कुरुक्षेत्र, 5 अगस्त। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में भौतिकी विभाग तथा हरियाणा राज्य उच्च शिक्षा परिषद, पंचकूला के संयुक्त तत्वावधान में बुधवार को श्रीमद्भगवद्गीता सदन के सीनेट हॉल में भारतीय ज्ञान परंपरा को लेकर कंटेंट डेवलपमेंट विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि हरियाणा राज्य उच्च शिक्षा परिषद के अध्यक्ष प्रो. कैलाश चंद्र शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा से शिक्षा व्यवस्था समृद्ध होगी। भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल एक वैकल्पिक या अलग पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रत्येक विषय की मुख्य पाठ्यचर्या, शिक्षण पद्धति तथा अध्ययन सामग्री में उसका प्रभावी समावेश किया जाना चाहिए। इससे पहले भौतिकी विभाग के अध्यक्ष प्रो. राजेश खरब ने सभी अतिथियों का स्वागत किया व परिचय करवाया।
प्रो. कैलाश चन्द्र शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का उद्देश्य आधुनिक विज्ञान का स्थान लेना नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध वैज्ञानिक, बौद्धिक और दार्शनिक विरासत के साथ आधुनिक ज्ञान का समन्वय स्थापित करना है। उन्होंने नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और मानविकी सहित 64 विषयों का अध्ययन कराया जाता था, जो भारत की बहु विषयक शिक्षा परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
प्रो. शर्मा ने बताया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रमों में समाहित करने के लिए प्रारंभिक चरण में 28 विषयों का चयन किया है। इनमें से कई विषयों के संशोधित पाठ्यक्रम तैयार किए जा चुके हैं तथा शेष विषयों पर कार्य जारी है। उन्होंने कहा कि अध्ययन सामग्री तैयार करते समय मूल ग्रंथों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और शोधपरक दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही शिक्षकों के लिए व्याख्यात्मक नोट्स और संदर्भ सामग्री भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि विषय का प्रभावी अध्यापन सुनिश्चित हो सके। उन्होंने भारतीय दर्शन के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय शिक्षा केवल आर्थिक उन्नति नहीं, बल्कि नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और लोक कल्याण का भी संदेश देती है।
अध्यक्षीय संबोधन में कुवि कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा समग्र एवं संतुलित शिक्षा की आधारशिला है। शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना देना या किसी विशेष क्षेत्र में कौशल विकास तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक शिक्षा वह है जो व्यक्ति को संकीर्णताओं और बंधनों से मुक्त करते हुए उसके समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त करे तथा व्यक्ति, समाज, प्रकृति और संपूर्ण सृष्टि के बीच संतुलन स्थापित करने की दृष्टि प्रदान करे।
प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का उद्देश्य केवल अतीत का महिमामंडन करना नहीं है बल्कि गौरवशाली भारतीय सांस्कृतिक विरासत को वर्तमान से जोड़ते हुए वैश्विक चुनौतियों के समाधान प्रस्तुत करना है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा शिक्षा को मुक्ति का माध्यम मानती है। स्वाध्याय व्यक्ति को संकीर्ण सोच से मुक्त करता है और उसे व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है। भगवद्गीता का संदेश भी यही है कि मनुष्य ऐसे कर्म करे जो उसे किसी बंधन में न बांधें। इसी प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा आध्यात्मिक चिंतन और आधुनिक विज्ञान के बीच सार्थक संवाद स्थापित करती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी भारतीय मूल्यों से जुड़े रहते हुए भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने का लक्ष्य निर्धारित करती है।
उन्होंने बताया कि कुवि ने भारतीय ज्ञान परंपरा को चार स्तरों पर लागू करने का प्रयास किया है। पहले चरण में विद्यार्थियों के लिए लगभग 17 वैल्यू एडेड पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं, जिनमें मानव मूल्य एवं नैतिकता, पर्यावरण, गणित, भगवद्गीता, भारतीय दर्शन तथा हरियाणा अध्ययन जैसे विषय शामिल हैं। दूसरे चरण में भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित पूर्ण शैक्षणिक कार्यक्रम आरंभ किए गए हैं, जिनमें बी.ए. विद भगवद्गीता तथा योग विषय में प्रमाणपत्र, डिप्लोमा और स्नातकोत्तर कार्यक्रम शामिल हैं। प्रो. सचदेवा ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण कार्य प्रत्येक विषय की नियमित पाठ्यचर्या में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश करना है। यदि इसे केवल वैल्यू एडेड पाठ्यक्रमों या विशेष कार्यक्रमों तक सीमित रखा गया तो सभी विद्यार्थियों तक इसका लाभ नहीं पहुंच पाएगा।
कोऑर्डिनेटर प्रो. आरके मोदगिल ने कार्यशाला के उद्देश्य के बारे में बताते हुए कहा कि आधुनिक शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा का समुचित समावेश समय की आवश्यकता है, जिससे विद्यार्थियों को भारत की समृद्ध बौद्धिक एवं वैज्ञानिक विरासत से जोड़ा जा सके।
केन्द्रीय विश्वविद्यालय महेन्द्रगढ़ के उप-कुलपति प्रो. पवन शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में मोक्ष का अर्थ केवल आध्यात्मिक मुक्ति नहीं, बल्कि अज्ञान, भय, चिंता और सीमित सोच से मुक्ति भी है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा सह-अस्तित्व और समरसता के साथ जीवन जीने की शिक्षा देती है।
सहायक कोऑर्डिनेटर आईकेएस डिवीजन, मिनिस्ट्री ऑफ एजुकेशन डॉ. पीजूस कांति पाल ने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली का उद्देश्य केवल वर्तमान समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि ऐसी समग्र और दूरदर्शी सोच विकसित करना है, जो भविष्य की चुनौतियों का भी मार्ग प्रशस्त करे। इसके अतिरिक्त कार्यशाला में डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. राकेश कुमार, प्रो. मंजूला चौधरी सहित भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों, उसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा समकालीन शिक्षा में उसकी उपयोगिता पर अनेक विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए और प्रतिभागियों को भारतीय ज्ञान प्रणाली पर गुणवत्तापूर्ण कंटेंट तैयार करने के व्यावहारिक पहलुओं से भी अवगत कराया गया।
इस अवसर पर पूर्व कुलपति प्रो. एसके तोमर, डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. राकेश कुमार, डॉ. पीयूष, प्रो मंजूला चौधरी, प्रो. आर. के. मौदगिल, विभागाध्यक्ष प्रो. राजेश खरब, डॉ. हरदेव सिंह, प्रो. ए.एन सिंह, प्रो. सुनीता श्रीवास्तव, प्रो. विशाल, प्रो. जीपी दुबे, प्रो. नरेन्द्र सिंह, डॉ. अनुपम, डॉ. रजनी गोयल, प्रो. प्रदीप मित्तल, प्रो. तेजेन्द्र शर्मा, प्रो. नीरा राघव, प्रो. परमेश कुमार, प्रो. संजय त्यागी सहित सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में विभिन्न कॉलेजों से आए प्रतिभागी उपस्थित रहे।
