सरसंघचालक डा. मोहनराव भागवत ने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के श्रीमद्भगवद् गीता सभागार में शिक्षाविदों, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के साथ किया संवाद
कुरुक्षेत्र, 28 फरवरी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा.मोहनराव भागवत ने कहा कि समाज, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और श्रेष्ठ आचरण ही संघ के कार्य का मूल आधार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि नैतिक मूल्यों, आचरण, संस्कार और समाज के प्रति प्रतिबद्धता के साथ पुरुषार्थ का समन्वय आवश्यक है, तभी स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है। सरसंघचालक शनिवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के श्रीमद्भगवद् गीता सभागार में संघ शताब्दी वर्ष के मध्य प्रमुख जन गोष्ठी में हरियाणा प्रदेश के प्रमुख शिक्षाविदों, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान मंच पर सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस. जयसवाल,उत्तर क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल और प्रांत संघचालक प्रताप सिंह मौजूद रहे। उन्होंने इस अवसर कुटुंब प्रबोधन पर भी जोर दिया। परिवार की भूमिका पर विशेष बल देते हुए उन्होंने कहा कि घरों में मंगल संवाद की परंपरा विकसित होनी चाहिए, जहां मन से मन का संवाद हो और बच्चों को उचित-अनुचित का बोध कराया जाए। उनका कहना था कि केवल उपदेश नहीं, बल्कि संवाद और संस्कारयुक्त वातावरण ही व्यक्ति को भटकाव से बचाता है। सरसंघचालक ने कहा कि संपत्ति के समय साथ खड़े होने वाले बहुत होते हैं, लेकिन विपत्ति में साथ देने वाला कौन है, यह परिवार और समाज के संस्कार तय करते हैं। यदि कोई भी इंसान असफल हो जाए या बुरी संगति में पड़ जाए, तो उसे मार्गदर्शन देने वाला, समझाने वाला और संभालने वाला अपना परिवार और समाज ही होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कुटुंब और समाज में संस्कारों का वातावरण निर्माण करना समय की आवश्यकता है, क्योंकि यही वातावरण जिम्मेदार, संवेदनशील और चरित्रवान व्यक्तित्व का निर्माण करता है। उन्होंने कहा कि संघ के बारे में जो बोला वह आपने सुना है, यह कैसा और क्यों हुआ है, इसको जानने के बाद संघ को और आगे कैसे बढ़ा सकते हैं यह इसकी कल्पना है, संघ को समझना है तो संघ में आकर ही समझना पड़ेगा। केवल बाहर से देखकर और कल्पना और फैलाये जा रहे नैरेटिव से नहीं समझ सकते, क्योंकि संघ का जैसा काम है, वैसा दुनिया में और कहीं नहीं है। आज पांचों महाद्वीपों से महत्वपूर्ण लोग संघ को देखने, जानने और समझने के लिए आते हैं। वे भी अपने देश के युवाओं के लिए इस तरह का विचार संगठन खड़ा करने के लिए सहयोग मांगते हैं, क्योंकि उसके पास में ऐसा ढांचा नहीं है।
संघ का मूल कार्य व्यक्तित्व निर्माण और समाज संगठन
संघ का मूल कार्य व्यक्तित्व निर्माण और समाज संगठन है। संघ स्वयं को उद्धारक नहीं मानता, बल्कि समाज को सक्षम बनाने का कार्य करता है। उनके अनुसार, प्रत्येक गांव और बस्ती में ऐसे लोगों का निर्माण जरूरी है जो राष्ट्रीय चरित्र के उदाहरण बनें और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करें।सरसंघचालक ने यह भी कहा कि संघ संपूर्ण समाज को जोड़ने की बात करता है और विरोधी विचारों वाले लोगों के प्रति भी घृणा नहीं, बल्कि करुणा का भाव रखना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू किसी संकीर्ण पहचान का नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और गुणात्मक जीवन दृष्टि का प्रतीक है, जिसका मूल आधार संस्कार, आचरण और राष्ट्रहित है।
चरित्र से मजबूत होता है राष्ट्र, संघ मूल्य आधारित संगठन :ले. जनरल बी.एस. जायसवाल
संघ शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस. जायसवाल ने अपने संबोधन की शुरूआत वंदे मातरम् के उद्घोष से की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्ष की यात्रा को असाधारण बताया। उन्होंने कहा कि विश्व में शायद ही कोई ऐसा संगठन हो जो इतने वर्षों से निरंतर विस्तार और प्रभाव के साथ कार्य कर रहा हो। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम में उपस्थित होकर उन्हें नैतिक मूल्यों से प्रेरित वातावरण का अनुभव हुआ। जयसवाल ने संघ को एक वैल्यू-आधारित संगठन बताते हुए कहा कि सेना की तरह संघ भी अनुशासन, संस्कार और राष्ट्रीयता के भाव से परिपूर्ण है। उन्होंने हिंदू संस्कृति को भारत की पहचान बताते हुए कहा कि यदि संस्कृति समाप्त हो जाए तो केवल भूमि रह जाएगी, चरित्र नहीं। उन्होंने कहा कि संघ के माध्यम से राष्ट्र के प्रति निष्ठा और चरित्र निर्माण का कार्य निरंतर बढ़ रहा है।
