[फ्लाईओवर से पहले फुटपाथ — यही असली विकास है]
[जिस शहर में फुटपाथ कब्जे में हों, वहां ‘राइट टू वॉक’ क्यों?]
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
किसी शहर की पहचान चौड़ी सड़कों और तेज वाहनों से नहीं, आम आदमी के आसान पैदल चलने से होती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दिल्ली मास्टर प्लान-2047 में ‘राइट टू वॉक’ का प्रस्ताव इसी अधिकार को केंद्र में लाता है। यह केवल फुटपाथ सुधार की योजना नहीं, बल्कि सड़क पर बढ़ते वाहन वर्चस्व को चुनौती है। सुरक्षित, निर्बाध, छायादार और सर्वसुलभ पैदल मार्गों का सिटीवाइड नेटवर्क, पैदल-केवल सड़कें, मल्टी-यूटिलिटी जोन और एक्टिव ट्रैवल एरिया इसकी प्रमुख कड़ियां हैं। व्यस्त बाजारों, धरोहर क्षेत्रों और चौबीस घंटे सक्रिय इलाकों को प्राथमिकता देकर पैदल यात्रियों को शहर की योजना के केंद्र में रखा गया है। यमुना और नालों के किनारे ग्रीनवे तथा पेलिकन क्रॉसिंग नेटवर्क को और सुरक्षित बनाएंगे। दिल्ली में यह पहल सफल होती है तो इसे राजधानी तक सीमित न रखकर देश के हर शहर की शहरी नीति में पैदल अधिकार को अनिवार्य जगह देनी चाहिए।
शहर की तरक्की का सबसे कमजोर सबूत उसका वह फुटपाथ है, जिस पर आदमी चल ही न सके। देश के अधिकांश शहरों में फुटपाथ हैं, लेकिन वे पैदल यात्री के हिस्से में नहीं आते। कहीं कारें उन पर खड़ी हैं, कहीं दुकानें और खोमचे फैल गए हैं, तो कहीं बिजली के खंभे और निर्माण सामग्री रास्ता रोकते हैं। बची-खुची जगह भी टूटी, ऊबड़-खाबड़ या बीच में खत्म हो जाती है, इसलिए पैदल यात्री को सड़क पर उतरना पड़ता है। बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए यह असुविधा नहीं, रोज का खतरा है। दिल्ली में औसत पैदल ट्रिप केवल 1.6 किलोमीटर है, जबकि गैर-मोटर चालित यात्राएं कुल यात्राओं का 42 प्रतिशत हैं। संदेश साफ है—लोग चलना चाहते हैं, शहर ने उनके कदमों की जगह छीन ली है। इसलिए ‘राइट टू वॉक’ केवल दिल्ली का मुद्दा नहीं, हर भारतीय शहर की अनिवार्य शहरी नीति बननी चाहिए।
पैदल रास्ता केवल दो कदमों के बीच की खाली जगह नहीं, शहर के सार्वजनिक जीवन की पहली चौखट है। उसे सिर्फ सीमेंट की पट्टी मानना शहर को आधा देखना है। मल्टी-यूटिलिटी जोन इसी सोच को बदलने का रास्ता है। बैठने की जगह, पेयजल, शौचालय, बच्चों की देखभाल कक्ष, स्ट्रीट वेंडरों के लिए तय स्थान और साइकिल शेयरिंग जैसी सुविधाएं फुटपाथ को चलने की जगह से आगे बढ़ाकर जीवंत सार्वजनिक क्षेत्र बना सकती हैं। सार्वजनिक परिवहन से इसका सीधा जुड़ाव अंतिम मील की परेशानी भी घटाएगा। दिल्ली का यह मॉडल लखनऊ, भोपाल, जयपुर, इंदौर, पटना, पुणे, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद ही नहीं, छोटे कस्बों तक पहुंचना चाहिए। हर शहर अपनी जलवायु, भूगोल और जरूरत के हिसाब से रूप बदले, लेकिन नियम एक रहे—सड़क बनाते समय पैदल आदमी को सबसे आखिर में नहीं, सबसे पहले जगह मिले।
