चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने शिक्षक शिक्षा पाठ्यक्रम संचालित करने वाले निजी कॉलेजों के निरीक्षण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) द्वारा अनुमोदित नहीं किए गए निरीक्षण प्रोफार्मा के आधार पर शैक्षणिक संस्थानों का निरीक्षण नहीं किया जा सकता।

अदालत ने माना कि हरियाणा सरकार द्वारा उपयोग में लाया जा रहा निरीक्षण प्रारूप एनसीटीई से स्वीकृत नहीं था, इसलिए उस पर निजी कॉलेजों की आपत्ति प्रथम दृष्टया उचित है।

जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने हरियाणा सेल्फ फाइनेंस प्राइवेट कालेजेज एसोसिएशन की याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया।

मामले में एसोसिएशन ने आरोप लगाया था कि राज्य सरकार और विश्वविद्यालय ऐसे निरीक्षण प्रारूप के आधार पर कॉलेजों की जांच कर रहे हैं, जिसे एनसीटीई ने कभी मंजूरी नहीं दी। याचिका में 26 जुलाई 2024 को उच्च शिक्षा विभाग, हरियाणा के महानिदेशक द्वारा जारी निरीक्षण प्रोफार्मा को भी चुनौती दी गई थी।

सुनवाई के दौरान एनसीटीई ने 27 मार्च 2026 को एक हलफनामा दाखिल किया था। इसमें कहा गया था कि याचिका के साथ संलग्न एक निरीक्षण प्रोफार्मा एनसीटीई का अधिकृत प्रारूप नहीं है।

गलती से दस्तावेज का उल्लेख गलत किया गया

हालांकि, बाद में यह स्पष्ट हुआ कि हलफनामे में संदर्भित दस्तावेज का उल्लेख गलती से गलत किया गया था। इस पर हाई कोर्ट ने एनसीटीई को स्पष्ट रूप से बताने को कहा था कि राज्य सरकार जिस निरीक्षण प्रारूप पर भरोसा कर रही है, क्या उसे एनसीटीई की मंजूरी प्राप्त है या नहीं।

सुनवाई के दौरान एनसीटीई ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा निरीक्षण प्रोफार्मा एनसीटीई का स्वीकृत प्रारूप नहीं है और परिषद उसे अधिकृत निरीक्षण दस्तावेज नहीं मानती।

एनसीटीई ने अदालत को यह भी बताया कि वर्तमान में निरीक्षण की पूरी प्रक्रिया आनलाइन प्रणाली के माध्यम से संचालित होती है। संस्थानों से डिजिटल माध्यम से आवश्यक सूचनाएं प्राप्त की जाती हैं और उसके बाद निरीक्षण किया जाता है।

परिषद की दो अलग-अलग टीमें निरीक्षण प्रक्रिया में शामिल होती हैं। एक टीम मुख्यालय में बैठकर सूचनाओं का विश्लेषण करती है, जबकि दूसरी टीम कॉलेजों का भौतिक निरीक्षण कर अपनी टिप्पणियां डिजिटल माध्यम से मुख्यालय भेजती है।

अदालत ने कहा कि जब स्वयं एनसीटीई यह स्वीकार कर रही है कि राज्य सरकार का निरीक्षण प्रारूप अधिकृत नहीं है, तब उस प्रारूप के आधार पर एनसीटीई द्वारा विनियमित शिक्षण संस्थानों का निरीक्षण किए जाने पर याचिकाकर्ता की आपत्ति में दम नजर आता है।

2020 में सरकार ने वापस ली अपनी मांग

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता एसोसिएशन ने वर्ष 2020 के कुछ सरकारी निर्देशों को चुनौती देने की अपनी मांग वापस ले ली। इसके अलावा विश्वविद्यालय की बैठक की कार्यवाही और उससे संबंधित निर्णयों को चुनौती देने वाली प्रार्थनाएं भी वापस लेते हुए अलग से स्वतंत्र कानूनी कार्यवाही करने की अनुमति मांगी। अदालत ने इसे स्वीकार करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया और लंबित सभी आवेदनों को भी समाप्त कर दिया।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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