भारत में मानसून केवल एक मौसम नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और कृषि की जीवन रेखा है। जुलाई के मौजूदा हालात पर नजर डालें, तो यह जीवन रेखा आम नागरिक के लिए मौत का फरमान बनती नजर आ रही है। कश्मीर की वादियों से लेकर केरल के तटीय इलाकों तक, मानसून की दस्तक के साथ ही देश में एक बार फिर कुप्रबंधन का खामियाजा देखने को मिल रहा है। हर साल की तरह इस साल भी शहर जलमग्न हैं, नवनिर्मित एक्सप्रेस-वे उखड़ व बह रहे हैं, और किसान या तो सूखे से जूझ रहे हैं या बाढ़ में अपनी फसलें डूबती देख आंसू बहा रहे हैं। यह त्रासदी किसी प्राकृतिक आपदा की नहीं, बल्कि सरकारों और नौकरशाही की अव्यवस्था, भ्रष्टाचार और सुस्ती का परिणाम है, जिसका खामियाजा हमेशा की तरह आम आदमी अपनी जान और माल से चुका रहा है।
देश के उत्तर में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं अब रोजमर्रा की खबर बन गई हैं। सैलानियों से भरे वाहन मलबे में दफन हो रहे हैं। पहाड़ी राज्यों में बिना किसी इकोलॉजिकल स्टडी के किए गए अंधाधुंध निर्माण और सड़क चौड़ीकरण परियोजनाओं ने प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली को पूरी तरह तबाह कर दिया है। पहाड़ों का सीमेंटीकरण अब मौत को आमंत्रण दे रहा है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और एनसीआर के इलाकों में कुछ घंटों की बारिश ही शहर को डुबो रही है। सड़कों पर नदियां बह रही हैं और निचली बस्तियों में पानी घुसने से हजारों परिवार बेघर हो गए हैं। मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे इंजन ऑफ ग्रोथ माने जाने वाले शहरों में शहरी बाढ़ ने अरबों रुपये के नुकसान का कारण बना है। यह भौगोलिक विविधता यह स्पष्ट करती है कि समस्या बारिश नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में स्थानीय प्रशासन की नाकामी है।
आज भारत में सैकड़ों शहरों को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि ये शहर एक सामान्य बारिश का बोझ भी नहीं उठा सकते। शहरीकरण की अंधी दौड़ में तालाबों, झीलों और प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों को पाटकर रियल एस्टेट के नाम पर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए हैं। नौकरशाही और बिल्डर माफिया की सांठगांठ ने शहरों की प्राकृतिक स्पंज क्षमता को खत्म कर दिया है। निकासी नालियों की सफाई मानसून से पहले होनी चाहिए, लेकिन ठेकेदारों और स्थानीय निकायों की मिलीभगत से कागजों पर ही सफाई दिखाकर करोड़ों रुपये का बजट हड़प लिया जाता है। नतीजा यह होता है कि बारिश का पानी सड़कों और घरों में घुसने के लिए मजबूर हो जाता है। हाल ही में कई शहरों में बारिश के कारण दीवारें गिरने और बिजली के तारों से करंट लगने से दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है। इसे अगर प्रशासनिक हत्या न कहा जाए, तो और क्या कहा जाए?
