का नाम बदलकर ‘लौहगढ़’ रखते हुए उसे राजधानी बनाया।
प्रो. अमरजीत सिंह ने बताया कि इस नवस्थापित राज्य की दो प्रमुख विशेषताएँ थींकृसरहिंद और थानेसर को प्रमुख प्रशासनिक केंद्र बनाया गया तथा निम्न वर्ग के लोगों को उच्च पदों पर नियुक्त कर सामाजिक समानता को बढ़ावा दिया गया। प्रशासन में अनुशासन बनाए रखने के लिए कठोर निर्देश भी लागू किए गए।
अपने व्याख्यान के अंत में उन्होंने दिसंबर 1710 में हुए लोहगढ़ के निर्णायक युद्ध का उल्लेख किया। फारसी स्रोतों के अनुसार, इस युद्ध की रणनीति थानेसर में तैयार की गई थी, जहां से मुगल सेना की गतिविधियों का आकलन कर बंदा सिंह बहादुर ने लौहगढ़ में निर्णायक लड़ाई लड़ी।
निष्कर्षतः, प्रो. अमरजीत सिंह ने कहा कि यह संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक ‘धर्मयुद्ध’ था, जिसमें आम जनता की व्यापक भागीदारी रही। कुरुक्षेत्र की पावन भूमि और यहाँ की न्याय-अन्याय की ऐतिहासिक परंपरा ने इस आंदोलन को वैचारिक शक्ति प्रदान की, जिसके परिणामस्वरूप बाबा बंदा सिंह बहादुर और जनता का यह संघर्ष अंततः सफल रहा।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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