सातवीं और आठवीं कक्षा में प्रवेश हेतु पहुंचे 4 हजार से अधिक बच्चे व अभिभावककुरुक्षेत्र, 21 मार्च 2026 – गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति में बच्चे को विषम परिस्थितियों का आत्मविश्वास के साथ सामना करने के लिए तैयार किया जाता है जो उसके भावी जीवन हेतु मजबूत नींव का कार्य करती है। गुरु के अलावा माता-पिता ही बच्चों के सबसे बड़े हितैषी है मगर आज मोबाइल, टी.वी. और सोशल मीडिया के बढ़ते चलन ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। युवाओं द्वारा मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग जहां उन्हें किताबों से दूर कर रहा है, वहीं पुरातन संस्कारों का भी ह्रास हो रहा है। उक्त शब्द ‘गुरुकुल शिक्षा उत्सव’ के दूसरे दिन सातवीं और आठवीं कक्षा में प्रवेश हेतु पधारे छात्रों व उनके अभिभावकों को सम्बोधित करते हुए गुजरात के राज्यपालश्री आचार्य देवव्रत जी ने कहे। उन्होंने कहा कि बच्चों को अच्छी शिक्षा हेतु साफ-स्वच्छ वातावरण उपलब्ध कराना अभिभावकों के लिए एक चुनौती बन गया है जिसका समाधान केवल गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति है।

रामायण और महाभारत का उदाहरण देते हुए राज्यपालश्री ने कहा कि प्राचीन काल में राजा-महाराजा के बालक भी घने जंगलां में स्थित गुरुकुलों में शिक्षा प्राप्त करने जाते थे, वहां बिना किसी सुख-सुविधा के अपने सभी कार्य स्वयं करते थे और आचार्य से शस्त्र और शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त करते थे। आधुनिक शिक्षा पद्धति में बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों में बच्चों को किताबी और तकनीकी ज्ञान तो दिया जा रहा है मगर उन्हें समाज में कैसे रहना है? अपने बड़ों से, अपने पड़ोसी से कैसा आचरण करना है? संकट के समय स्वयं को कैसे स्थिर रखना है? देश और समाज के प्रति हमारे क्या दायित्व है? देश की उन्नति में कैसे सहायक बनें, इस दिशा में बच्चों को सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। उन्होंने कहा कि हमारे गुरुकुलों में बच्चों को ठीक उसी प्रकार रखा जाता है जैसे बच्चा मां के गर्भ में सुरक्षित रहता है। प्राचीन काल में गर्भ से ही बच्चों में 16 संस्कार करने का विधान था, जो गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति का अभिन्न अंग है। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि बच्चां को आत्मनिर्भर बनाएं और हमारे गुरुकुलों में अक्षरज्ञान के साथ-साथ बच्चां को शारीरिक, मानसिक और आध्यामिक रूप से मजबूत बनाया जाता है तो कल वे देश की उन्नति के मजबूत आधार स्तम्भ बनाकर अपने माता-पिता और गुरुकुल का नाम रोशन कर सकें।

डा. राजेन्द्र विद्यालंकार ने अपने सम्बोधन में कहा कि आज अभिभावक बच्चों को अत्यधिक सुख-सुविधाएं देकर न केवल उनका स्वास्थ्य बिगाड़ रहे है बल्कि उन्हें मानसिक तौर पर भी कमजोर बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि बच्चां को कम्फर्ट जोन से बाहर निकालें और मजबूत बनाएं। गुरुकुलों में बच्चों आधुनिक तकनीकी शिक्षा देने के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और वैचारिक रूप से मजबूत बनाया जाता है ताकि वे बड़े होकर देश, समाज और अपने माता-पिता के प्रति अपने कर्त्तव्यों का जिम्मेदारी के साथ निर्वहन कर सकें।

गुरुकुल कुरुक्षेत्र के निदेशक ब्रिगेडियर डॉ. प्रवीण कुमार ने अपने सम्बोधन में सभी गुरुकुलों की शैक्षिक गतिविधियों और रिजल्ट पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि 10वीं और 12वीं बोर्ड में हमारे अधिकांश बच्चे मेरिट से पास होते है, इसके अलावा एनडीए, नीट, आईआईटी, एनआईटी में प्रतिवर्ष गुरुकुल कैम्पस से बड़ी संख्या में छात्र चयनित होते हैं। गुरुकुलों में बच्चों के लिए एडवांस लर्निंग प्रोग्राम, क्रिटिकल थिंकिंग प्रोग्राम के साथ-साथ केरियर काउंसलिंग सैशन भी कराए जाते है ताकि बच्चों के मन में उठ रहे सभी सवालों का उन्हें संतोषजनक उत्तर मिले और वे अपनी ऊर्जा का पूरा उपयोग अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में कर सकें। खेलों का जिक्र करते हुए ब्रिगेडियर प्रवीण कुमार ने कहा कि शारीरिक और मानसिक मजबूती हेतु खेल बेहद जरूरी है और गुरुकुलों में सभी बच्चे गेम्स में भाग लेते है और जिला और राज्य स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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