मानसून की शुरुआत में ही देश की अवसंरचना की पोल भी खुल जाती है। हजारों करोड़ रुपये की लागत से बने नए एक्सप्रेस-वे और हाईवे बारिश की पहली ही बौछार के साथ दरकने लगते हैं। गड्ढों में तब्दील हो चुकी सड़कों पर हर रोज हादसे हो रहे हैं और कीमती जानें जा रही हैं। सवाल यह उठता है कि क्या हमारे इंजीनियरिंग मानक इतने कमजोर हैं? उत्तर है- नहीं। समस्या तकनीक में नहीं, बल्कि निर्माण सामग्री में की जा रही कटौती और भ्रष्टाचार में है। गुणवत्ता जांचने वाले अधिकारी रिश्वत की खातिर अपनी आंखें बंद कर लेते हैं। जब एक एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन होने के कुछ ही महीनों बाद उसका अस्तित्व मिटने लगता है, तो यह स्पष्ट है कि करदाताओं का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है और जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई गाज नहीं गिरती।
इस कुप्रबंधन की सबसे गहरी मार देश की कृषि पर पड़ी है। भारत की कृषि आज भी मानसून के जुए पर निर्भर है, लेकिन सरकारों की नाकामी ने इसे और भी घातक बना दिया है। देश के कई हिस्सों में किसान बारिश की एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। सूखे के कारण फसलें सूख रही हैं और किसान कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या करने को मजबूर हैं। इसके ठीक विपरीत, असम, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाढ़ ने तबाही मचा रखी है। नदियों के तटबंध हर साल टूटते हैं क्योंकि इनके रखरखाव के नाम पर हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये का घोटाला होता है। बाढ़ का पानी खेतों में खड़ी फसलों को डुबो देता है और किसान बर्बाद हो जाता है। जल संरक्षण, नदी जोड़ो और वाटरशेड मैनेजमेंट की योजनाएं केवल फाइलों में दबी हैं। सरकारें राहत पैकेज की घोषणाएं तो कर देती हैं, लेकिन वह पैसा भ्रष्ट अधिकारियों और बिचौलियों की जेबों में चला जाता है, जबकि पीड़ित किसान सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काट कर थक जाता है।
इस पूरी व्यवस्था में सबसे बड़ी विफलता आपदा प्रबंधन और नौकरशाही की सुस्ती में दिखती है। भारत मौसम विज्ञान विभाग द्वारा समय रहते रेड अलर्ट और ऑरेंज अलर्ट जारी किए जाते हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन इन चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लेता। आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के दिशानिर्देशों का पालन केवल कागजों तक सीमित रहता है। बारिश शुरू होने के बाद प्रशासन रिएक्टिव यानी प्रतिक्रियात्मक मोड में आता है, जबकि होना यह चाहिए था कि वे प्रोएक्टिव यानी सक्रिय रहें। नौकरशाही में जवाबदेही का पूर्ण अभाव है। यदि किसी शहर में जलजमाव होता है या किसी पुल के बहने से मौतें होती हैं, तो किसी भी उच्च अधिकारी या मंत्री को इस्तीफा देते या निलंबित होते नहीं देखा जाता। यही दंड से मुक्ति अधिकारियों और ठेकेदारों के हौसले बुलंद करती है। आम आदमी की जान की कीमत राजनीतिक रैलियों और उद्घाटन समारोहों में खर्च होने वाले करोड़ों रुपये के सामने कुछ भी नहीं मानी जाती।
इस पूरे तंत्र की विफलता का अंतिम और सबसे बड़ा शिकार हमेशा आम आदमी होता है। मध्यम वर्ग का कर्मचारी जलमग्न सड़कों पर अपना वाहन खो देता है, गरीब मजदूर की झुग्गी-झोपड़ी बारिश में ढह जाती है, और किसान अपनी मेहनत की कमाई प्रकृति और प्रशासन की भेंट चढ़ा देता है। बारिश के बाद फैलने वाली जलजनित बीमारियां जैसे डेंगू, मलेरिया और हैजा सरकारी अस्पतालों की बदहाल व्यवस्था के कारण महामारी का रूप ले लेती हैं। जानमाल का यह नुकसान किसी प्राकृतिक आपदा के कारण नहीं, बल्कि हमारे शासकों की संवेदनहीनता के कारण होता है।
इस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए तत्काल और कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। शहरों में कंक्रीटीकरण को रोककर रेनवाटर हार्वेस्टिंग, पारगम्य सड़कों और शहरी जंगलों को अनिवार्य किया जाए, ताकि हमारे शहर स्पंज सिटीज बन सकें। बुनियादी ढांचे के टूटने या जलजमाव के लिए जिम्मेदार इंजीनियरों, ठेकेदारों और अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए जाएं और उनकी संपत्तियां जब्त करने का प्रावधान बने। गांवों और शहरों में तालाबों और बावड़ियों को अतिक्रमण मुक्त कराकर उन्हें रिवाइव किया जाए। कृषि में सूखा और बाढ़ प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा दिया जाए और सिंचाई के लिए माइक्रो-इरिगेशन पर भारी सब्सिडी दी जाए। पंचायत और नगर निगम स्तर पर आपदा प्रबंधन समितियों को सशक्त और प्रशिक्षित किया जाए ताकि जमीनी स्तर पर तत्काल प्रतिक्रिया दी जा सके।
