चंडीगढ़। सिरसा के ऐलनाबाद में तैनात सिविल जज (जूनियर डिवीजन) कम ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी प्रतीत सिंह धोंचक ने अपनी पदोन्नति रोके जाने के खिलाफ पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

न्यायिक अधिकारी ने पूछा है कि क्या केवल विजिलेंस एंड डिसिप्लिनरी कमेटी के समक्ष शिकायत लंबित होना, बिना चार्जशीट तक जारी हुए, किसी न्यायिक अधिकारी के कैरियर पर रोक लगाने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है।

चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव आत्मा राम को न्याय मित्र नियुक्त किया है। याचिका में धोंचक ने पूछा कि क्या संविधान का अनुच्छेद 235 अधीनस्थ न्यायपालिका के जजों को इस स्थिति में धकेलता है कि यदि उन्हें जिला न्यायपालिका में टिके रहना है तो उन्हें अपनी आत्म गरिमा से समझौता करना पड़े।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि तत्कालीन प्रशासनिक न्यायाधीश ने व्यक्तिगत प्रतिशोध की भावना से उनके खिलाफ कार्रवाई का वातावरण बनाया और उन्हें ‘येलो स्लिप’ दिखाने की धमकी तक दी गई। धोंचक का कहना है कि 29 मई 2024 को फुल कोर्ट द्वारा तय पदोन्नति मानदंडों के अनुसार अतिरिक्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन) बनने के लिए पिछले पांच वर्षों में कम से कम दो ‘बी प्लस (गुड)’ एसीआर जरूरी थीं, जिसे वह पूरा करते हैं।
उन्हें कई ‘बी प्लस’ और एक वर्ष ‘ए-वेरी गुड’ तक मिला। इसके बावजूद 2022-23 की एसीआर में केवल यह टिप्पणी कि ‘वीडीसी में शिकायत विचाराधीन है’, उनके प्रमोशन में बाधा बना दी गई, जबकि ‘इंटीग्रिटी डाउटफुल’ जैसी प्रतिकूल टिप्पणी उनके खिलाफ नहीं थी।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या फुल कोर्ट के सामूहिक निर्णय को केवल मुख्य न्यायाधीश व्यक्तिगत स्तर पर पलट सकते हैं और क्या बिना कारणयुक्त आदेश के किसी न्यायिक अधिकारी के सेवा अधिकार प्रभावित किए जा सकते हैं। धोंचक ने दावा किया कि उनसे जूनियर अधिकारियों को 26 अप्रैल और आठ अगस्त 2025 के आदेशों से पदोन्नत कर दिया गया, जबकि उन्हें लंबित शिकायत के नाम पर रोक दिया गया।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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