कुरुक्षेत्र, 21 मई । कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में यूजीसी-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र द्वारा आयोजित एनईपी अभिविन्यास एवं संवेदीकरण कार्यक्रम के तीसरे दिन भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) विषय पर गहन शैक्षणिक विचार-विमर्श आयोजित किया गया। कार्यक्रम में देशभर के शिक्षाविदों एवं संकाय सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के यूजीसी-एमएमटीटीसी की निदेशक प्रो. अमिता पांडे भारद्वाज ने “भारतीय ज्ञान प्रणाली” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराएं न केवल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हैं, बल्कि आधुनिक शैक्षणिक एवं अनुसंधान क्षेत्रों के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली की समझ निहित ज्ञान की खोज और उसकी व्याख्या में सहायक सिद्ध हो सकती है तथा भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
दूसरे सत्र में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के यूजीसी-एमएमटीटीसी के निदेशक प्रो. देस राज ठाकुर ने “दार्शनिक विरासत, शांति और भारतीय ज्ञान प्रणाली की स्थिरता” विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली की दार्शनिक आधारशिला, नैतिक मूल्यों और सतत विकास के आयामों पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा में स्वदेशी ज्ञान, नैतिकता एवं टिकाऊ जीवनशैली को शामिल करना समय की आवश्यकता है, जिससे समाज में समग्र एवं संतुलित विकास को बढ़ावा मिल सके।
कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों के बीच संवादात्मक चर्चाएं भी हुईं, जिनसे प्रतिभागियों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा भारतीय ज्ञान प्रणालियों के उच्च शिक्षा में समावेशन संबंधी दृष्टिकोण को गहराई से समझने का अवसर मिला। कार्यक्रम का समापन कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के यूजीसी-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र की निदेशक प्रो. प्रीति जैन एवं पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. अंजू बाला द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के यूजीसी-एमएमटीटीसी की निदेशक प्रो. अमिता पांडे भारद्वाज ने “भारतीय ज्ञान प्रणाली” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराएं न केवल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हैं, बल्कि आधुनिक शैक्षणिक एवं अनुसंधान क्षेत्रों के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली की समझ निहित ज्ञान की खोज और उसकी व्याख्या में सहायक सिद्ध हो सकती है तथा भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
दूसरे सत्र में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के यूजीसी-एमएमटीटीसी के निदेशक प्रो. देस राज ठाकुर ने “दार्शनिक विरासत, शांति और भारतीय ज्ञान प्रणाली की स्थिरता” विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली की दार्शनिक आधारशिला, नैतिक मूल्यों और सतत विकास के आयामों पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा में स्वदेशी ज्ञान, नैतिकता एवं टिकाऊ जीवनशैली को शामिल करना समय की आवश्यकता है, जिससे समाज में समग्र एवं संतुलित विकास को बढ़ावा मिल सके।
कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों के बीच संवादात्मक चर्चाएं भी हुईं, जिनसे प्रतिभागियों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा भारतीय ज्ञान प्रणालियों के उच्च शिक्षा में समावेशन संबंधी दृष्टिकोण को गहराई से समझने का अवसर मिला। कार्यक्रम का समापन कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के यूजीसी-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र की निदेशक प्रो. प्रीति जैन एवं पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. अंजू बाला द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
