(खुलापन या भ्रम—मीडिया, मार्केट और बदलती मानसिकता के बीच आकर्षण का अतिरेक, और खोती हुई मानवीय संवेदनाओं का संकट)
— डॉ. सत्यवान सौरभ
आज का समय एक विचित्र द्वंद्व का समय है। एक ओर हम स्वयं को आधुनिक, जागरूक और खुला समाज घोषित करते हैं, तो दूसरी ओर हमारी चेतना का एक बड़ा हिस्सा लगातार एक ही बिंदु के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है—देह, आकर्षण और कामना का अतिशय प्रदर्शन। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि बीते दो-तीन दशकों में जीवन के लगभग हर क्षेत्र में “सेक्स” एक केंद्रीय विमर्श के रूप में उभरा है, किंतु यह विमर्श संतुलित या संवेदनशील न होकर अधिकतर बाज़ार, उपभोग और सतही उत्तेजना तक सीमित रह गया है। परिणामस्वरूप, जो विषय स्वाभाविक, निजी और मानवीय अनुभव का हिस्सा होना चाहिए था, वह अब एक उत्पाद, एक रणनीति और निरंतर परोसी जाने वाली सामग्री में परिवर्तित हो गया है।
बाज़ार ने इस परिवर्तन को सबसे पहले पहचाना और सबसे आक्रामक रूप में भुनाया। विज्ञापनों से लेकर फिल्मों, वेब सीरीज़ और सोशल मीडिया तक, हर जगह देह का एक विशेष प्रकार का चित्रण दिखाई देता है, जो आकर्षण को बेचने का सबसे आसान माध्यम बन चुका है। साबुन, शैम्पू, कपड़े, यहाँ तक कि रोज़मर्रा की साधारण वस्तुओं के प्रचार में भी यौन संकेतों का प्रयोग अब सामान्य हो गया है। यह प्रवृत्ति केवल उत्पाद बेचने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे दर्शकों की संवेदनाओं और अपेक्षाओं को भी प्रभावित करती है। जब हर ओर एक ही तरह का संदेश बार-बार दोहराया जाता है, तो वह सामान्य प्रतीत होने लगता है—और यही सामान्यीकरण सबसे बड़ी चिंता का विषय है।
इस बदलते परिदृश्य में केवल बाज़ार ही नहीं, बल्कि वे क्षेत्र भी शामिल हो गए हैं जो कभी मूल्य, अनुशासन और संतुलन के प्रतीक माने जाते थे। शिक्षा, अध्यात्म, स्वास्थ्य और व्यक्तिगत विकास जैसे क्षेत्रों में भी “बेहतर जीवन” की परिभाषा को एक विशेष दिशा में मोड़ दिया गया है। जीवन की जटिलताओं का समाधान अब अक्सर इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि व्यक्ति अपनी “सेक्स लाइफ” को बेहतर बना ले, मानो यह जीवन के हर असंतुलन का अंतिम उत्तर हो। यह सरलीकरण न केवल भ्रामक है, बल्कि जीवन के अन्य महत्वपूर्ण आयामों—जैसे मानसिक शांति, संबंधों की गहराई, सामाजिक जिम्मेदारी और आत्मिक संतुलन—को भी हाशिये पर डाल देता है।
इस पूरे परिदृश्य का सबसे गहरा प्रभाव मानवीय संबंधों पर पड़ा है। रिश्तों की जो आत्मीयता, सहजता और भरोसा कभी उनकी आधारशिला हुआ करती थी, वह धीरे-धीरे प्रदर्शन, अपेक्षा और तुलना के दबाव में कमजोर होती जा रही है। प्रेम, जो कभी एक गहरी अनुभूति और आत्मिक जुड़ाव का प्रतीक था, अब अक्सर बाहरी अभिव्यक्तियों और शारीरिक आकर्षण तक सीमित कर दिया जाता है। इससे न केवल संबंधों की गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि व्यक्ति के भीतर एक स्थायी असंतोष भी जन्म लेता है, क्योंकि वह लगातार एक आदर्श छवि को पाने की कोशिश में रहता है, जो वास्तविकता से कोसों दूर होती है।
स्त्री-पुरुष संबंधों के संदर्भ में यह बदलाव और भी जटिल हो जाता है। स्त्री का चित्रण लंबे समय से समाज में बहस का विषय रहा है, किंतु वर्तमान समय में यह चित्रण एक नए प्रकार के वस्तुकरण की ओर संकेत करता है। स्त्री को एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत किया जाना उसकी पहचान को सीमित कर देता है। यह प्रवृत्ति केवल पुरुष दृष्टि तक सीमित नहीं है, बल्कि कई बार स्वयं स्त्रियाँ भी इसी ढाँचे के भीतर अपनी स्वीकृति तलाशने लगती हैं। इससे एक ऐसा चक्र निर्मित होता है, जिसमें वास्तविक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की जगह बाहरी मानकों को पूरा करने की होड़ ले लेती है।
मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस प्रवृत्ति को और तीव्र कर दिया है। एल्गोरिद्म आधारित दुनिया में वही सामग्री अधिक दिखाई जाती है जो तुरंत ध्यान आकर्षित करे और अधिक प्रतिक्रिया प्राप्त करे। ऐसे में गहराई, संवेदना और विचारशीलता की जगह उत्तेजना, सनसनी और त्वरित संतुष्टि को प्राथमिकता मिलती है। यह न केवल दर्शकों की पसंद को प्रभावित करता है, बल्कि रचनाकारों को भी उसी दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करता है। धीरे-धीरे यह एक ऐसी संस्कृति का निर्माण करता है, जहाँ गंभीरता और संवेदनशीलता को कम महत्व दिया जाता है।
इस सबके बीच एक और गंभीर पहलू उभरता है—सुरक्षा और नैतिकता का प्रश्न। जब समाज में देह और यौनता का अत्यधिक और असंतुलित प्रदर्शन होता है, तो उसका प्रभाव व्यवहार पर भी पड़ता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल इसी कारण अपराध बढ़ते हैं, किंतु यह भी सत्य है कि एक असंतुलित और विकृत दृष्टिकोण सामाजिक वातावरण को प्रभावित करता है। बच्चों और किशोरों पर इसका प्रभाव विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि वे अभी अपने मूल्यों और समझ का निर्माण कर रहे होते हैं। जब वे हर ओर एक ही प्रकार के संकेत देखते हैं, तो उनके लिए सही और गलत के बीच संतुलन स्थापित करना कठिन हो जाता है।
यह स्थिति हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न के सामने खड़ा करती है—क्या वास्तव में हम एक अधिक परिपक्व और खुले समाज की ओर बढ़ रहे हैं, या केवल एक ऐसे भ्रम में जी रहे हैं, जहाँ खुलापन केवल प्रदर्शन तक सीमित है? परिपक्वता का अर्थ केवल वर्जनाओं को तोड़ना नहीं होता, बल्कि यह समझना भी होता है कि किस सीमा तक, किस संदर्भ में और किस संवेदनशीलता के साथ किसी विषय को देखा और प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यदि इस संतुलन की अनदेखी की जाती है, तो खुलापन भी एक नए प्रकार की बंदिश में परिवर्तित हो सकता है।
समाधान इस स्थिति से भागने में नहीं, बल्कि उसे समझने और संतुलित करने में निहित है। यौनता मानव जीवन का एक स्वाभाविक और महत्वपूर्ण हिस्सा है, किंतु इसे जीवन का केंद्र बना देना न तो आवश्यक है और न ही स्वस्थ। हमें यह स्वीकार करना होगा कि जीवन की समृद्धि केवल एक आयाम में नहीं, बल्कि अनेक आयामों के संतुलन में निहित है। शिक्षा, कला, साहित्य और मीडिया को इस संतुलन को पुनः स्थापित करने की दिशा में प्रयास करना होगा, ताकि समाज में एक अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार दृष्टिकोण विकसित हो सके।
अंततः, यह केवल बाहरी परिवर्तन का प्रश्न नहीं, बल्कि आंतरिक जागरूकता का भी विषय है। जब तक व्यक्ति स्वयं यह नहीं समझेगा कि वह क्या देख रहा है, क्यों देख रहा है और उसका उस पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, तब तक कोई भी बाहरी प्रयास अधूरा रहेगा। हमें अपने भीतर उस संवेदनशीलता को पुनः जागृत करना होगा, जो किसी व्यक्ति को केवल देह नहीं, बल्कि एक संपूर्ण अस्तित्व के रूप में देख सके। यही वह दिशा है, जो हमें इस अतिरेक और असंतुलन से बाहर निकालकर एक अधिक मानवीय, संतुलित और सार्थक समाज की ओर ले जा सकती है।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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