कुरुक्षेत्र, 28 जुलाई। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में हिंदी विभाग द्वारा प्रख्यात साहित्यकार एवं आलोचक नामवर सिंह की जयंती के उपलक्ष्य में हिंदी आलोचना के क्षेत्र में नामवर सिंह का योगदान विषय पर व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन हिंदी विभाग के गणपति चन्द्र गुप्त हॉल में मंगलवार को किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. (डॉ.) सुभाष चन्द्र, पूर्व प्रोफेसर, हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ने अपने व्याख्यान में कहा कि नामवर सिंह तत्कालीन साहित्यक विमर्श की देन हैं। नामवर सिंह हिंदी आलोचना के ऐसे पुरोधा थे, जिन्होंने आलोचना को नई वैचारिक ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह ने साहित्य को केवल रचना के रूप में नहीं, बल्कि समाज, इतिहास, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा। उनकी आलोचना दृष्टि ने हिंदी साहित्य को नई दिशा और नई
दृष्टि प्रदान की। इससे पहले दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।
प्रो. (डॉ.) सुभाष चन्द्र ने कहा कि नामवर सिंह का लेखन भारतीय साहित्यिक परंपरा और आधुनिक चिंतन का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है। उनकी आलोचना में तर्क, संवेदना, निष्पक्षता और बौद्धिक गहराई का अनूठा संगम दिखाई देता है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे नामवर सिंह की प्रमुख कृतियों का गंभीर अध्ययन करें, क्योंकि उनके विचार आज भी साहित्य, समाज और शिक्षा के क्षेत्र में समान रूप से प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी का साहित्य भक्ति सिखाता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. (डॉ.) महासिंह पूनिया, अध्यक्ष, हिंदी विभाग ने कहा कि नामवर सिंह ने हिंदी आलोचना को केवल साहित्यिक मूल्यांकन का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि उसे समाज, संस्कृति और विचार के व्यापक विमर्श से जोड़ा। उन्होंने आलोचना को नई दृष्टि, नई भाषा और नई वैचारिक ऊँचाई प्रदान की। प्रो. पूनिया ने कहा कि नामवर सिंह का व्यक्तित्व अध्ययन, संवाद और बौद्धिक निर्भीकता का अद्भुत संगम था। उनकी आलोचना किसी पूर्वाग्रह से नहीं, बल्कि तर्क, संवेदना और साहित्यिक विवेक से संचालित होती थी। उन्होंने नई पीढ़ी के रचनाकारों को प्रोत्साहित किया और हिंदी साहित्य में स्वस्थ बहस तथा वैचारिक संवाद की समृद्ध परंपरा को मजबूत किया। उन्होंने कहा कि कविता के नए प्रतिमान, दूसरी परंपरा की खोज, इतिहास और आलोचना तथा छायावाद जैसी कृतियाँ आज भी हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और अध्यापकों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ हैं। नामवर सिंह की आलोचनात्मक दृष्टि आने वाली पीढ़ियों को साहित्य को व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में समझने की प्रेरणा देती रहेगी। कार्यक्रम में शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने भी विषय से जुड़े प्रश्न पूछे, जिनका मुख्य वक्ता ने विस्तारपूर्वक उत्तर दिया। इस अवसर पर प्रो. कुलदीप सिंह, डॉ. जसबीर सिंह सहित शिक्षक, शोधार्थी व विद्यार्थी मौजूद थे।
