श्रीकृष्णा आयुष विश्वविद्यालय एवं केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में गीता ज्ञान संस्थान में आयोजित तीन दिवसीय अनुसंधान पद्धति व बायोस्टेटिसटिक्स पर सतत चिकित्सा शिक्षा का शुभारंभ कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान और मुख्य वक्ता व मुख्यातिथि सीसीआरएएस के डायरेक्टर जनरल प्रो. डॉ. रबिनारायण आचार्य द्वारा भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा के समक्ष पुष्प अर्पित कर किया गया। संयोजक डॉ. आशीष मेहता ने उपस्थित अतिथियों का पुष्पगुच्छ और शॉल भेंट कर अभिनंदन किया। इस अवसर पर कुलपति ने कहा कि व्यक्ति के जीवन में सीखने की प्रक्रिया उम्र भर चलती है। छोटा हो या बड़ा हर किसी से कुछ न कुछ सिखने को जरूर मिलता है। इसलिए व्यक्ति को ज्ञान के चक्षु हमेशा खुले रखने चाहिए। उन्होंने भावी चिकित्सकों को सम्बोधित करते हुए कहा कि चिकित्सा पद्धति निरंतर अभ्यास मांगती है। जो सिखा है उसे पर्याप्त न समझें। आयुर्वेद में नित नए प्रयोग की आवश्यकता है। हालांकि कोरोना महामारी के बाद आयुर्वेद की मांग विश्वव्यापी हुई है। मगर हमारी तैयारी उसके लिए कितनी है इसका भी आकलन समय-समय पर जरूर करना पड़ेगा। इसके साथ ही समयानुकूल जिस भाषा और टेक्नोलॉजी की आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में जरूरत है उसे भी आत्मसात करना होगा। उन्होंने कहा कि 2047 तक भारत को सांस्कृतिक, आर्थिक और वैज्ञानकि रूप से विकसित देश बनाना है। जिसमें आयुष विभाग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मगर उसके लिए लगातार कठिन परिश्रम और अपने कर्तव्यों को जिम्मेदारी पूर्वक निर्वहन करना होगा। मुख्य वक्ता प्रो. डॉ. रबिनारायण ने शोध क्या है, क्यों करना और शोध के आयाम कौन-कौन से हैं, इसकी विस्तृत जानकारी एमडी स्कॉलर,पीएचडी शोधार्थियों और टीचिंग स्टाफ को दी। इसके साथ ही सीसीआरएएस की कार्यप्रणाली, उसके इतिहास और वर्तमान उपलब्धियों को गिनवाया। उन्होंने कहा कि अनुसंधान संशय रहित, मानव ज्ञान में नए कोष जोड़ने वाला और समाज हित में होना चाहिए। पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े महर्षियों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति हमारे ऋषि-मुनियों की अखंड साधना की देन है। जिसके बल पर आज भारत विश्व भर में गौरवान्वित महसूस करता है। इसलिए शोधार्थियों को भी अपना शोध कार्य ईमानदारी पूर्वक करना चाहिए। जिससे आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति तो विकसित होगी ही और उसके सुखद लाभ भी समाज को प्राप्त होंगे। कार्यक्रम के अन्त में कुलसचिव डॉ. नरेश भार्गव ने सभी गणमान्यों का धन्यवाद प्रकट किया और कहा कि यह सीएमई तीन दिन तक चलने वाली है। जिसमें आयुर्वेद के अनुभवी वक्ताओं द्वारा अनुसंधान की बारीकियों से शोधार्थियों को अवगत कराया जाएगा। विद्यार्थियों के ज्ञानवर्धन हेतु इस तरह की कार्यशालाएं लगातार जारी रहें इसके लिए आयुष विश्वविद्यालय लगातार प्रयासरत है। इन तीन दिनों में सीसीआरएस के डॉ. अतुल जुनेजा, डॉ. ऋचा सिंघल, डॉ. राकेश राणा और डॉ. अरुणाभ त्रिपाठी द्वारा शोध विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी दी जाएगी।

By Dr. Rajesh Wadhwa

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