युग परिवर्तन ने जगाई देशभक्ति की अलख, कलाकारों के अभिनय से भावुक हुए दर्शक
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युग परिवर्तन नाटक ने दर्शकों में भरा देश प्रेम, कलाकारों ने बटोरी वाहवाही
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कुरुक्षेत्र 26 सितम्बर। हरियाणा कला परिषद और उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र पटियाला के सहयोग से न्यू उत्थान थियेटर ग्रुप द्वारा स्थापना दिवस की 17वीं वर्षगांठ पर आयोजित उत्थान उत्सव 2026 के दूसरे दिन नाटक युग परिवर्तन का मंचन किया गया। इस नाटक का लेखन और निर्देशन रंगकर्मी विकास शर्मा द्वारा किया गया। इस मौके पर गुलजारी लाल नंदा स्मारक की निदेशक प्रो. शुचिस्मिता शर्मा, एनआईटी प्रोफेसर कर्ण शर्मा तथा पैनोरमा के प्रभारी सुरेश सोनी अतिथियों के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम से पूर्व न्यू उत्थान थियेटर ग्रुप के अध्यक्ष नीरज सेठी, सचिव शिवकुमार किरमच, सदस्य नरेश सागवाल तथा सुरेखा ने पौधे भेंट कर अतिथियों का स्वागत किया। इस मौके पर मंच का संचालन डॉ. मोहित गुप्ता ने अपनी साहित्यिक शैली में किया।
इतिहास वही रचते हैं जो शहीदों का सम्मान करते हैं। प्रो. शुचिस्मिता शर्मा
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कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। दर्शकों को संबोधित करते हुए प्रो. शुचिस्मिता शर्मा ने कहा कि आजादी हमें खैरात में नहीं मिली है, बल्कि इसके पीछे हमारे पुरखों के खून और अनगिनत बलिदानों की लंबी दास्तान है। वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वाधीनता संग्राम की वह धुरी था जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिलाकर रख दिया था। नाटक युग परिवर्तन के माध्यम से गौरवशाली इतिहास को मंच पर उतारकर नई पीढ़ी को एक महान सीख दी गई है, जो कि आज के समय की जरुरत है। वहीं सुरेश सोनी ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज हम जिस आजाद हवा में सांस ले रहे हैं, वह वीर महापुरुषों के सर्वोच्च बलिदान और शहादत की बदौलत है। उनके इस कर्ज को देश कभी नहीं चुका सकता। जो कौम अपने शहीदों को भूल जाती है, उसका अस्तित्व मिट जाता है। इसलिए महापुरुषों के दिखाए मार्ग और उनके आदर्शों पर चलना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
वंदे मातरम की ऐतिहासिक कहानी ने बांधा समां
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उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र पटियाला द्वारा प्रायोजित और विकास शर्मा के निर्देशन में तैयार नाटक युग परिवर्तन की पटकथा वर्तमान और फ्लैशबैक के तालमेल पर आधारित रही। नाटक की शुरुआत वर्तमान काल से होती है, जहाँ 70 वर्षीय देशभक्त दादा अपनी पोती काव्या को वंदे मातरम गीत के पीछे छिपी शहादत की अनकही कहानी सुनाते हैं। इसके बाद रंगमंच सीधे फ्लैशबैक में तब्दील हो जाता है और दर्शक सन् 1770 के बंगाल के उस भयावह और विनाशकारी अकाल के गवाह बनते हैं, जहाँ लोग दाने-दाने को तरस रहे थे, लेकिन क्रूर अंग्रेज अधिकारी उनसे कोड़ों के दम पर जबरन लगान वसूल रहे थे। इस अत्याचार के खिलाफ जब आनंदमठ के संन्यासी योद्धा भवानंद और आम नागरिक तलवारें उठाकर अंग्रेजी सेना पर टूट पड़ते हैं, तो दर्शकों की करतल ध्वनि से पूरा हॉल गूँज उठा। नाटक का सबसे भावुक मोड़ यह था कि जब अंग्रेजी सरकार में डिप्टी मजिस्ट्रेट के ऊंचे पद पर तैनात बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय अपनी अंतरात्मा की आवाज पर इस अमर गीत वंदे मातरम को कागज़ पर उतारते हैं। नौकरी जाने और कालकोठरी की परवाह न करते हुए बंकिम बाबू और उनकी पत्नी राजलक्ष्मी के बीच के संवादों ने देशप्रेम की परिभाषा को नए सिरे से परिभाषित किया। इसके बाद, रंगमंच पर 19 साल के क्रांतिकारी खुदीराम बोस का दृश्य दिखाया गया, जो जेल की यातनाएं सहते हुए भी अंग्रेजों के आगे झुकने से इनकार कर देता है। जेलर का खुदीराम को क्रुरता से प्रताड़ित करना, दर्शकों को भावुक कर देता है। कलाकारों का अभिनय इतना सशक्त रहा कि सभागार में बैठे दर्शक अपने आंसूओं को नहीं रोक पाए। वहीं दूसरी ओर, लंदन की धरती पर जाकर अत्याचारी ब्रिटिश अफसर कर्जन वायली की छाती में गोलियाँ दागने वाले जाँबाज़ मदन लाल धींगड़ा और अदालत में उनका डटकर बचाव करने वाले वीर सावरकर के दमदार दृश्यों ने राष्ट्रभक्ति का ऐसा जोश पैदा किया कि रंगशाला वंदे मातरम के नारों से गूंज उठी।
नाटक में इनकी रही भूमिका
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नाटक में दादा जी की भूमिका सागर शर्मा तथा पोती की भूमिका नव्या मेहता ने निभाई। वहीं बंकिम चंद्र, जेलर और जज की भूमिका में डा. राजीव कुमार, खुदीराम बोस और महेंद्र की भूमिका में हितेश जंगम, भवानंद और मदन लाल ढिंगड़ा चंचल शर्मा, राजलक्ष्मी और सीता की भूमिका अंजली धिमान, सावरकर और अंग्रेज अमरदीप जांगड़ा, वकील कपिल बत्रा, हरिराम गौरव दीपक जांगड़ा, माणिक आकाशदीप, अंग्रेज सूर्यांश चावला, लक्ष्य, सुमित, संन्यासी ध्रुवम, यश ने निभाई। प्रकाश व्यवस्था पवन भारद्वाज तथा रुप सज्जा यशु भारद्वाज की रही। नाटक में संगीत संचालन विकास शर्मा द्वारा किया गया। नाटक के अंत में सभी कलाकारों को सम्मानित किया गया।
