आध्यात्मिक संस्कृति ही भारत की आत्मा: डॉ. मनमोहन वैद्य
भारत की भारतीयता में सांस्कृतिक विविधता निहित: प्रो. सोमनाथ सचदेवा
भारत की भारतीय अवधारणा विषय पर प्राध्यापक गोष्ठी एवं संवाद कार्यक्रम
कुरुक्षेत्र, 15 जुलाई। 
आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भारत का इतिहास सदैव गौरव एवं गर्व से परिपूर्ण रहा है। पूरे विश्व में यही भारत की सांस्कृतिक पहचान है। आध्यात्मिक संस्कृति ही भारत की आत्मा है। यहां की लोक सांस्कृतिक आध्यात्मिकता में व्यवसायिकता एवं भारत की धर्म संस्कृति के दर्शन होते हैं। सदियों से चली आ रही इसी परम्परा के आधार पर भारत ने पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान बनाई है।  यह उद्गार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य ने मंगलवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के डॉ. बी.आर. अम्बेडकर अध्ययन केन्द्र एवं विवेकानंद विचार मंच द्वारा सीनेट हॉल में भारत की भारतीय अवधारणा विषय पर प्राध्यापक गोष्ठी एवं संवाद कार्यक्रम में व्यक्त किए। इससे पहले डॉ. मनमोहन वैद्य, कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा, एनआइटी के निदेशक प्रो. बीवी रमन्ना रेड्डी, कुलसचिव डॉ. वीरेन्द्र पॉल तथा केन्द्र के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।
डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा कि आजादी के पश्चात भारत का सही स्वरूप में मूल्यांकन एंव नीतियों का प्रस्तुतिकरण नहीं हुआ जिसकी बदौलत भारत उसके साथ आजाद होने वाले देशों से आर्थिक प्रगति एवं सांस्कृतिक समृद्धता के क्षेत्र में उतनी प्रगति नहीं कर पाया जितनी होनी चाहिए थी। प्रथम सदी से लेकर 18वीं सदी तक भारत का पूरे विश्व की जीडीपी में 31 प्रतिशत से अधिक योगदान रहा है। भारत का व्यवसायिक स्वरूप यूरोप की नकल नहीं है। भारत स्वयं की पहचान का परिचायक है।
इससे पहले केयू डॉ. भीमराव अम्बेडकर अध्ययन केन्द्र के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने मुख्यातिथि तथा आए हुए सभी मेहमानों का स्वागत किया तथा मुख्यातिथि डॉ. मनमोहन वैद्य का आत्मिक परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अम्बेडकर शोध संस्थान समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि भारत की भारतीयता में सांस्कृतिक विविधता निहित है। भारत विविध संस्कृतियों का देश है। इसकी विविधता में एकता ही भारत की विशिष्ट पहचान है। वर्तमान दौर में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत भारत में भारतीय संस्कृति, भाषा एवं संस्कारों को स्थान दिया गया है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय भारत का पहला ऐसा विश्वविद्यालय है जिसने पूरे देश में सभी प्रावधानों के साथ एनईपी को सर्वप्रथम लागू किया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में रोजगारपरकता एवं लोक सांस्कृतिक विविधता का समावेश देखने को मिलता है।
इस अवसर पर कुलसचिव डॉ. वीरेन्द्र पाल ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि आज का व्याख्यान वास्तव में भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं से जुड़ा हुआ व्याख्यान रहा जिसमें डॉ. मनमोहन वैद्य ने भारत की सांस्कृतिक परम्पराओं एवं धार्मिक संस्कारों एवं सरोकारों को भारतीय परम्परा के अनुसार प्रस्तुत किया है। उन्होंने सभी अतिथियों सहित मीडिया बंधुओं का भी धन्यवाद ज्ञापित किया। मंच का संचालन डॉ. संगीता धीर ने किया।
इस अवसर पर एनआईटी के निदेशक प्रो. बी.वी. रमना रेड्डी, कुवि कुलसचिव डॉ. वीरेन्द्र पॉल, डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. दिनेश कुमार, छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. एआर चौधरी, केन्द्र के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह, विजय कुमार नड्डा, संजय, चंद्र, विकास, प्रो. नीलम ढांडा, प्रो.उषा, प्रो. रीटा, प्रो. परमेश कुमार, प्रो. मोहिन्द्र चांद, प्रो. अमित लूदरी, प्रो. सुशीला चौहान, प्रो. निर्मला चौधरी, प्रो. अनिल वशिष्ठ, लोक सम्पर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया, प्रो. कुसुम लता, डॉ. रमेश सिरोही, विश्वविद्यालय व महाविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी व विद्यार्थी मौजूद थे।
