अंबाला  शहर —  हरियाणा सरकार में कार्यरत आला  अधिकारियों की  एक कथित प्रशासनिक लापरवाही, जो हालांकि एक गंभीर कानूनी चूक भी है,  से   अंबाला नगर निगम में डेढ़ माह पूर्व  कमिश्नर (आयुक्त) पद पर तैनात 2018 बैच के आई.ए.एस. अधिकारी वीरेंद्र सिंह सहरावत की नियुक्ति की वैधानिक मान्यता पर ही  कानूनी विवाद खड़ा है.

 

नगर निगम अंबाला के कमिश्नर के तौर पर  आई.ए.एस. वीरेंद्र सहरावत की तैनाती सम्बन्धी आदेश को जारी हुए  आज 7 जुलाई को  सात सप्ताह    का समय बीत जाने के बाद भी उनकी नियुक्ति संबंधी वैधानिक अधिसूचना ( नोटिफिकेशन) आज तक हरियाणा सरकार के राजपत्र ( गजट) में प्रकाशित नहीं की गई  है।

 

 

इस मुद्दे को लेकर शहर के सेक्टर 7 ( नगर निगम के वार्ड 12) निवासी पंजाब एवं हरियाणा  हाईकोर्ट के एडवोकेट एवं म्युनिसिपल  मामलों के जानकार हेमंत कुमार ने आज एक बार पुन:  प्रदेश सरकार के  कार्मिक विभाग और शहरी स्थानीय निकाय विभाग को   लिखकर उन्हें हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994 की धारा 45(1) का हवाला दिया कि नगर निगम कमिश्नर  की नियुक्ति प्रदेश के सरकारी गजट में इस सम्बन्ध में  अधिसूचना का  प्रकाशन  होने के बाद ही वैधानिक रूप से प्रभावी मानी जायेगी । ऐसे में मात्र एक  प्रशासनिक आदेश के आधार, बेशक वह आदेश प्रदेश के मुख्य सचिव द्वारा हस्ताक्षरित  हुआ  हो, द्वारा  की गई न.नि. कमिश्नर की  नियुक्ति कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकती ।

 

डेढ़ माह पुर  19 मई 2026 को हरियाणा सरकार के कार्मिक विभाग द्वारा  जारी एक आदेश मार्फ़त   2018 बैच के आई.ए.एस. . वीरेंद्र सिंह सहरावत को मुख्य तौर पर  जिला नगर आयुक्त, अंबाला और  साथ-साथ कमिश्नर, नगर निगम अंबाला का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया था। हालांकि एक महीने का समय बीत  जाने के बाद भी सहरावत की न.नि कमिश्नर के तौर पर नियुक्ति अधिसूचना सरकारी गजट में प्रकाशित नहीं हुई है. वहीं हालांकि जिला नगर आयुक्त के पद पर सहरावत की  नियुक्ति/तैनाती  बारे नोटिफिकेशन जारी करने के कानूनी आवश्यकता नहीं है.

 

 

 

‘हर आदेश अदालत में चुनौती योग्य’

 

हेमंत  का कानूनी मत  है कि चूँकि सहरावत की न.नि. कमिश्नर पद पर  नियुक्ति कानूनन निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं हुई है, इस आधार पर उनके द्वारा जारी प्रशासनिक आदेशों, निर्देशों, अनुमोदनों तथा अन्य निर्णयों की वैधता पर ही कानूनी प्रश्नचिह्न उठता  है।

उन्होंने कहा कि जब कानून स्पष्ट रूप से गजट अधिसूचना को अनिवार्य बनाता है तो उसकी अनुपालना किए बिना की गई नियुक्ति न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकती है। ऐसी स्थिति में आयुक्त द्वारा लिए गए हर प्रशासनिक आदेश, निर्देश, निर्णय आदि  को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।

 

सरकार के पास कानून की अनदेखी का अधिकार नहीं

 

हेमंत ने कहा कि राज्य विधानसभा द्वारा पारित कानून में यदि नियुक्ति की एक निश्चित प्रक्रिया निर्धारित की गई है तो सरकार उस प्रक्रिया को नजरअंदाज नहीं कर सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि हालांकि जहाँ तक वीरेन्द्र सहरावत की अम्बाला के जिला नगर आयुक्त पद पर की गई नियुक्ति (तैनाती) का विषय है, तो उसके  लिए गजट अधिसूचना की कानूनन आवश्यकता नहीं है परन्तु  नगर निगम कमिश्नर  पद के लिए यह कानूनी अनिवार्यता है।

 

राज्यपाल से लेकर मेयर तक पहुंची शिकायत

 

उपरोक्त मामले की शिकायत राज्यपाल प्रो. आशिम कुमार घोष, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, शहरी स्थानीय निकाय मंत्री विपुल गोयल, मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी, शहरी स्थानीय निकाय विभाग के आयुक्त एवं सचिव अशोक मीणा, विभाग के निदेशक मुकुल कुमार,  अंबाला नगर निगम की मेयर अक्षिता सैनी सहित अम्बाला मंडल के आयुक्त, जिले के उपायुक्त (डी.सी.) को  भेजी गई है।

 

हेमंत ने साथ-साथ अम्बाला नगर निगम के कमिश्नर वीरेंद्र सिंह सहरावत को भी लिखकर आह्वान  किया है कि वे उनकी न.नि. कमिश्नर पर की गयी  नियुक्ति संबंधी अधिसूचना को सरकारी गजट में  तत्काल प्रकाशित करवाने के लिए राज्य सरकार के समक्ष मामला उठाएं। हालांकि सहरावत इस विषय पर मौन हैं और उन्होंने आजतक कोई जवाब तक नहीं दिया.

 

पहले भी उठाते रहे हैं कानूनी मुद्दे

 

हेमंत  इससे पहले भी अंबाला नगर निगम के कानूनी अस्तित्व सम्बन्धी स्थिति अर्थात  कानूनन आवश्यक 3 लाख जनसंख्या मानदंड से कम आबादी होने का मामला, वार्ड पार्षद बनाम सदस्य विवाद, प्रत्यक्ष तौर पर निर्वाचित मेयर की  व्यवस्था बावजूद अप्रत्यक्ष रूप से मेयर निर्वाचन का कानूनी प्रावधान तथा नगर निगम कानून और निर्वाचन नियमों के  विभिन्न प्रावधानों  से व्यापत विसंगति के जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं।

 

बढ़ सकता है विवाद

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रदेश सरकार अम्बाला नगर निगम कमिश्नर के  जल्द गजट अधिसूचना प्रकाशित  नहीं करती तो मामला अदालत  तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में नगर निगम प्रशासन द्वारा लिए गए निर्णयों की कानूनी वैधता पर भी व्यापक प्रश्नचिन्ह उठ सकता है.

By Dr. Rajesh Wadhwa

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