शाहरुख खान की नई फिल्म ‘पठान’ रिलीज होने से पहले ही कॉन्ट्रोवर्सी में है। किसी को फिल्म में दिखाए गए दीपिका पादुकोण की नारंगी बिकिनी से ऐतराज है, तो किसी को फिल्म के टाइटल से। लोग इस फिल्म को रिलीज न होने देने की धमकी दे रहे हैं।

मुद्दा संसद तक पहुंच गया है। बसपा सांसद कुंवर दानिश अली ने सवाल किया कि अगर सत्ता में बैठे लोगों को ही फिल्म पर प्रतिबंध लगाना है तो सेंसर बोर्ड का क्या काम है? भास्कर एक्सप्लेनर में जानेंगे कि भारत में हर फिल्म रिलीज होने से पहले सेंसर बोर्ड क्यों जाती है और इसके बाद भी हंगामा क्यों खड़ा होता है?

सवाल-1 : भारत में फिल्म रिलीज करने से पहले किसे दिखाना जरूरी है?

जवाब : जो भी चीजें विजुअल फॉर्म में पब्लिकली रिलीज होती है जैसे- कोई फिल्म, शार्ट फिल्म या ऐड फिल्म, उनको जरूरत पड़ती है सेंसर सर्टिफिकेट की। इसके लिए सरकार ने एक अलग यूनिट बनाई है। इसे हम सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन यानी CBFC या सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं। यहां से इन फिल्मों को सेंसर सर्टिफिकेट मिलता है।

इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि जब आप कोई फिल्म थिएटर में देखने जाते हैं तो कई बार फिल्म से पहले या बाद में ऐड दिखता है। इस ऐड से पहले ही सेंसर सर्टिफिकेट आता है। CBFC ही इन फिल्मों के लिए ये सेंसर सर्टिफिकेट जारी करती है।

भारत में 1913 में पहली फिल्म राजा हरीशचंद्र बनी। तब तक भारत में फिल्मों को लेकर इस तरह का कोई स्पेसिफिक कानून नहीं था। इंडियन सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1920 में बना। शुरुआत में हर क्षेत्र के लिए रीजनल सेंसर्स थे, जो स्वतंत्र तौर पर काम करते थे। आजादी के बाद इन रीजनल सेंसर्स को मिलाकर बॉम्बे बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर्स बनाया गया।

सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952 लागू होने के बाद इस बोर्ड का नाम बदलकर सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर्स हो गया। 1983 में एक्ट में कुछ बदलाव के बाद इस संस्था का नाम सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन रखा गया। हालांकि पहले के नाम में सेंसर होने के चलते लोग अभी भी इसे सेंसर बोर्ड ही कहते हैं। हालांकि जैसा कि नाम से ‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन’ से ही स्पष्ट है कि यह फिल्मों के लिए सर्टिफिकेट जारी करती है न कि सेंसर करती है।

सवाल-2 : फिल्मों को सर्टिफिकेट देने वाली कमेटी में कौन लोग होते हैं?

जवाब : CBFC के बोर्ड का प्रमुख चेयरपर्सन होता है। बोर्ड में 25 मेंबर और 60 एडवाइजरी पैनल के मेंबर होते हैं। इनकी नियुक्ति सूचना और प्रसारण मंत्रालय करता है। ज्यादातर बोर्ड मेंबर फिल्म और टीवी इंडस्ट्री से जुड़े प्रोफेशनल्स होते हैं, जबकि एडवाइजरी पैनल के मेंबर फिल्म इंडस्ट्री के बाहर से होते हैं।

चेयरपर्सन और बोर्ड के सदस्य का कार्यकाल 3 साल का होता है, जबकि एडवाइजरी पैनल के मेंबर्स का कार्यकाल 2 साल का होता है। CEO मुख्य रूप से प्रशासनिक कामकाज का इंचार्ज होता है, लेकिन रीजनल ऑफिसर फिल्मों को सर्टिफाई करने वाली जांच कमेटियों का हिस्सा होते हैं।

जब कोई फिल्ममेकर सर्टिफिकेशन के लिए अप्लाई करता है, तो रीजनल ऑफिसर एक जांच कमेटी बनाता है। शॉर्ट फिल्मों के मामले में जांच कमेटी में एडवाइजरी पैनल के एक मेंबर और एक जांच अधिकारी शामिल होते हैं, जिनमें से एक महिला होनी चाहिए। वहीं फिल्मों के मामले जांच कमेटी में एडवाइजरी पैनल से 4 मेंबर लिए जाते हैं और एक जांच अधिकारी होता हैं, इनमें 2 महिलाओं का होना जरूरी है।

सवाल-3 : किसी फिल्म को सर्टिफिकेट देते वक्त क्या देखा जाता है?

जवाब : जांच कमेटी फिल्मों का बारीकी से निरीक्षण करती है। इस दौरान इस बात का पूरा ख्याल रखती है कि फिल्म से किसी खास वर्ग की भावनाओं को ठेस न पहुंचे। साथ ही ऐसा कोई सीन न हो, जिसमें हिंसा को सही ठहराया गया हो। यदि फिल्म में कहीं पर भी जानवरों को दिखाया गया है, तो उसके लिए ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ लेने की भी जरूरत होती है।

जांच कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर रीजनल ऑफिसर फिल्मों को 4 तरह के सर्टिफिकेट देते हैं। ये U यानी यूनिवर्सल, U/A यानी पेरेंटल गाइडेंस, A यानी एडल्ट, S यानी स्पेशलाइज्ड ग्रुप होते हैं। फिल्म को कौन सा सर्टिफिकेट मिलेगा, यह जांच कमेटी में मेजॉरिटी के हिसाब से तय होता है। यदि किसी फिल्म में जांच कमेटी के मेंबरों में मेजॉरिटी से सहमति नहीं बन पाती तो उसका फैसला चेयरपर्सन करता है। सेंसर बोर्ड किसी भी फिल्म के सर्टिफिकेशन में ज्यादा से ज्यादा 68 दिनों का वक्त ले सकता है।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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