चंडीगढ़। करीब 24 वर्ष पुराने एक हत्या मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहे पति-पत्नी को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया, जबकि मृतक पर कुल्हाड़ी से हमला करने वाले मुख्य आरोपित की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पति-पत्नी को मृतक को पकड़कर रखने की जो भूमिका दी गई थी, वह मेडिकल साक्ष्यों और घटनाक्रम से मेल नहीं खाती। जस्टिस एनएस शेखावत और जस्टिस एच एस ग्रेवाल की खंडपीठ ने ओमपति और रिसाला की अपील स्वीकार करते हुए उन्हें दोषमुक्त कर दिया, जबकि सह-आरोपी सतबीर की अपील खारिज कर दी।
मामला मार्च 2002 में भिवानी जिले के ककरोली हुक्मी गांव में हुई सोमबीर की हत्या से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार रात करीब 10 बजे दो प्रत्यक्षदर्शियों ने देखा कि रिसाला और उसकी पत्नी ओमपति ने सोमबीर को पकड़ रखा था, जबकि सतबीर उसके सिर पर कुल्हाड़ी से लगातार वार कर रहा था। गंभीर चोटों के कारण सोमबीर की मौके पर ही मौत हो गई। इसके बाद पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर तीनों को गिरफ्तार किया था।
सत्र न्यायालय ने वर्ष 2004 में तीनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और मेडिकल विशेषज्ञ की गवाही का विस्तृत परीक्षण किया। डाक्टर ने जिरह में स्वीकार किया कि यदि एक या दो व्यक्ति मृतक को पकड़कर रखते, तो कुछ चोटों का स्वरूप अलग होता। डाक्टर ने यह भी माना कि चोटें उस स्थिति में भी लग सकती थीं जब मृतक बैठा हुआ या लेटा हुआ हो।
अदालत ने पाया कि रिसाला पहले से पैर की गंभीर चोट से पीड़ित था और लाठी के सहारे चलता था। बचाव पक्ष ने चिकित्सकीय रिकार्ड भी पेश किए, जिनसे उसके पैर के फ्रैक्चर की पुष्टि हुई। इसके अलावा ओमपति गांव के स्कूल में चपरासी के रूप में कार्यरत थी और उसने दावा किया कि घटना के समय वह स्कूल की निगरानी के लिए वहां गई हुई थी।
खंडपीठ ने कहा कि ओमपति और रिसाला के खिलाफ केवल मृतक को पकड़ने का आरोप था। उनके कब्जे से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ और न ही कोई स्वतंत्र गवाह उनके खिलाफ सामने आया। मेडिकल साक्ष्य भी अभियोजन की इस कहानी का पूर्ण समर्थन नहीं करते। ऐसे में उनके खिलाफ संदेह की स्थिति बनी रहती है, जिसका लाभ उन्हें दिया जाना चाहिए।
वहीं अदालत ने सतबीर के खिलाफ प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही, उसकी निशानदेही पर बरामद खून से सनी कुल्हाड़ी तथा फोरेंसिक रिपोर्ट को भरोसेमंद माना। अदालत ने कहा कि हत्या के वास्तविक हमलावर के रूप में उसकी भूमिका स्पष्ट रूप से साबित होती है। इसी आधार पर उसकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया
