लेखक- डॉ अशोक कुमार वर्मा

भारत के सभी स्थानों पर चाहे वे समतल भूमि क्षेत्र हो अथवा पहाड़ी क्षेत्र हो वहां पर आवारा पशुओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। इनमें मुख्यत: आवारा कुत्ते जहाँ एक ओर मानव जीवन के लिए समस्या बन रहे हैं वहीं दूसरी ओर भारत में पूजनीय गौ माता, बछड़े, बैल और सांड मनुष्य के विरुद्ध आक्रामक होते जा रहे हैं। सड़कों पर सांड आपस में भीड़ जाते हैं ओर न जाने कब आपस में लड़ते लड़ते पास से निकलने वाले मनुष्यों पर प्रहार कर देते हैं। शहरों के बीच सड़कों पर इनकी संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। सड़क के बीच बैठकर ये मार्ग को भी अवरुद्ध कर देते हैं। इतना ही नहीं यह नहीं ज्ञात रहता कि कब कोई पशु सड़क को पार करने के लिए भाग कर आ जाए। अनायास लोगों पर प्रहार करना आए दिन की घटनाएं हो चुकी हैं। प्रतिदिन सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो रहे हैं।
अभी कुछ दिन पूर्व हरियाणा के कुरुक्षेत्र में एक 52 वर्षीया महिला घर के बाहर कड़ी थी कि एक गाएं ने अनायास उस को अपने सींगों पर उठाकर पटक दिया। गाएं इतनी आक्रामक लग रही थी कि जब तक उसके प्राण पखेरु नहीं उड़ गए तब तक उस पर प्रहार करती रही। दूसरी घटना पानीपत शहर की है जहां पर एक परिवार के लोग अपने रिश्तेदारों को कार तक छोड़ने आए तो अनायास एक सांड वहां से निकल रहा था। न जाने उसे क्या हुआ कि उसने परिवार के पुरुषों और महिलाओं पर धावा बोल दिया। उस समूह में एक महिला की गोद में एक बालक भी था। उस बालक वाली महिला ने भाग कर अपनी जान बचाई लेकिन उस सांड ने  अन्य लोगों पर आक्रमण किया। यद्यपि वे बहुत लोग थे ओर उन्होंने डंडे का प्रयोग करते हुए सांड को भगाने का प्रयास किया लेकिन वह सांड तो मानो उनके पीछे ही पड़ गया था ओर दो वृद्धों को चोटिल कर दिया। उत्तर प्रदेश के बागपत में संजय वर्मा नामक व्यक्ति को सांड ने पीछे से टक्कर मारकर उसे हवा में उछाल दिया ओर वह सड़क पर गिर गया। उसे बहुत चोटें आई। राजस्थान के भरतपुर के कामा गाँव में एक सांड ने तीन लोगों पर आक्रमण कर दिया जिसमें से एक की मृत्यु हो गयी तथा दो अन्य घायल होकर उपचार के लिए भेजे गए। एक घटना में सांड सड़क पर आपस में लड़ रहे थे कि एक ऑटो पास से निकला उस पर आक्रमण कर दिया जिसमें ऑटो चालक ऑटो के नीचे दबकर मर गया। दूसरे उसमे बैठे लोगों को बहुत चोट आई। अभी एक अन्य वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक व्यक्ति ओर एक महिला मोटर साइकिल पर जा रहे थे कि अकस्मात एक गाएं ने मोटर साइकिल के पीछे बैठी महिला पर आक्रमण कर दिया। इतना ही नहीं भारत में दोस्य नामक स्थान पर एक विदेशी महिला को सांड ने उसकी जांघ में सींग मारकर उसे हवा में उछाल दिया ओर चोटिल किया। एक घटना सीसीटीवी फुटेज से मिली जिसमें एक विद्यार्थी अपनी माँ के साथ सड़क पर चल रहा था ओर उनके आगे आगे एक गाएं ओर बछड़ा जा रहा था कि अकस्मात गाएं पीछे मुड़ती है ओर काँधे पर स्कूल बैग लिए बच्चे को अपने सींगो पर उठाकर नीचे पटक देती है ओर उस पर अपने मुँह से आक्रमण करती है। लोग उस पर पत्थर मारते हैं लेकिन वह उस बच्चे को मारने से नहीं रूकती। ऐसी और भी असंख्य घटनाएं हैं। एक घटना में एक सांड ने पहले एक वृद्धा पर आक्रमण किया। उसको बचाने एक बच्चा बीच में आया तो उसे भी उठाकर पटक दिया। तत्पश्चात वृद्धा और बच्चा जाने लगे तो उस सांड ने दुबारा दोनों पर आक्रमण कर हवा में उछाल दिया। वैसे तो असंख्य ऐसी घटनाएं हैं जिनमें इन आवारा कहे जाने वाले पशुओं ने लोगों पर प्रहार किये हैं लेकिन उपरोक्त उदाहरणों के माध्यम से बताने के लिए ये पर्याप्त हैं।
अब प्रश्न है कि भारत में जिस गौ को माता कहकर पुकारते हैं और जिसकी भारत में पूजा होती है वो गाएं आज इतनी आक्रामक क्यों हो गयी। हमने तो बचपन में अपने पूर्वजों से यह सुना था कि गाएं सबसे सीधा और सबसे बुद्धिमान पशु है। गाय का न केवल दूध अपितु गोबर और मूत्र भी औषधि के रूप में प्रयुक्त होता है। अनेक बार हमारे पूर्वज किसी साधारण व्यक्ति का परिचय देते हुए कहते सुने है कि यह तो गऊ है अर्थात बहुत ही सरल और निष्कपट है। आज ऐसा क्या हुआ कि गऊ वंश आए दिन लोगों के लिए समस्या खड़ी कर रहा है। लोगों पर प्रहार कर रहा है। हर घर की शोभा बनने वाली गाए आज सड़कों पर एक समय का भोजन प्राप्त करने के लिए विवश हो चुकी है। गंदगी के ढेर पर मुँह मारने को विवश है। पॉलिथीन खाकर पीड़ादायक मृत्यु को प्राप्त हो रही है।
इसका सबसे बड़ा कारण है आज गाएं के स्थान पर लोगों ने भैंस को बाँध लिया है। बुद्धिमान लोगों ने व्यावसायिक उद्देश्य से गाएं को नकार दिया है। दूसरी और गाएं के बछड़े बड़े होकर बैल बनते थे और खेतों में हल जोता करते थे। आज उनके स्थान पर ट्रेक्टर आ गया है। पहले गाएं के गोबर की खाद खेतों में डाली जाती थी लेकिन खाद ने उनको भी नष्ट करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। हर प्रकार से गाय का निरादर आधुनिक युग में पूजे जाने वाली गऊ माता के लिए निराशा का कारण बना है। गाएं को खाने के लिए चारा नहीं गंदगी का ढेर मिलता है। कहावत भी है जैसा खाओ अन्न वैसा होये मन। आज गाएं माता की प्रकृति में बदलाव इसीलिए आया है कि उसे योग्य चारा नहीं मिल रहा है। सड़कों पर इनकी संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। मनुष्य ने पशुओं के लिए कोई भी धरती नहीं छोड़ी। चारों और आधुनिकता के नाम पर भवन खड़े हो चुके हैं। गाँव के अंदर भी इनके लिए कोई स्थान शेष नहीं है। बड़े बड़े शहरों में और सेक्टरों में दुधारू पशु रखना वर्जित है। ऐसे में गऊ माता कहां जाए। यह केवल सरकार का कार्य नहीं है अपितु प्रत्येक भारतीय का दायित्व है।
आज सेक्टरों में लोग कुत्ते तो रख सकते हैं लेकिन गाएं नहीं। भारत के अनेक राज्यों में गऊ रक्षा के लिए अनेक क़ानून बनाये गए हैं जिसमें उनका वध करना दंडनीय अपराध है। यह बहुत ही सराहनीय प्रयास है क्योंकि गौमाता भारतीय संस्कृति और लोगों की आस्था से जुडी है। गऊ मनुष्य के लिए समस्या नहीं अपितु वरदान है। गौ पालन को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक योजनाएं बनाने की आवश्यकता है। घर घर एक गऊ अवश्य हो इसके लिए सेक्टरों में घरों में गौ रखने पर प्रतिबंध हटना चाहिए। ऐसा प्रावधान हो कि सरकारी आवास और सेक्टरों सहित अन्य स्थानों पर घर में एक गाएं और बछड़ा रख सकते हों। जिस प्रकार सेक्टरों में घरों में आगे पीछे स्थान छोड़ना होता है वहां एक गऊ के लिए एक छत अवश्य हो। इसके अनेक लाभ होंगे। हर घर में घर का दूध होगा। दही होगी। मक्खन घी होगा और सबसे बड़ी बात शुद्ध होगा। घर में वृद्ध और बच्चों को गौ सेवा का अवसर मिलेगा। घर में गऊ का वास शुभ होता है और अनेक दोषों का निवारण होता है। दूसरी और आज खेतों में इतना खाद डाला जा रहा है कि व्यक्ति विष का सेवन कर रहा है। अनेक रोग उसे घेर चुके हैं। यदि गोबर का खाद खेतों में प्रयोग हो तो शुद्ध अन्न होगा और लोग स्वस्थ रहेंगे। इसके साथ ही बछड़ों का प्रयोग बैल बनाने में किया जाए तो पर्यावरण संरक्षण में इसका बहुत लाभ होगा।

इसके साथ ही आज गाय को आवारा कहकर पुकारा जाता है। वास्तव में गाय आवारा नहीं वह बेसहारा है। ये शब्द हरियाणा पुलिस के सेवानिवृत दबंग आईपीएस अधिकारी श्री श्रीकांत जाधव ने कहे थी। वे हरियाणा पुलिस में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रहे। सेवारत रहते हुए उन्होंने गौ रक्षा के लिए अनेक उपाय किये थे जिनमें बेसहारा गौवंश के लिए उन्होंने रोहतक में फ्लाईओवर के नीचे खाली स्थान पर गौशाला बनवा दी थी। आज यह सरलता से हो सकता है। गऊ वंश के लिए वैसे तो शहरों में अनेक गौशालाएं है लेकिन फिर भी गऊ सड़कों पर हैं।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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