कॉस्मिक एस्ट्रो ,पिपली(कुरुक्षेत्र) के डायरेक्टर व श्री दुर्गा देवी मन्दिर के पीठाधीश डॉ. सुरेश मिश्रा ने बताया कि होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है I रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है I पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। होली या होलिका देश के प्रमुख उत्सवों में से एक है I यह आनन्द एवं उल्लास का ऐसा रंग भरा उत्सव है जो पूरे राष्ट्र में मनाया जाता है। होली, भारत के अलावा नेपाल, श्रीलंका एवं हिन्दू-बाहुल्य देशों जैसे सूरीनाम, गुआना, दक्षिण अफ्रीका, त्रिनिडाड, मॉरीशस तथा फिजी में भी मनाई जाती है I विभिन्न क्षेत्रों में इसके मनाने के ढंग में अंतर पाया जाता है I भारत में होली का उत्सव अलग-अलग प्रदेशों में भिन्नता के साथ मनाया जाता है I ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है I बरसाने की लठमार होली काफ़ी प्रसिद्ध है I इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं I इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी 15 दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है I हरियाणा की धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है I बंगाल की ढ़ोल यात्रा चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है I जलूस निकलते हैं और गाना बजाना भी साथ रहता है I इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेलने, गोवा के शिमगो में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है I
मुख्यत: इस त्यौहार में धार्मिक तत्व यह है कि फाल्गुन पूर्णिमा 24 मार्च 2024 को होलिका दहन है। इस दिन होलिका दहन के लिए शुभ मुहूर्त देर रात 11 बजकर 13 मिनट से लेकर 12 बजकर 27 मिनट तक है। ऐसे में होलिका दहन के लिए आपको कुल 1 घंटे 14 मिनट का समय मिलेगा।जिसमें लकड़ी को एकत्र करते हैं तथा एक पुरोहित द्वारा उसकी पूजा होती है, तब उसे जलाते हैं I
इसमें सम्मिलित लोग होलिका के चारों ओर परिक्रमा करते हैं, अग्नि में नारियल डालते है,गेहूँ, जौ आदि की बालियाँ डालते है I कहीं-कहीं गन्ने को भी गेहूँ एवं जौ की बालियों के साथ अग्नि में स्पर्श कराया जाता है फिर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है I दूसरे दिन सोमवार 25  मार्च 2024 को जिसे धुलेंडी या फाग  कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते है, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते है और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है I ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते है I एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है I इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं,गले मिलते है और मिठाइयाँ खिलाते है I
राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है I राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है I फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं I होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है I उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है I इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है I खेतों में सरसों खिल उठती है I बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है I पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं I खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं I किसानों का ह्रदय ख़ुशी से नाच उठता है I बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं I चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है I

होली का पौराणिक महत्व : विष्णु पुराण में कथा है कि राक्षसों के राजा हिरण्यकश्यप को उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने वरदान दिया कि उसकी मृत्यु न तो दिन और न ही रात को, न घर के अंदर और न बाहर,न पृथ्वी और न आकाश में, न मनुष्य और न ही जानवर के द्वारा, और न अस्त्र और न ही शस्त्र द्वारा होगी I ऐसा वरदान पाकर वह बहुत आक्रामक हो गया I वह पृथ्वी पर और स्वर्ग पर आक्रमण करने लगा I उसने लोगों को विष्णु की पूजा करने से मना किया I हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद विष्णु का भक्त था I उसने अपने पिता के बार-बार समझाने के बाद भी विष्णु की भक्ति नहीं छोड़ी। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के अनेक उपाय किए किन्तु वह सफल नहीं हुआ I अन्त में उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठे I क्योंकि होलिका एक चादर ओढ़ लेती थी जिससे अग्नि उसे नहीं जला पाती थी I

होलिका जब प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठी तो वह चादर प्रह्लाद के ऊपर आ गई और होलिका जलकर भस्म हो गई I तब से होलिका-दहन का प्रचलन हुआ I
प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है I कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर,नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था I इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था I
होली का आध्यात्मिक महत्व : ‘होली’ का अर्थ है जलाना परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यह पर्व हमें अंतर्मुख होकर आत्मस्वरूप का आवरण बनी हुई दुष्ट वासनाओं को जलाने का संदेश देता है I बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक यह पर्व हमें बताता है कि जो प्रह्लाद की तरह अच्छाई के मार्ग पर चलता है, भगवद आश्रय के मार्ग पर चलता है,उसके जीवन की बड़ी-से-बड़ी कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं और वह विजयी होता है I भक्त प्रह्लाद को जलाने आयी होलिका की तरह बुराई कितनी भी सामर्थ्य-सम्पन्न दिखे परंतु अंत में उसे जलकर राख़ हो जाना पडता है I होलिकोत्सव हमें बताता है कि प्रकृति अच्छाई के प्रति पक्षपात करती है और इसके लिए अपने नियमों को भी बदल देती है I
होली का त्यौहार एक ओर जहाँ व्यक्तिगत अहं की सीमाएँ तोड़ते हुए हमें निरहंकार बनने की प्रेरणा देता है,वहीं दूसरी ओर मत,पंथ,सम्प्रदाय,धर्म आदि की सारी दीवारों को तोड़कर आपसी सदभाव को जागृत करता है I

By Dr. Rajesh Wadhwa

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