पारिवारिक संस्कार बोध विषयक विचार गोष्ठी का आयोजन

कुरुक्षेत्र, 11 जनवरी। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान में पारिवारिक संस्कार बोध विषयक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी के मुख्य वक्ता सुप्रसिद्ध कथावाचक, मानस मर्मज्ञ एवं ओजस्वी वक्ता पंडित श्याम स्वरूप मनावत जी रहे। उनके साथ मंचासीन पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी से महंत बंसीपुरी जी महाराज, बड़ा उदासीन अखाड़ा कुरुक्षेत्र से महंत महेश मुनि जी महाराज, विद्या भारती हरियाणा से प्रांत संरक्षक श्री सत्यनारायण गुप्ता एवं विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के कोषाध्यक्ष श्री वीरेंद्र वालिया रहे। मंच संचालन श्री बलबीर ने किया जबकि अतिथि परिचय, स्वागत एवं गोष्ठी की प्रस्तावना विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के प्रबंधक श्री सुधीर कुमार ने रखी। गोष्ठी में आए हुए अतिथियों को फूलमालाओं, अंगवस्त्र एवं स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता पंडित श्याम स्वरूप मनावत ने कहा कि कोई भी कार्य तभी फलदायी, परिणामकारी और प्रसन्नतादायक होता है जब उसमें आपकी आत्म स्वीकृति होती है। जब तक आवश्यकता और आग्रह के लिए काम किया जाता है तब तक हम सेवक होते हैं और जब किसी काम को आत्म स्वीकृति से करते हैं तो स्वयंसेवक हो जाते हैं। इसीलिए आत्म स्वीकृति चाहिए ही चाहिए। उन्होंने तुलसीदास, मीरा और कबीरदास के अनेक उद्धरणों से इसे स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि विश्व कल्याण के लिए किसी न किसी परिवार को अपनी आहुतियां देने ही पड़ती हैं और विद्या भारती के काम में लगे कार्यकर्ताओं के परिवारों ने बहुत बड़ी आहुतियां दी हैं। उन्होंने विद्या भारती के काम में लगे कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्द्धन करते हुए कहा कि अपना आत्म गौरव जागृत रखना कि हमारा परिवार अगर विद्या भारती के काम में लगा है और यह परिवार ही हमारा परिवार है तो हम शिक्षा के बहुत बड़े यज्ञ से जुड़े हुए लोग हैं। उन्होंने कहा कि घर दीवारों का नाम नहीं अपितु घर तो भावनाओं, संवेदनाओं, प्रेम और एक दूसरे के लिए जीने का नाम है। इसलिए हम उन घरों में रहते हैं जिन्हें परिवार कहते हैं। जहां परिवार के प्रति समर्पण है ,वहीं पारिवारिक संस्कार बोध आता है।
 पंडित श्याम स्वरूप ने कहा कि संस्कृति पशुओं की नहीं हो सकती। संस्कृति मनुष्यों की होती है। हमने जो कल्याणकारी प्रकृति बनाने का काम किया है उसी को संस्कृति कहते हैं और उसी के लिए ज्ञान यज्ञ की निरंतर आवश्यकता रहती है कि हम अपनी प्रकृति को औरों के लिए कैसे उपयोगी बना सकते हैं। हम अपनी प्रकृति को कैसे संस्कृति कर सकते हैं।
इस अवसर पर महंत बंसीपुरी महाराज ने कहा कि आज हम अपनी वैदिक सनातन परंपराओं से भटकते जा रहे हैं। अगर हम आप एक सूत्र में बंधना चाहते हैं तो हमें अपने परंपराओं का अनुसरण करना ही होगा। उन्होंने युग युगांतरों से चले आ रहे सद्ग्रंथ श्री रामचरितमानस का उल्लेख करते हुए कहा कि यह भगवान की लीलाओं का संग्रह है ,जिसके माध्यम से यह समाज में दिशा देने एवं सद्भाव का काम करती है। इस अवसर पर संस्थान के कोषाध्यक्ष श्री वीरेंद्र वालिया ने मुख्य अतिथियों एवं गोष्ठी में आए नगर के सभी गणमान्य व्यक्तियों का आभार प्रकट किया। इस अवसर पर श्री कृष्ण भंडारी, श्री ऋषिराज वशिष्ठ, श्री चेतराम, श्री सोमदत्त, श्री यशपाल वधवा, श्रीमती राजकुमारी, श्री राजेश गोयल, श्री ऋषिपाल मथाना, श्रीमती राज विज, श्री नारायण सिंह, श्री संत कुमार, श्री जटाशंकर, श्री भूदेव, श्री श्याम लाल सहित नगर के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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