मानसून भारत के लिए वरदान है, लेकिन हमारे कुप्रबंधन ने इसे अभिशाप बना दिया है। जब तक सरकारें और नौकरशाही अपनी जिम्मेदारियों से भागती रहेंगी और भ्रष्टाचार का यही आलम रहेगा, तब तक हर जुलाई में शहर डूबेंगे, सड़कें टूटेंगी और आम आदमी रोएगा। अब समय आ गया है कि नागरिक इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाएं और उन नेताओं व अधिकारियों को जवाबदेह ठहराएं, जो हमारे टैक्स के पैसे से बनने वाली अवसंरचना को कागजों और भाषणों तक ही सीमित रखते हैं। प्रकृति के कहर से डरने की जरूरत नहीं है, जरूरत है तो बस हमारे हुक्मरानों की सुस्ती और लालफीताशाही को खत्म करने की, क्योंकि जब तक सिस्टम नहीं सुधरेगा, आम आदमी का यह रोना जारी रहेगा।
देश के उत्तर में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं अब रोजमर्रा की खबर बन गई हैं। सैलानियों से भरे वाहन मलबे में दफन हो रहे हैं। पहाड़ी राज्यों में बिना किसी इकोलॉजिकल स्टडी के किए गए अंधाधुंध निर्माण और सड़क चौड़ीकरण परियोजनाओं ने प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली को पूरी तरह तबाह कर दिया है। पहाड़ों का सीमेंटीकरण अब मौत को आमंत्रण दे रहा है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और एनसीआर के इलाकों में कुछ घंटों की बारिश ही शहर को डुबो रही है। सड़कों पर नदियां बह रही हैं और निचली बस्तियों में पानी घुसने से हजारों परिवार बेघर हो गए हैं। मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे इंजन ऑफ ग्रोथ माने जाने वाले शहरों में शहरी बाढ़ ने अरबों रुपये के नुकसान का कारण बना है। यह भौगोलिक विविधता यह स्पष्ट करती है कि समस्या बारिश नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में स्थानीय प्रशासन की नाकामी है।
आज भारत में सैकड़ों शहरों को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि ये शहर एक सामान्य बारिश का बोझ भी नहीं उठा सकते। शहरीकरण की अंधी दौड़ में तालाबों, झीलों और प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों को पाटकर रियल एस्टेट के नाम पर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए हैं। नौकरशाही और बिल्डर माफिया की सांठगांठ ने शहरों की प्राकृतिक स्पंज क्षमता को खत्म कर दिया है। निकासी नालियों की सफाई मानसून से पहले होनी चाहिए, लेकिन ठेकेदारों और स्थानीय निकायों की मिलीभगत से कागजों पर ही सफाई दिखाकर करोड़ों रुपये का बजट हड़प लिया जाता है। नतीजा यह होता है कि बारिश का पानी सड़कों और घरों में घुसने के लिए मजबूर हो जाता है। हाल ही में कई शहरों में बारिश के कारण दीवारें गिरने और बिजली के तारों से करंट लगने से दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है। इसे अगर प्रशासनिक हत्या न कहा जाए, तो और क्या कहा जाए?
मानसून की शुरुआत में ही देश की अवसंरचना की पोल भी खुल जाती है। हजारों करोड़ रुपये की लागत से बने नए एक्सप्रेस-वे और हाईवे बारिश की पहली ही बौछार के साथ दरकने लगते हैं। गड्ढों में तब्दील हो चुकी सड़कों पर हर रोज हादसे हो रहे हैं और कीमती जानें जा रही हैं। सवाल यह उठता है कि क्या हमारे इंजीनियरिंग मानक इतने कमजोर हैं? उत्तर है- नहीं। समस्या तकनीक में नहीं, बल्कि निर्माण सामग्री में की जा रही कटौती और भ्रष्टाचार में है। गुणवत्ता जांचने वाले अधिकारी रिश्वत की खातिर अपनी आंखें बंद कर लेते हैं। जब एक एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन होने के कुछ ही महीनों बाद उसका अस्तित्व मिटने लगता है, तो यह स्पष्ट है कि करदाताओं का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है और जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई गाज नहीं गिरती।
