करनाल, 18 मई।  गांव करसाडोड में उर्वरकों के संतुलित उपयोग एवं डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) विषय पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम गांव में नियुक्त ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव (आरएडब्ल्यूए) इंटर्नशिप के विद्यार्थियों के सहयोग से आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केन्द्र उचानी करनाल से डॉ. विजय कुमार कौशिक, जिला विस्तार विशेषज्ञ (फार्म प्रबंधन) तथा डॉ. किरण कुमारी, जिला विस्तार विशेषज्ञ (मृदा विज्ञान) ने भाग लिया और किसानों को जागरूक किया। कृषि महाविद्यालय क़ौल से डॉ. परविंदर बालयान तथा डॉ. चरण ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की। यह कार्यक्रम ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव के विद्यार्थियों द्वारा आयोजित किया गया।

डॉ. किरण खोखर ने किसानों को मृदा परीक्षण एवं जल परीक्षण के महत्व के बारे में जानकारी दी तथा मृदा परीक्षण हेतु मिट्टी का नमूना लेने की विधि का प्रदर्शन भी किया। डॉ. विजय कुमार कौशिक ने किसानों को उर्वरकों के संतुलित उपयोग तथा धान की सीधी बिजाई (डीएसआर) के बारे में बताया कि जिस प्रकार एक स्वस्थ माता ही स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है, उसी प्रकार हमारी मिट्टी का स्वास्थ्य भी अच्छा होना चाहिए ताकि उससे अच्छी उपज प्राप्त की जा सके। उन्होंने कहा कि उर्वरकों का संतुलित उपयोग अत्यंत आवश्यक है क्योंकि आजकल किसान रबी एवं खरीफ दोनों फसलों में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के उद्देश्य से आवश्यकता से अधिक उर्वरकों का प्रयोग कर रहे हैं। परंतु वास्तविकता में अनुशंसित मात्रा से अधिक उर्वरकों के प्रयोग से केवल खेती की लागत बढ़ती है, उत्पादन में कोई विशेष वृद्धि नहीं होती। इसलिए प्रत्येक किसान को यह समझना चाहिए कि उर्वरकों का अधिक उपयोग उत्पादन बढ़ाने का माध्यम नहीं है।
उन्होंने आगे बताया कि मिट्टी के स्वास्थ्य एवं उसकी उर्वरता को बढ़ाने के लिए मूंग, ढैंचा तथा फसल अवशेषों के इन-सीटू प्रबंधन को अपनाना चाहिए। ये उपाय मिट्टी के स्वास्थ्य एवं उसकी उर्वरता में वृद्धि करते हैं। डॉ. कौशिक ने किसानों को डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) अपनाने के लिए भी प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष धान की फसल में ड्वार्फ (बौने पौधे) वायरस का प्रभाव देखा गया था, जबकि डीएसआर में इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम पाया गया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक पीआर किस्में तथा अधिकांश हाइब्रिड पीआर किस्में बासमती किस्मों की तुलना में अधिक प्रभावित हुई थीं। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार की एडवाइजरी के अनुसार किसानों को रोपाई वाले धान की बजाय डीएसआर अपनाने तथा यदि संभव हो तो पारंपरिक पीआर किस्मों के स्थान पर बासमती धान की खेती करने की सलाह दी गई है, ताकि ड्वार्फ (बौने पौधे) वायरस के प्रभाव को कम किया जा सके। मृदा वैज्ञानिक डॉ. चरण ने भी किसानों से मृदा स्वास्थ्य पर चर्चा की तथा डीएसआर में खरपतवार नियंत्रण के बारे में जानकारी दी।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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