व्यास पूर्णिमा गुरु शिष्य परंपरा तथा कृतज्ञता का है पर्व : गीता मनीषी
श्री कृष्ण कृपा जीओ गीता परिवार द्वारा श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया व्यास पूर्णिमा उत्सव
कुरुक्षेत्र, 11 जुलाई। गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज के सानिध्य में श्री कृष्ण कृपा जीओ गीता परिवार द्वारा गीता ज्ञान संस्थानम् में व्यास पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) उत्सव श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विभिन्न स्थानों से आए श्रद्धालुओं ने भारी संख्या में गुरु पूजा की और गीता मनीषी का आशीर्वाद प्राप्त किया। कार्यक्रम से पहले अनेक श्रद्धालुओं ने गीता मनीषी से दीक्षा भी प्राप्त की। उत्सव का शुभारंभ स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने महर्षि वेदव्यास की प्रतिमा के आगे दीप प्रज्जवलित करके किया। इस अवसर पर प्रसिद्ध भजन गायक नीतिन कथूरिया तथा रत्न रशिक द्वारा गाए गए भजनों से वातावाण भक्तिमय हो गया।
गीता मनीष ने व्यास पीठ से दिए आशीर्वचन में कहा कि व्यास पूर्णिमा भारतीय सनातन परंपराओं का दिव्य पर्व है। महर्षि वेदव्यास एक ऐसा नाम जहां से ग्रंथ पंरपरा की दिव्यता हमें प्राप्त हुई। चारों वेदों की परंपरा महर्षि वेदव्यास की देन है। महाभारत, पुराण व गीता यदि हमारे तक पहुंचे तो उसके मूल में भी महर्षि व्यास की कृपा है। व्यास एक परंपरा तथा प्रेरणा है। व्यास जी की गणना भगवान के अवतार के रूप मे हाती है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता को गाया था लेकिन महर्षि वेदव्यास ने इस गीता ज्ञान को व्यवहारिक रूप में लेखनीबद्ध करके जन जन तक पहुंचाया। महर्षि वेदव्यास मूल ग्रंथ परंपरा के पुरोधा हैं। वेदों के ज्ञान की व्यवस्था तथा संपादन भी महर्षि वेदव्यास ने किया और यह ज्ञान गुरु पंरपरा के माध्यम से हम तक पहुंचा। गीता मनीषी ने अपने प्रवचन में कुरुक्षेत्र से अयोध्या व बद्रीनाथ धाम के संबंध पर भी प्रकाश डाला। व्यास पूर्णिमा गुरु शिष्य परंपरा का पर्व है। यह पर्व कृतज्ञता के साथ जुड़ा है। व्यास एक सक्षम एवं समृद्ध परंपरा है। व्यास की कृपा से ही हमें गीता ज्ञान मिला। चार वेद, महाभारत, गीता, पुराण, उपनिषेद आदि का ज्ञान जन जन तक पहुंचाने वाले वेद व्यास जी है। व्यास जी आज भी परंपरा के रूप मे जुड़े ह़ुए है। इसलिए आज भी जिस आसन से कथा या प्रवचन किया जाता है, उसे व्यास पीठ कहा जाता है। व्यास पीठ को प्रणाम करना सनातन परंपराओं को प्रणाम है। गीता मनीषी ने कहा कि व्यास पीठ की मर्यादा होनी चाहिए। व्यास पीठ एक परंपरा और मर्यादा है। गुरु पूजा की परंपरा कृतज्ञता का सम्मान है। जो ज्ञान व्यास से शुरु हुआ ओर परंपरा के रूप में गुरु के माध्यम से हमें प्राप्त हुआ है। इसलिए व्यास पूर्णिमा गुरु शिष्य परंपरा का सम्मान है। सनातन कब शुरु हुआ इसकी कोई तारीख नही है जब से सृष्टि प्रारंभ हुई, उसी समय से सनातन शुरु हुआ। गीता मनीषी ने कहा कि यह पर्व परंपरा के सम्मान के रूप मे मनाया जाता है।
गीता मनीषी ने जानकारी दी कि जीओ गीता द्वारा गीता के प्रचार प्रसार के लिए सर्टिफिकेट डिप्लोमा और डिग्री के ऑनलाईन पाठयक्रम शुरु किए गए हैं। उन्होने आह्वान किया कि जीओ गीता की यही पुकार गीता बने घर घर का श्रृंगार। इस अवसर पर ब्रह्मचारी शक्ति, कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पंकज सेतिया, मानद सचिव उपेंद्र सिंघल, 48 कोस तीर्थ निगरानी समिति के चेयरमैन मदन मेाहन छाबड़ा, आरएसएस के डा. प्रीतम, जिप के पूर्व चेयरमैन गुरदयाल सुनहेड़ी, अशोक चावला, श्री ब्राह्मण एवं तीर्थोद्धार सभा के सरंक्षक जयनारायण शर्मा, विजय नरूला, केडीबी सदस्य एमके मौदगिल, संस्थानम् के मीडिया प्रभारी रामपाल शर्मा, सुनील वत्स, इंजि. चंद्रप्रकाश शर्मा, मंगत राम जिंदल, मोहिंद्र सिंगला, पवन भारद्वाज, राकेश खुराना, प्रदीप सहगल, रमाकांत, धर्मपाल शर्मा, अशोक अरोड़ा, मीनाक्षी नरूला, सविता वत्स, सरोज शर्मा, मधु शर्मा सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों व बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने गीता मनीषी की आरती उतारी और गुरु पूजन कर गीता मनीषी का आशीर्वाद प्राप्त किया।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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