कागज पर योजना एक होती है, लेकिन जमीन पर उसके कई मालिक निकल आते हैं—यही पैदल रास्तों की सबसे बड़ी विडंबना है। दिल्ली में डीडीए, पीडब्ल्यूडी, एमसीडी और यातायात पुलिस जैसी कई एजेंसियां सड़क व्यवस्था से जुड़ी हैं। दूसरे शहरों में भी नगर निकाय, विकास प्राधिकरण, लोक निर्माण विभाग और यातायात तंत्र की बंटी जिम्मेदारियां पैदल मार्ग को बे-सहारा छोड़ देती हैं। अतिक्रमण हटाने की मुहिम चलती है, तस्वीरें छपती हैं, रास्ता खुलता है और कुछ ही समय बाद कब्जे फिर लौट आते हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर ‘राइट टू वॉक’ के स्पष्ट मानक, एकल जवाबदेही, अलग बजट, कड़ा जुर्माना और लगातार निगरानी जरूरी है। फुटपाथ बनाकर जिम्मेदारी खत्म नहीं होती; उसे बचाए रखना ही असली जिम्मेदारी है।
फुटपाथ की असली परीक्षा वहां शुरू होती है, जहां उसे सड़क पार करानी होती है। सुरक्षित क्रॉसिंग के बिना चौड़ा और सुंदर फुटपाथ भी पैदल यात्री को बीच रास्ते असहाय छोड़ देता है। इसलिए हर शहर में पर्याप्त चौड़ाई, सार्वभौमिक पहुंच, छायादार पेड़, रोशनी और सुरक्षित क्रॉसिंग अनिवार्य हों। पेलिकन क्रॉसिंग जैसे उपाय व्यस्त सड़कों पर पैदल यात्रियों को भरोसा दे सकते हैं। टैक्टिकल अर्बनिज्म के जरिए बाजारों और चुनिंदा इलाकों में अस्थायी पैदल क्षेत्र बनाकर यह परखा जा सकता है कि कम वाहन और ज्यादा पैदल लोगों वाला शहर कैसा दिखता है। दिल्ली के 24 प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में वॉक प्लान इस बदलाव की प्रयोगशाला बन सकती हैं। सफल प्रयोगों को दूसरे इलाकों और फिर दूसरे शहरों तक ले जाना चाहिए। योजना की सफलता किलोमीटर से नहीं, सुरक्षित पहुंचे कदमों से मापी जानी चाहिए।
जब सड़कें कारों के लिए फैलती हैं, तो इंसान के हिस्से की जगह और हवा सिकुड़ती है। कार-केंद्रित विकास की कीमत सिर्फ जाम नहीं, प्रदूषण, खराब स्वास्थ्य और बढ़ती असमानता भी है। सुरक्षित फुटपाथ हों तो छोटी दूरी के लिए पैदल चलना और साइकिल अपनाना आसान होगा। निजी वाहनों और ईंधन पर निर्भरता घटेगी, प्रदूषण कम होगा। बुजुर्ग अपने दम पर निकल सकेंगे, बच्चे सुरक्षित स्कूल जा सकेंगे और दिव्यांग नागरिक अधिकार के साथ चल सकेंगे। इसलिए हर शहर की विकास योजना में पैदल नेटवर्क को फ्लाईओवर, एक्सप्रेसवे और पार्किंग जितनी प्राथमिकता मिलनी चाहिए। जो शहर अपने लोगों के कदम रोकता है, उसकी रफ्तार चाहे जितनी हो, वह मानवीय नहीं हो सकता।
किसी योजना की असली ताकत उसके नक्शे में नहीं, उसके पीछे खड़ी नीयत में होती है। नागरिकों को वॉक प्लान में शामिल किया जाए, स्थानीय समुदाय निगरानी करें और रखरखाव के लिए अलग बजट तय हो। फुटपाथ दिन-रात साफ, रोशन, सुरक्षित और बाधारहित रहें, तभी ‘राइट टू वॉक’ अधिकार बनेगा, नारा नहीं। दिल्ली मास्टर प्लान-2047 ने रास्ता दिखाया है, लेकिन इसे राजधानी तक सीमित रखना बड़ी भूल होगी। देश के हर शहर की नई योजना में ‘सिटीवाइड वॉक नेटवर्क’ अनिवार्य शहरी ढांचे का हिस्सा होना चाहिए। विकास ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों का नाम नहीं; विकास तब है जब सबसे कमजोर नागरिक भी बिना डर और बिना किसी से रास्ता मांगे चल सके। शहर वाहनों से नहीं, इंसानों के बेखौफ कदमों से जीवंत होता है।