इस कुप्रबंधन की सबसे गहरी मार देश की कृषि पर पड़ी है। भारत की कृषि आज भी मानसून के जुए पर निर्भर है, लेकिन सरकारों की नाकामी ने इसे और भी घातक बना दिया है। देश के कई हिस्सों में किसान बारिश की एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। सूखे के कारण फसलें सूख रही हैं और किसान कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या करने को मजबूर हैं। इसके ठीक विपरीत, असम, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाढ़ ने तबाही मचा रखी है। नदियों के तटबंध हर साल टूटते हैं क्योंकि इनके रखरखाव के नाम पर हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये का घोटाला होता है। बाढ़ का पानी खेतों में खड़ी फसलों को डुबो देता है और किसान बर्बाद हो जाता है। जल संरक्षण, नदी जोड़ो और वाटरशेड मैनेजमेंट की योजनाएं केवल फाइलों में दबी हैं। सरकारें राहत पैकेज की घोषणाएं तो कर देती हैं, लेकिन वह पैसा भ्रष्ट अधिकारियों और बिचौलियों की जेबों में चला जाता है, जबकि पीड़ित किसान सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काट कर थक जाता है।
इस पूरी व्यवस्था में सबसे बड़ी विफलता आपदा प्रबंधन और नौकरशाही की सुस्ती में दिखती है। भारत मौसम विज्ञान विभाग द्वारा समय रहते रेड अलर्ट और ऑरेंज अलर्ट जारी किए जाते हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन इन चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लेता। आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के दिशानिर्देशों का पालन केवल कागजों तक सीमित रहता है। बारिश शुरू होने के बाद प्रशासन रिएक्टिव यानी प्रतिक्रियात्मक मोड में आता है, जबकि होना यह चाहिए था कि वे प्रोएक्टिव यानी सक्रिय रहें। नौकरशाही में जवाबदेही का पूर्ण अभाव है। यदि किसी शहर में जलजमाव होता है या किसी पुल के बहने से मौतें होती हैं, तो किसी भी उच्च अधिकारी या मंत्री को इस्तीफा देते या निलंबित होते नहीं देखा जाता। यही दंड से मुक्ति अधिकारियों और ठेकेदारों के हौसले बुलंद करती है। आम आदमी की जान की कीमत राजनीतिक रैलियों और उद्घाटन समारोहों में खर्च होने वाले करोड़ों रुपये के सामने कुछ भी नहीं मानी जाती।
इस पूरे तंत्र की विफलता का अंतिम और सबसे बड़ा शिकार हमेशा आम आदमी होता है। मध्यम वर्ग का कर्मचारी जलमग्न सड़कों पर अपना वाहन खो देता है, गरीब मजदूर की झुग्गी-झोपड़ी बारिश में ढह जाती है, और किसान अपनी मेहनत की कमाई प्रकृति और प्रशासन की भेंट चढ़ा देता है। बारिश के बाद फैलने वाली जलजनित बीमारियां जैसे डेंगू, मलेरिया और हैजा सरकारी अस्पतालों की बदहाल व्यवस्था के कारण महामारी का रूप ले लेती हैं। जानमाल का यह नुकसान किसी प्राकृतिक आपदा के कारण नहीं, बल्कि हमारे शासकों की संवेदनहीनता के कारण होता है।
इस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए तत्काल और कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। शहरों में कंक्रीटीकरण को रोककर रेनवाटर हार्वेस्टिंग, पारगम्य सड़कों और शहरी जंगलों को अनिवार्य किया जाए, ताकि हमारे शहर स्पंज सिटीज बन सकें। बुनियादी ढांचे के टूटने या जलजमाव के लिए जिम्मेदार इंजीनियरों, ठेकेदारों और अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए जाएं और उनकी संपत्तियां जब्त करने का प्रावधान बने। गांवों और शहरों में तालाबों और बावड़ियों को अतिक्रमण मुक्त कराकर उन्हें रिवाइव किया जाए। कृषि में सूखा और बाढ़ प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा दिया जाए और सिंचाई के लिए माइक्रो-इरिगेशन पर भारी सब्सिडी दी जाए। पंचायत और नगर निगम स्तर पर आपदा प्रबंधन समितियों को सशक्त और प्रशिक्षित किया जाए ताकि जमीनी स्तर पर तत्काल प्रतिक्रिया दी जा सके।
मानसून भारत के लिए वरदान है, लेकिन हमारे कुप्रबंधन ने इसे अभिशाप बना दिया है। जब तक सरकारें और नौकरशाही अपनी जिम्मेदारियों से भागती रहेंगी और भ्रष्टाचार का यही आलम रहेगा, तब तक हर जुलाई में शहर डूबेंगे, सड़कें टूटेंगी और आम आदमी रोएगा। अब समय आ गया है कि नागरिक इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाएं और उन नेताओं व अधिकारियों को जवाबदेह ठहराएं, जो हमारे टैक्स के पैसे से बनने वाली अवसंरचना को कागजों और भाषणों तक ही सीमित रखते हैं। प्रकृति के कहर से डरने की जरूरत नहीं है, जरूरत है तो बस हमारे हुक्मरानों की सुस्ती और लालफीताशाही को खत्म करने की, क्योंकि जब तक सिस्टम नहीं सुधरेगा, आम आदमी का यह रोना जारी रहेगा।
