चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के उस आदेश पर अंतरिम राहत दी है, जिसमें स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के लिए नई जियो-फेंसिंग मोबाइल एप के जरिए उपस्थिति दर्ज करना अनिवार्य किया गया है।

अदालत ने बृहस्पतिवार को राज्य सरकार को निर्देश दिया कि फिलहाल इस आदेश का पालन नहीं करने पर कर्मचारियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाए। मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी 2026 को होगी।

यह आदेश जस्टिस संदीप मौदगिल ने कर्मचारियों के नौ संघों के गठबंधन की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। इन संघों में डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य कर्मचारियों के संगठन शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं ने 30 मई 2025 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें स्वास्थ्य विभाग के सभी कर्मचारियों को ‘जियो-फेंस्ड अटेंडेंस’ एप डाउनलोड कर उपस्थिति दर्ज करना अनिवार्य किया गया है।
कर्मचारियों का तर्क है कि पहले से ही बायोमीट्रिक सिस्टम मौजूद है और नया एप उनकी निजता का उल्लंघन करता है। याचिका में कहा गया है कि यह एप जीपीएस आधारित ट्रैकिंग पर काम करता है और कार्यस्थल से 500 मीटर की सीमा के भीतर लोकेशन दर्ज करता है। इससे न केवल कर्मचारियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होती है, बल्कि उनके मोबाइल फोन ‘24 घंटे निगरानी के औजार’ में बदल जाते हैं।

याचिकाकर्ताओं ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 का हवाला देते हुए कहा कि बिना स्पष्ट सहमति के लोकेशन और निजी डेटा लेना असंवैधानिक है। इसके अलावा, एप केवल स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों पर लागू किया गया है, जबकि अन्य विभागों में ऐसा कोई नियम नहीं है, जिससे यह भेदभावपूर्ण और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

 

यह दिया गया हवाला याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फ्रैंक विट्स बनाम नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो मामले का हवाला देते हुए कहा कि जब अदालत ने जमानत की शर्त के रूप में जीपीएस ट्रैकिंग को भी असंवैधानिक ठहराया था, तब निर्दोष सरकारी कर्मचारियों पर इस तरह का बंधन और भी अनुचित है।

सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा और तब तक किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश जारी किया।

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