एसडीजी पुस्तक वर्तमान समझ और नई संभावनाओं की खोजः प्रो. सोमनाथ सचदेवा
कुवि कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने किया एस.डी.जी. पुस्तक का विमोचन किया।
कुरुक्षेत्र, 15 जुलाई।
 कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने प्रो. (डॉ.) ए.आर. चौधरी, डॉ. मीनाक्षी सुहाग, डॉ. संजीव कादयान, सुखबीर सिंह, डॉ. नरेंद्र कुमार, श्रीमती रजनी देवी द्वारा सम्पादिक पुस्तक सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) वर्तमान समझ और नई संभावनाओं की खोज का विमोचन किया।
इस अवसर पर कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने पुस्तक के सम्पादको को बधाई देते हुए कहा कि यह संपादित खंड, सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) वर्तमान समझ और नई संभावनाओं की खोज, एक सामयिक अकादमिक प्रयास है जो हमारे ज्ञान को गहन करने और वर्तमान विमर्श की सीमाओं का विस्तार करने के लिए बहु-विषयक अंतर्दृष्टि, क्षेत्र-आधारित साक्ष्य और दूरदर्शी विचारों को एक साथ लाता है। पुस्तक के सम्पादक प्रो. एआर चौधरी ने बताया कि यह पुस्तक इंदु बुक सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित है। यह पुस्तक सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) से संबंधित अवधारणाओं को सार्थक कार्यों में परिवर्तित करने के लिए कार्यरत हैं।
इस अवसर पर कुलसचिव डॉ. वीरेन्द्र पॉल, छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. (डॉ.) ए.आर. चौधरी, लोक सम्पर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया, पर्यावरण विभाग से डॉ. मीनाक्षी सुहाग, डॉ. नीरज बातिश, सीनियर रिसर्च फैलो लाईब्रेरी साइंस से सुखबीर सिंह, गवर्नमेंट कॉलेज मटक माजरी इंद्री से श्रीमती रजनी देवी मौजूद थे।

प्रो. अनिल कुमार गुप्ता ने संभाला कुवि प्राक्टर का कार्यभार
कुरुक्षेत्र, 15 जुलाई। 
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा के आदेशनुसार आईआईएचएस के प्रोफेसर अनिल कुमार गुप्ता ने मंगलवार को विधिवत रूप से कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्राक्टर पद का कार्यभार संभाला। उन्होंने इस महत्वपूर्ण जिम्मेवारी को सौंपने के लिए कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा का आभार प्रकट करते हुए विश्वविद्यालय के हित में कर्तव्यनिष्ठा के साथ कार्य करने की बात कही।
इस अवसर प्रो. अजमेर सिंह, प्रो. भगवान सिंह चौधरी, प्रो. प्रेम सिंह, प्रो. संजीव शर्मा, लोक सम्पर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया, प्रो. अनिता दुआ, कुटा प्रधान प्रो. दीपक राय बब्बर, प्रो. ज्ञान चहल, प्रो. जितेन्द्र भारद्वाज, प्रो. आरके देसवाल, डॉ. जितेन्द्र खटकड़, डॉ. हरविन्द्र सिंह लौंगोवाल, सौरभ चौधरी, डॉ. आशीष अनेजा, कुलपति के ओएसडी पवन रोहिला, कुंटिया महासचिव रविन्द्र तोमर, नीलकंठ, नरेन्द्र वर्मा, पुष्पेंद्र तोमर ने उनको बधाई दी।
डॉ. ऋषिपाल कुवि कार्यकारिणी परिषद के सदस्य मनोनीत
कुरुक्षेत्र, 15 जुलाई। 
 वरिष्ठ शिक्षाविद् डॉ. ऋषिपाल को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी परिषद  का सदस्य नियुक्त किया गया है। यह मनोनयन कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.  सोमनाथ सचदेवा द्वारा आगामी एक वर्ष की अवधि हेतु किया गया है।
डॉ. ऋषिपाल ने अपने मनोनयन पर कुवि कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा का आभार प्रकट करते हुए कहा कि यह उनके लिए केवल एक दायित्व नहीं, अपितु एक सृजनात्मक उत्तरदायित्व है। विश्वविद्यालय की नीति-निर्माण प्रक्रिया में अपना योगदान देना उनके लिए गौरव की बात है। यह मनोनयन शिक्षा-जगत में उन मूल्यों की पुनर्पुष्टि है, जहाँ अनुभव, विद्वता और संस्कृति के प्रति समर्पण को सम्मान मिलता है।

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